यह 23 जून की मनहूस सुबह थी, जिसने भारत की सियासत बदल दी

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मनोज श्रीवास्‍तव

: संजय गांधी अगर जिंदा होते तो शायद भारत की तस्‍वीर दूसरी होती : कठोर निर्णय लेने की क्षमता दूसरे नेताओं से अलग करती थी : नयी दिल्ली : 23 जून 1980, कम से कम भाजपा सांसद मेनका गांधी और वरुण गांधी इस दिन को कभी नहीं भूलेंगे। यही वो मनहूस दिन है, जब इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र और मेनका गांधी के पति की हवाई हादसे में निधन हो गया था। यह हादसा भारतीय राजनीति के इतिहास की अत्‍यंत दुखद घटनाओं में से एक है, जिसने सियासत के उभरते जिद्दी नेता को अचानक निगल गया।

संजय गांधी का निधन भारतीय सियासी इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने देश की राजनीति के समीकरण को बदल दिया। अगर संजय गांधी उस दुर्घटना के शिकार नहीं होते तो वह निश्चित रूप से देश के प्रधानमंत्री होते। संजय गांधी को ही इंदिरा गांधी का राजनीतिक उतराधिकारी माना जाता था, क्‍योंकि राजीव गांधी की दिलचस्‍पी संजय की मौत से पहले कभी भी सियासत में नहीं रही।

संजय गांधी की मौत के चार साल बाद जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्‍या हुई तब उनके बड़े पुत्र राजीव गांधी को मजबूरी में विरासत संभालने के लिए राजनीति के मैदान में उतरना पड़ा। अगर संजय गांधी जिंदा होते तो संभव था कि इंदिरा गांधी की मौत के बाद वह भारत के प्रधानमंत्री का पद सुशोभित करते। संभव था कि भारत आज जहां पहुंचा है, उससे सालों आगे होता।

संजय गांधी 14 दिसंबर 1946 को इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के दूसरे पुत्र के रूप में पैदा हुए थे। संजय बचपन से ही अक्‍खड़ स्‍वभाव के थे, जबकि उसके विपरीत राजीव गांधी शांत स्‍वभाव और राजनीति से दूर रहने वाले व्‍यक्ति थे। संजय गांधी अक्‍सर विवादों में रहे। चाहे वह इंदिरा गांधी से उनके संबंध को लेकर रहे या फिर अपने से दस साल छोटी मेनका गांधी से शादी को लेकर। माडल मेनका को स्टिंट बांबे डार्इंग के विज्ञापन में देखने के बाद ही संजय गांधी उन्‍हें चाहने लगे थे।

संजय गांधी अपने धुन के पक्‍के थे। संजय गांधी में देश के प्रति एक विजन था। वह समय से पहले सोचते थे। अगर भारतीय सियासत में संजय कुछ साल और जिंदा रह गए होते तो शायद इस देश की तस्‍वीर दूसरी होती। परिवार नियोजन, पेड़ लगवाने तथा मारुति को स्‍थापित कर आम आदमी के लिए सस्‍ती कार लाने का सपना हो संजय गांधी हमेशा दूर की सोचते थे। भारत में वह ऐसे अलहदे नेता थे, जो बिना किसी वोट बैंक की परवाह किए सख्‍ती से योजना लागू करा सकते थे।

बीबीसी के लिए पुष्पेश पंत कहते हैं, “कहीं न कहीं एक दिलेरी उस शख़्स में थी और कहीं न कहीं हिंदुस्तान की बेहतरी का सपना भी उनके अंदर था, जिसको कोई अगर आज याद करे तो लोग कहेंगे कि आप गाँधी परिवार के चमचे हैं, चापलूस हैं। लेकिन परिवार नियोजन के बारे में जो सख़्त रवैया आपात काल के दौरान अपनाया गया, अगर वो नहीं अपनाया गया होता तो इस मुल्क ने शायद कभी भी छोटा परिवार, सुखी परिवार की परिकल्पना समझने की कोशिश ही नहीं की होती।”

संजय गांधी को तेज़ हवा में विमान उड़ाने का शौक था। उनके पास विमान उड़ाने का लाइसेंस भी था। संजय गांधी के इस शौक को देखते हुए ही इंदिरा परिवार के नजदीकी धीरेंद्र ब्रह्मचारी टू सीटर जहाज ‘पिट्स एस2ए’ का आयात कराने के लिए 1977 से ही परेशान थे। यही पिट्स उनकी मौत का कारण भी साबित हुआ। धीरेंद्र ब्रह्मचारी के प्रयास से 1980 में जाकर भारत के कस्‍टम विभाग ने पिट्स को भारत लाने की मंजूरी दी। भारत आने के बाद इस जहाज को असेंबल किया गया, जिसे फ्लाइंग क्‍लब के इंस्‍ट्रक्‍टर ने उड़ाया।

