क्‍या योगी आदित्‍यनाथ और राजा भइया की केमिस्ट्री अब कसैली हो गई है!

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राज बहादुर सिंह

: जर्जर कांग्रेस को खोने का अहसास तक नहीं : राजकुमारी रत्ना ने कहा कांग्रेस को अलविदा : लखनऊ : राजकुमारी रत्ना सिंह का भाजपा में जाना महज एक पूर्व सांसद का राजनीतिक प्रतिबद्धता बदलना मात्र नहीं है। इसे तो राजनीतिक विरासत का बदलाव माना चाहिए। कांग्रेस के लिए यह बहुत तगड़ा झटका है, लेकिन कांग्रेस हर स्तर पर कमजोर नहीं बल्कि जर्जर हो चुकी है कि उसे अब फर्क नहीं पड़ता।

खैर, रत्ना सिंह के भाजपा में जाने की पृष्ठभूमि जो भी हो, पटकथा जिस आश्वासन पर लिखी गयी हो, लेकिन इस घटनाक्रम से प्रतापगढ़ के दूसरे सियासी किरदारों के बारे में सोचे बिना नहीं रहा जा सकता। मुख्य रूप से निर्दलीय विधायक कुंवर रघुराज प्रताप सिंह व आंशिक तौर पर कांग्रेस के सीनियर लीडर प्रमोद तिवारी से बाबस्ता सियासत के बारे में।

कालाकांकर व भदरी-बेंती की सियासी अदावत जग जाहिर है। हर स्तर पर यह देखी सुनी जाती रही है। खासकर रघुराज व रत्ना के चुनावी सियासत में आने के बाद, जिन्होंने यह सिलसिला क्रमशः 1993 व 1996 में शुरू किया था। ढाई साल पहले जब भाजपा की सरकार योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में सत्तारूढ़ हुई थी तो सियासी हल्कों में आम खयाल यही था कि रघुराज व योगी के बीच की केमिस्ट्री उम्दा थी।

बहरहाल, पिछले कुछ अरसे के घटनाक्रम से ऐसा लगता है कि केमिस्ट्री अब कसैली हो गयी है या कम से कम उतनी मीठी नहीं रही। और अब रत्ना सिंह के भाजपा में प्रवेश ने इस धारणा को पुख्ता किया है कि निर्दलीय प्रभावशाली नेता व सीएम के बीच अब सब कुछ सुगम, सहज नहीं है। आने वाले दिनों में शायद इस बारे में और भी स्पष्ट संकेत मिले। शायद इस सबके पीछे रघुराज का राजीतिक दल बनाना वजह हो और अगर न भी हो तो अब इस दल को बनाए रखना और इफेक्टिव तरीके से चलाने की चुनौती और गहरी हो सकती है।

थोड़ी चर्चा प्रमोद तिवारी की भी। प्रतापगढ़ की राजनीति में रत्ना-प्रमोद की जोड़ी वस्तुतः कांग्रेस का पर्याय थी। दोनों की रघुराज से अदावत उनकी युगलबंदी में कॉमन फैक्टर था। प्रमोद तिवारी कांग्रेस में कितने खुश हैं यह तो वह खुद ही जानते होंगे, लेकिन रत्ना के कांग्रेस छोड़ने से कयास भी लगाए जाएंगे और चर्चाएं भी होंगी। जिले में कांग्रेस की गाड़ी एक पहिये पर आ जाएगी।

और अब बात रत्ना सिंह की। वह तीन बार लोक सभा मेंबर रहीं। उनके पिता राजा दिनेश सिंह जवाहर लाल नेहरू से लेकर पीवी नरसिंहराव तक की सरकारों में मंत्री रहे और प्रतापगढ़ से चार बार सांसद रहे। रत्ना 2009 में तीसरी बार लोकसभा पहुंची पर मंत्री न बनाए जाने पर उन्हें मायूसी हुई जो स्वाभाविक भी था।

तब कांग्रेस ने सरकार में बतौर मंत्री सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, राजीव शुक्ला, प्रदीप जैन, पीएल पुनिया(एससी कमीशन के चेयरमैन, कैबिनेट रैंक) सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया सिवाय ठाकुर को। संजय सिंह, जगदंबिका पाल या फिर हर्षवर्धन अगर कभी कांग्रेस छोड़ चुके होने के कारण संदिग्ध सत्यनिष्ठा वाले थे तो रत्ना सिंह तो खालिस कांग्रेसी थीं। उन्हें कभी संगठन में भी कोई महत्व देने लायक नहीं समझा गया। चुनाव का क्या जब बगल की सीट पर राहुल लुढ़क गए। ऐसे में जो हुआ वह होना कितना अप्रत्याशित था यह आप तय करिए।rbs

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.