CBI इंस्‍पेक्‍टर के होश उड़ गए, जब जेल में मुख्तार के गुर्गे ने पूछा, ”बी-2 बोगी की 43 नंबर सीट पर दिक्‍कत तो नहीं हुई”

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आलोक कुमार

: जेल में बंद मुख्तार अंसारी ने सीबीआई टीम को बुरी तरह चमका रखा था : रिपोर्टर की डायरी की जुबानी मुन्ना बजरंगी की कहानी : आज के संदर्भ में यह मौजूं है। बात दस साल पुरानी मगर दिलचस्प है। इसलिए शेयर कर रहा हूं। हां, यह संस्मरण सिर्फ उनके लिए जो जर्नलिज्म को पठनीय मानते हैं। रिपोर्टिंग की चुनौतियों को रोमांच रस से समझना चाहते हैं। रिपोर्टर के नाते अपना सीबीआई से याराना रहा। ठीक ठाक तालमेल रहा। टीवी में पहुंचने से पहले और टीवी से निकलने के बाद भी रिश्ता कायम है। वहां से लगातार किस्से मिलते रहे। सफल बनकर उसे दुनिया के सामने लाता रहा।

टीवी न्यूज में था। एक सुबह फोन आया। पूछा गया, “बनारस जाईएगा।” ऐसे कॉल हमेशा उत्साहित करते हैं। मैंने हामी भर दी। दफ्तर को रोमांचक किस्सों से मतलब था। उसे कैमरे पर उतार लाने का दबाव था। दोपहर ऑफिस में रिक्यूजिशन दिया। कैमरा पर्सन को साथ लिया। शाम होने से पहले उड़कर अमौसी हवाई अड्डे पर लैंड कर गए।

बनारस में सीबीआई की टीम सक्रिय थी। बीजेपी नेता कृष्णानंद राय हत्याकांड की जांच चरम पर था। मामला अंडर कोर्ट ऑब्जरवेशन था। विधायक मुख्तार अंसारी जिला जेल में। बाहर गुर्गे सक्रिय थे। सीबीआई को असामान्य स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। प्रशासन से मदद नहीं मिल रही थी। कोर्ट का डंडा चल रहा था। बनारस जेल के बाहर पंडाल लगा था। वहां हर सुबह मुख्तार अंसारी आकर समर्थकों को दर्शन देते, किसी मजलूम की मदद में पैसा आदि दान करते।

अजीब खौफ था। देश के प्रीमियर जांच एजेंसी के जांचकर्ता परेशान थे। सीबीआई पर आतंक के पर्याय मुन्ना बजरंगी ऊर्फ प्रेम प्रकाश सिंह और जीवा ऊर्फ संजीव को गिरफ्तार करने का दबाव था। जी हां, यही मुन्ना बजरंगी जिसकी हत्या बीते सोमवार की सुबह बेखौफी से बागपत जेल में कर दी गई है। हत्यारों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के जंगल में स्थित जेल को भेद दिया। वह पूर्वांचल यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश का शेर था। उसकी मौत के लिए जेल के अंदर जो हुआ शायद ऐसी घटना कोई दूसरी नहीं है। इस मर्डर से सनसनी मचा है।

जेल को सेफ हेवन मानकर मौज कर रहे तमाम गैंगस्टर परेशान हैं। बड़ा से बड़ा सेटर बैरक में सटका पड़ा है। दिग्गजों के पसीने छूट रहे हैं। बखूबी याद है। सीबीआई की टीम बनारस में छिपे जीवा ऊर्फ संजीव और राकेश पांडे को ट्रैक कर चुकी थी। लेकिन उसे पकड़ नहीं पा रही थी। मुन्ना बजरंगी चकमा दिए जा रहा था। मुन्ना बजरंगी हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में अहम मददगार बन सकता था। मुझे बनारस बुलाने की वजह उससे ही जुड़ी थी। यह बात वहां पहुंचकर पता लगी।

जेल में बंद मुख्तार अंसारी ने सीबीआई टीम को बुरी तरह चमका रखा था। कहानी खतरनाक मोड़ पर थी। सीबीआई से कहा गया है, वह गिरफ्तारी का सिलसिला बंद करे। अब और किसी पर हाथ न रखे। वरना अंजाम भुगतने पड़ सकते हैं। मुझे बताया गया, विधायक से मिलने गई सीबीआई के प्रमुख जांचकर्ता की जेल में दो अजनबियों से बारी-बारी से मुलाकात हुई। एक ने कुशलक्षेम पूछकर सूरमा के पसीने छुड़ा दिए।

जांचकर्ता को पहले तो घर में पुकार के नाम से संबोधित किया गया। फिर अजनबी ने कहा, “साहब, देर रात गाजियाबाद से शिवगंगा एक्सप्रेस पकड़ने में कोई दिक्कत तो नहीं आई।” इसे सामान्य बात समझ नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन उसने बात आगे छेडी। “साहब, आपको छोड़ने आया ड्राइवर को घर लौटने में बहुत देर हो गई थी।” इतना सुनते ही इंस्पेक्टर साहब के होश फाख्ता हो गए। मुंह पर कपड़ा लपेटे अजनबी ने पुख्ता तौर पर बता दिया कि उनको ट्रैक किया जा रहा है।