उड़ान के बाद पिट्स को ओके करने के बाद संजय गांधी पहली बार इस जहाज को 21 जून 1980 को दिल्‍ली के आसमान में उड़ाया। अगले दिन 22 जून को संजय गांधी ने पत्‍नी मेनका, मां इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर उड़ान भरी। 40 मिनट तक पिट्स दिल्‍ली की फिजाओं में उड़ान भरता रहा। फिर आया वह मनहूस 23 जून। इस दिन संजय अपने दोस्‍त माधवराव सिंधिया के साथ उड़ान भरने की योजना बनाई थी, लेकिन बाद में किसी कारण से फ्लाइंग क्‍लब के पूर्व इंस्‍ट्रक्‍टर सुभाष सक्‍सेना के साथ उड़़ान भरने का प्‍लान बना लिया। सक्‍सेना पिट्स के अगले हिस्‍से में बैठे, जबकि संजय गांधी पीछे की तरफ बैठे।

संजय गांधी 7 बजकर 58 मिनट पर हवा में टेक आफ किया। संजय ने सुरक्षा नियमों की परवाह ना करते हुए दिल्‍ली के रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगा लिए। संजय चौथी लूप लगाने ही वाले थे कि कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है, वह घबरा गया। वह कुछ कर पाता पिट्स तेज़ी से नीचे की तरफ मुड़ा और जमीन से जा टकराया। सुभाष सक्‍सेना का सहायक साइकिल भगाता हुआ घटनास्‍थल पर पहुंचा, लेकिन तब तक टू सीट पिट्स मलबे में बदल चुका था।

संजय गाँधी का शरीर विमान के मलबे से चार फ़ीट की दूरी पर छत-विक्षत पड़ा था, जबकि कैप्टेन सक्सेना के शरीर का निचला हिस्सा विमान के मलबे में दबा हुआ था, उनका सिर बाहर की तरफ निकला हुआ था। इन दोनों को बचने का भी मौका भी नहीं मिला। इस हादसे की जानकारी होने पर इंदिरा गांधी बदहवास घटनास्‍थल की तरफ अपने सहायक आरके धवन के साथ भागी। तब तक संजय और सुभाष का शव एंबुलेंस में रखकर लोहिया अस्‍पताल ले जाया जा रहा था।

रानी सिंह अपनी किताब ‘सोनिया गाँधी: एन एक्सट्राऑर्डिनरी लाइफ़’ में लिखती हैं,  ”इंदिरा गाँधी खुद एंबुलेंस में चढ़ गईं और राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचीं। वहां डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया। सबसे पहले अस्पताल पहुंचने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर थे।” अपनी किताब ‘इंदिरा गांधी’ में पुपुल जयकर लिखती हैं,  ”इंदिरा को अकेले खड़े देखकर वाजपेयी ने आगे बढ़कर कहा कि इंदिरा जी इस कठिन मौके पर आपको बहुत साहस से काम लेना होगा। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन वाजपेयी की तरफ इस अंदाज़ से देखा मानो यह कह रही हों कि आप कहना क्या चाह रहे हैं?”

जयकर आगे लिखती हैं, “वाजपेयी थोड़े से विचलित हुए और सोचने लगे कि उन्होंने इंदिरा से यह कहकर कोई गलती तो नहीं कर दी। इसके बाद इंदिरा चंद्रशेखर की तरफ मुड़ीं और उन्हें एक तरफ ले जाकर बोलीं कि मैं कई दिनों से आपसे असम के बारे में बात करना चाह रही थी। वहां हालात बहुत गंभीर हैं। चंद्रशेखर ने कहा कि इसके बारे में बाद में बात करेंगे। इंदिरा ने जवाब दिया कि नहीं-नहीं, ये मामला बहुत महत्वपूर्ण है। आश्चर्यचकित चंद्रशेखर की समझ में ही नहीं आया कि कि एक माँ कैसे असम के बारे में बात कर सकती है, जबकि उसके बेटे का शव बगल के कमरे में पड़ा हुआ है।”

संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी के तेवर ठीक अपने पिता की तरह हैं। वरुण की विशेषता यह रही है कि वह भी पिता की तरह कभी भी दबाव में झुके नहीं। भाजपा में शीर्ष नेतृत्‍व ने अपनी तरफ से वरुण को हाशिए पर भेजने की कोशिश की, लेकिन बिना भेदभाव के सबके मुसीबत में मदद करने के गुण के चलते उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। वरुण सुल्‍तानपुर के साथ कई अन्‍य जिलों में किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाने तथा जनता को आवास उपलब्‍ध कराने में दिनरात एक किए हुए हैं।

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वरिष्‍ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.