क्या डूब जाएगा बनारस का ये खूबसूरत आईलैंड?

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विजय विनीत

: गंगा की धारा में विलीन होता जा रहा है ढाब : बनारस : पूर्वांचल के इकलौते आईलैंड ढाब में बसे पांच खूबसूरत गांव कुछ सालों में गंगा में समा सकते हैं। ये गांव हैं रमचंदीपुर, गोबरहां, मोकलपुर, मुस्तफाबाद (आंशिक) और रामपुर (आंशिक)। जानते हैं क्यों? बनारस के इन गांवों को गंगा तेजी से काट रही हैं। बनारस के राजघाट से ढाब आईलैंड की दूरी महज साढ़े छह किमी और आबादी करीब 38 हजार है। ये पूर्वांचल का वो ग्रामीण इलाका है, जहां के बाशिंदे सर्वाधिक विदेशी मुद्रा कमाते हैं।

बनारस और चंदौली के बीच गंगा नदी के दो पाटों के बीच सात किमी लंबा आईलैंड सालों पहले रेत पर बसा था। बारिश के दिनों में यह आईलैंड पहले समूची दुनिया से कट जाता था। सावन-भादों में न बिजली मिलती थी और न मोबाइल नेटवर्क। बनारस के नक्शे पर इस टापू के गांव दिखते ही नहीं थे। अखिलेश सरकार ने मुस्तफाबाद के पास एक शानदार पुल बनाकर ढाब आईलैंड के लोगों की मुश्किलें थोड़ी आसान की, लेकिन दुशवारियां कम नहीं हुई हैं। इस आईलैंड को गंगा दोनों ओर से काट रही हैं। इस वजह से यह टापू सिकुड़ता जा रहा है।

मुस्तफाबाद के प्रधान राजेंद्र सिंह कहते हैं, ‘हालात ऐसे ही रहे और सरकार ने ढाब आईलैंड को बचाने के लिए कवायद शुरू नहीं की तो यह टापू कुछ ही सालों में हमेशा के लिए जलमग्न हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इन गावों को ऐसे लोगों की जन्मस्थली के रूप में याद रखा जाएगा जो पूर्वाचल में सबसे पहले किसी खूबसूरत टापू पर विस्थापित हुए थे।’

बनारस में गंगा ने इकलौते टापू पर कई पीढ़ियों से हजारों परिवारों को शरण दे रखी है, लेकिन पिछले एक दशक में गंगा तेजी से इस टापू का अस्तित्व मिटाने में जुटी हैं। गोबरहां के पास गंगा तेजी से आईलैंड को काट रही हैं। इसी तरह का कटान मुस्तफाबाद में भी हो रहा है। रमचंदीपुर के पूर्व प्रधान बद्रीनारायण सिंह यादव बताते हैं कि अफसरों की देहरी पर अनगिनत मर्तबा गुहार लगाने के बावजूद ढाब को बचाने के लिए कोई सार्थक पहल शुरू नहीं हुई।

हालात यह है कि बाढ़ की विभीषिका के चलते रमचंदीपुर, गोबरहां, मोकलपुर, मुस्तफाबाद और रामपुर गांव में सैकड़ों बीघा जमीन गंगा लील चुकी है। हालात ये हैं कि इन गावों पर अब खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। रेत की दीवारें अब इन गावों की सरहद को बचाने में सक्षम नहीं रह गई हैं। ढाब आईलैंड का आकार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। वाराणसी जिला प्रशासन गंगा कटान रोकने के लिए कामचलाऊ इंतजाम भी नहीं कर पा रहा है।

ढाब आईलैंड को गंगा ने तब से ज्यादा रेतना शुरू किया है जब से जलपोत चलाने के लिए नदी की ड्रेजिंग कराई गई। सामाजिक कार्यकर्ता सुनील यादव बताते हैं, ‘बनारस में कई मर्तबा बाढ़ और शक्तिशाली तूफान आए, लेकिन ढाब के बाशिंदों को सुरक्षित ठौर पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी।’ सुनील कहते हैं कि अनुमान है कि साल 2035 तक ढाब के खूबसूरत गांव रहने लायक नहीं रह जाएंगे। ढाब के बाशिंदों की व्यथा गंगा नदी के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों से अलग नहीं है। गंगा का जलस्तर बढ़ने और तटीय इलाकों के क्षरण से इस टापू पर खतरा मंडरा रहा है।

गोबरहां के पूर्व प्रधान कृपाशंकर सिंह कहते हैं, ‘ढाब आईलैंड को बचाने के लिए यथाशीघ्र तटबंध नहीं बनाए गए तो गंगा कटान की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।’ वो बताते हैं कि ढाब के बाशिंदों के अस्तित्व को बचाने के लिए चार-पांच करोड़ रुपये खर्च आ सकता है। इस बात के कोई संकेत नहीं हैं कि ये धनराशि सरकारी खजाने से ढाब में आ पाएगी। रमचंदीपुर के प्रधान जोखन सिंह कहते हैं, ‘ढाब के मूल निवासी उस समस्या की कीमत चुका रहे हैं जो उन्होंने खड़ी नहीं की है।’ उन्होंने कहा, “अगर हम दस साल बाद भी यहां रहे तो हम मिट जाएंगे या फिर दूसरी जगह विस्थापित होना पड़ेगा। सरकार ने हम पर अपनी समस्या लादी और अब वह चाहती है कि हम खुद ही सब कुछ उठाकर यहां से चले जाएं। ये किस तरह की सरकार है?”

ढाब आईलैंड के ज्यादातर लोग बागवानी करते हैं या फिर पशुपालन। ये धंधा भी अब आसान नहीं रह गया है। जंगली सुअर और घड़रोज बाग-बगीचे और सब्जियों की फसलें बर्बाद करने लगे हैं। रमचंदीपुर के राजकुमार यादव ने कहा, “अगर हमें अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो खुद को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना होगा, लेकिन गंगा कटान का न रुक पाने का मतलब है अब मुश्किलें थमने वाली नहीं हैं।” गोबरहां के प्रधान भोलाराम कहते हैं, “ढाब आईलैंड की धरती बेहद उपजाऊ है। बनारस में दूध और सब्जियों की सर्वाधिक आपूर्ति इसी ढाब से ही होती है। इस टापू के ढाई हजार नौजवान गल्फ में नौकरी करते हैं जिससे सर्वाधिक विदेशी मुद्रा बनारस पहुंचती है।”

उन्होंने कहा, “सच्चाई ये है कि यह आईलैंड विकास की राह पर है। सवाल है कि गंगा कटान रोकने के लिए कौन प्रमुख भूमिका निभाएगा? हम चाहते हैं कि यूपी और केंद्र सरकार दोनों मिलकर ये भूमिका निभाएं, क्योंकि ग्रामीणों की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।” गोबरहां के पूर्व प्रधान लालजी यादव कहते हैं कि संसाधनों के दोहन और पर्यटन के नजरिये से इस आईलैंड को विकसित किया जाए तो ढाब आने वाले दिनों में एक आकर्षक क्षेत्र बन सकता है। इसे पर्यटक विलेज के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।

लेखक विजय विनीत वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. हिंदुस्‍तान, अमर उजाला समेत कई बड़े संस्‍थानों में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. फिलहाल बनारस से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्‍स में संपादक के रूप में कार्यरत हैं. यह रिपोर्ट उनके एफबी वाल से साभार लिया गया है.