फिर कुछ दूर चलने के बाद दूसरे अजनबी ने कहा, ”बोगी नंबर बी 2 और सीट नंबर 43 पर आपकी देखरेख के लिए पहले से ही हमारे लोग थे। वहां कोई दिक्कत तो नहीं आई।” जांचकर्ता को याद आया कि रात भर जिसे वह सामान्य बात समझ टाले जा रहे थे। वह उतना सहज नहीं था। उनकी सीट के उपर बैठा व्यक्ति बड़े लाल आंखों से निरंतर उनको घूरे जा रहा था।

दूसरे अजनबी ने फिर पूछा, ”वेटर ने सुबह जो चाय पिलाई उसमें साहब, शक्कर तो ठीक थी या नहीं। खातिरदारी में कोई कमी रही हो, तो बताईएगा। अगली बार नहीं होने देंगे।” यह सुनने के बाद सदमे में फंसा जांचकर्ता बैरंग सीबीआई के ठिकाने पर लौट आना बेहतर समझा था। चोर सिपाही के इस रोमांचक खेल के बाद सीबीआई को लगा था कि किसी रिपोर्टर का साथ लिया जाए। इसके लिए न्यूज चैनल “आजतक” के बीट रिपोर्टर का साथ पसंद किया गया।

सीबीआई के बेहद इमानदार डीआईजी ने तय किया कि जबतक सीबीआई टीम बनारस में रहे, उसकी रिपोर्टर के कैमरे से अनाधिकारिक रिपोर्टिंग होती रहे। बनारस में ऑफिस की ओर से ताज होटल में हमारे रुकने का इंतजाम था। वहां सामान रख कैमरामैन प्रेमचंद के साथ रोमांचक सफर पर निकल गए। सीबीआई टीम से संपर्क साधने में लग गया। शहर के मध्य स्थित भगवान टावर में डीआईजी साहब मिले। वो मुस्कुराए। जैसे सांसत में फंसी जान लौट आई हो।

मैंने हंसी मजाक में कहा, “जनाब! बस तब तक आपके साथ हूं जबतक रोमांचक खबरें देते रहेंगे। वरना लौट जाऊंगा। जान जोखिम में रखने का न तो मुझे शौक नहीं है। न ही इस शहादत के लिए मेरे परिवार को कोई रिवार्ड चाहिए। मेरे दफ्तर को सिर्फ रोमांचक फुटेज से मतलब है। फुटेज भेजना बंद, मेरी ड्यूटी खत्म।” रोमांच भरे उस रिपोर्टिंग में वाकई आनंद आया। एक लोकल रिपोर्टर का साथ लेना चाहा। जब उसे वजह बताई, तो उसने कहा, “भाई साहब कोई सादा पेपर दीजिए। कहिए, कहां साइन करना है। इस्तीफा दे दूंगा। पर मंत्रीजी के खिलाफ रिपोर्टिंग में कोई मदद नहीं करू पाऊंगा।”

बहरहाल, बनारस पहुंचकर सबसे पहले विश्वनाथ के दर पर शीश नवाया था। फिर काम शुरु किया। कैमरा टीम के साथ कई ठिकानों पर सीबीआई की दबिश में मौजूद रहा। राकेश पांडे की गिरफ्तारी लाइव शूट की थी। मुन्ना बजरंगी को सीबीआई नहीं ढूंढ पाई। वरना तब ही सामने होता। शहर में चुनचुन सिंह की 555 सीरिज वाले काले स्कार्पियो के कारवां को कई मर्तबा शूट किया। ब्रजेश सिंह के गुमशुदगी की कहानियां सुनता रहा। बनारस की चूना मंडी और मुगलसराय के ठेकेदारी में गैंगस्टरों के रोल को समझता रहा। दिवंगत कृष्णानंद राय के लोग बताते रहे कि मुख्तार अंसारी सबके गुरु हैं।

लिखने में लगा हूं, तो मां बगल में बैठी हैं और पूछ रही हैं कि आज क्या लिख रहे हो? मैं बता रहा हूं, काशी पर लिख रहा हूं। बालक वैभव मुस्कुराते हुए बता रहा है, “दादी! काशी के जिस रुप को भजती हो, पापा उसके उलट पहलू पर कमेंटरी कर रहे हैं।” मां कह रही है, “क्या लेदर फैक्टरी पर लिख रहे हो? घाटों की गंदगी पर लिख रहे हो?” मैं बताने की स्थिति में नहीं हूं कि क्या लिख रहा हूं?

वरिष्ठ पत्रकार आलोक कुमार के एफबी वाल से साभार.

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