शिवपाल की घर वापसी!

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राकेश श्रीवास्तव

लखनऊ। एक बार फिर से समाजवादी पार्टी में शिवपाल यादव की वापसी को लेकर अटकलों का दौर शुरु हो गया है। अटकलें लगायी जा रही है कि विधानसभा व लोकसभा चुनाव में सपा की हालत को देखते हुए इस तरह की संभावनाएं बन रही हैं। परिवार को एकजुट करने का बीड़ा उठाने वाले कोई और नहीं बल्कि पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और उनके भाई रामगोपाल हैं। हाल ही में रामगोपाल और मुलायम के बीच एक गुप्त बैठक हुई। बैठक में दोनों का मत यही है कि यदि समय रहते समाजवादी कुनबे को दोबारा एक नहीं किया गया तो निश्चित तौर पर सपा को भविष्य में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

समाजवादी पार्टी के इन भीष्म पितामह सरीखे वरिष्ठ नेताओं के प्रयास के बावजूद कुछ ऐसा है जो इन अटकलों को वास्तविकता में तब्दील करने में अड़चन पैदा कर सकता है। वह है शिवपाल यादव और अखिलेश यादव की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं व अहम। यही फैक्टर ऐसा है जो संभावनाओं के बीच दुश्मन बनकर खड़ा है। यदि किसी एक ने भी अपनी महत्वाकांक्षा और अहम से समझौता किया तो निश्चित तौर पर सपा को एक बार फिर से एकजुट होने से कोई नहीं रोक सकता। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर मुलायम, रामगोपाल, शिवपाल और अखिलेश की एकजुटता इसी उपचुनाव में अपना रंग दिखा जायेगी।

अन्दरखाने से मिली जानकारी के अनुसार उपरोक्त चारों दिग्गजों में आम सहमति पर मुहर लग चुकी है, बस प्रेस वार्ता के जरिए इसकी घोषणा शेष है। जानकारी यह भी मिली है कि शिवपाल को सपा में एक बार फिर से अहम जिम्मेदारी दी जायेगी। टिकट बंटवारे से लेकर पार्टी में लिए गए निर्णयों पर उनकी सहमति के बगैर कोई फैसला नहीं लिया जायेगा।

कहा जा रहा है कि शिवपाल यादव को पुनः पार्टी में शामिल किए जाने का फैसला बहुत जल्द लिया जायेगा क्योंकि आगामी अक्टूबर माह में उपचुनाव होने हैं। अक्टूबर माह के अंतिम दिनों में मतगणना के पश्चात फैसला भी आ जायेगा।

बताते चलें कि लोकसभा चुनाव में विधायकों के सांसद बन जाने के बाद से यूपी की 12 सीटें रिक्त हुई थीं। ये सीटें लखनऊ की कैंट, बाराबंकी की जैदपुर, चित्रकूट की मानिकपुर, सहारनपुर की गंगोह, अलीगढ़ की इगलास, रामपुर, कानपुर की गोविंदनगर, बहराइच की बलहा, प्रतापगढ़, मऊ की घोसी और अंबेडकरनगर की जलालपुर विधानसभा सीटें हैं।

उपरोक्त 12 विधानसभा सीटों में से 9 सीटें भाजपा के कब्जे में रही हैं और एक सीट उसके सहयोगी अपना दल (एस) के पास थी। चुनाव आयोग ने इन 12 सीटों में से फिरोजाबाद की टुण्डला सीट पर चुनाव की घोषणा अभी नहीं की है। 12 सीटों में से 2 सीटें सपा और बसपा के पक्ष में गयी थीं। सपा के आजम खां बसपा के रितेश पाण्डेय के सांसद बन जाने के बाद से रामपुर और जलालपुर की सीटें रिक्त हुई थीं।

सपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं का तो यहां तक दावा है कि यदि शिवपाल यादव की सपा में वापसी हो गयी तो निश्चित तौर पर इस उपचुनाव में सपा का प्रदर्शन देखने लायक होगा।

शिवपाल की सपा में वापसी के पीछे लग रही अटकलों का एक कारण और भी है। वह है उनके स्वयं का राजनीतिक अस्तित्व। प्रसपा गठन के बाद उन्हें इस बात का अहसास हो चला है कि जिस पार्टी के बैनर तले उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा उस पार्टी के बगैर उनका राजनीतिक अस्तित्व कुछ भी नहीं। अर्थात शिवपाल यादव ने यदि वक्त की नजाकत को भांपकर अपना अहम और अपनी महत्वाकांक्षाओं से समझौता नहीं किया तो निश्चित तौर पर शिवपाल यादव का राजनीतिक भविष्य संकट में पड़ सकता है। ऐसा ही हाल सपा प्रमुख अखिलेश यादव का है। यदि उन्होंने भी अपने अहम और महत्वाकांक्षा से समझौता नहीं किया तो निश्चित तौर पर यूपी में सपा को अपना अस्तित्व बचाने के लाले पड़ जायेंगे।

फिलहाल सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव भरसक प्रयास में जुटे हैं कि चाचा-भतीजे के बीच समझौता हो जाए। सपा संरक्षक का यह प्रयास क्या रंग लायेगा? इसका फैसला तो आने वाले चन्द दिनों में ही हो जायेगा लेकिन इतना जरूर है कि यदि समय रहते यह समझौता नहीं हुआ तो निश्चित तौर पर परिणाम सपा को भी भुगतने होंगे। हालांकि हाल ही में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक प्रेस वार्ता में इस बात के संकेत दे दिए थे लेकिन उसी दिन इटावा में एक प्रेस वार्ता में शिवपाल ने जसवंत नगर से उपचुनाव में उतरने का फैसला लेकर कुछ समय के लिए अटकलों को और उलझा दिया है।

राकेश श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट