स्वघोषित दत्तक पुत्र ने अटलजी की दत्तक पुत्री से लुकाठी नहीं छीनी!

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शंभूनाथ शुक्‍ल

: चूक गए मोदी जी! : प्रधानमंत्री जब रुँधे गले से कह रहे थे कि अटल जी को मैंने सदैव पिता की तरह समझा और अटलजी ने मुझे पुत्र-सदृश!, तो मैं भी भावुक हो गया और मेरी आँखों से अविरल अश्रु-धारा बह निकली. और तय कर लिया कि अब मेरा वोट मोदी जी को. लेकिन मुझे खटका तब हुआ जब अटलजी की चिता को आग देते समय इस स्वघोषित दत्तक पुत्र ने अटलजी की दत्तक पुत्री नमिता से लुकाठी नहीं छीनी.

मोदी जी को उस वक़्त कहना था- “ना बहना, इस भाई के रहते तुम दत्तक पिता के शरीर को दाग दो, यह कान्यकुब्ज वंशावतंस श्री अटलबिहारी वाजपेयी की वंश परंपरा के लिए उचित नहीं.” वे फ़ौरन स्मृति स्थल पर जावेद हबीब नाम के नाई को बुलाते और अपना सर मुँड़वाते तथा दाढ़ी-मूँछ भी. इसके बाद सिर्फ धोती पहन कर दाग देते. तेरह दिन तक लोटा पकड़ कर बैठते और कंडे सुलगा कर अपनी खिचड़ी स्वयं पकाते.

तेरहवीं के रोज़ मान्यों को बुलाकर लुटिया-धोती और चौपाटी प्लस रामचरित मानस का गुटका देते एवं खीर भी खिलाते. हाँ मुझे अवश्य बुलाते, क्योंकि मेरी पत्नी की ननिहाल लखनऊ के बाजपेइयों में है, सो मैं तो उनके मान्य का मान्य हुआ. तब मैं मान लेता वाकई मोदी जी आप उनके सच्चे पुत्र हो. और पक्का मानिये कि तब मैं अपना वोट तो आपको देता ही. अपने 21000 फालोवर. पांच हज़ार मित्र और अनगिनत कामरेडों के वोट भी आपको दिलवाता.

उत्तर प्रदेश के 11.75 परसेंट ब्राह्मण तो आप पर लट्टू हो जाते. यूँ भी जब मेरे फालोवर मेरे कहने भर से जलेबी खा लेते हैं, तो वोट क्यों नहीं देते! अब देखिए, नमिता भट्टाचार्य भी उनकी स्वयं की पुत्री तो हैं नहीं. जैसी दत्तक वह, वैसे ही दत्तक आप. और हम जिन अंग्रेज़ों के बनाई आईपीसी पर अमल करते हैं तथा उनकी नक़ल पर हमने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स तथा हाउस ऑफ़ कॉमंस बनाए हैं, उन्हीं अंग्रेज़ों के महामानव लार्ड डलहौज़ी ने दत्तक पुत्र या पुत्री को कानूनन वारिस नहीं माना था, वर्ना 1857 होता ही क्यों!

इसलिए नमिता भट्टाचार्य को कोई हक़ नहीं कि वह अटलबिहारी वाजपेयी का सूतक करे. बल्कि आप करते और रह गया यह कि प्रधानमंत्री लुटिया लेकर 13 दिन तक बैठता तो देश कैसे चलता? तो मान्यवर, यह देश तो वैसे भी रामजी का है, यहां तो गद्दी पर खड़ाऊँ रख दो बेखटके राज करो.

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के फेसबुक वाल से साभार. श्री शुक्‍ल जनसत्‍ता, अमर उजाला जैसे संस्‍थानों में लंबे समय तक वरिष्‍ठ पद पर रहे हैं. इन दिनों निर्वाण टाइम्‍स का संपादन कर रहे हैं.