जब डबडबाई आंखों से उस रिक्‍शे वाले ने कहा – रोज का 50 रुपये करके जमा कर दूंगा

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फिल्म
डाइरेक्टर संजय सिंह

संजय सिंह

  • अब मुझे 120 और 130 रुपये का मतलब समझ में आ चुका था

1999 की बात रही होगी। दिल्ली में चांद सिनेमा से निकलकर शशि गार्डन के लिए साइकिल रिक्शा लिया। बात 10 रुपए में तय हुई। रिक्शा वाला कमजोर दिख रहा था, उम्र भी ज्यादा थी। यह बात जानता था कि थोड़ा समय ज्यादा लगेगा, क्योंकि यह तेजी से रिक्शा नहीं चला पायेगा।

उन दिनों न तो 4जी था, न उबर और ओला। बसें लंबे इंतजार के बाद आती थीं। रिक्शा पर चलते हुए नोटिस किया कि वो कुछ बुदबुदा रहा था। मैं जो सुन पाया वो था 120 और 10 माने 130। बाकी कुछ खास नहीं। ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया। पहुँचने के बाद 10 रुपया दिया और बढ़ गया।

धीरे धीरे अंधेरा हो रहा था। शाम को सवा 6 बज रहे होंगे, क्योंकि 3 से 6 की फिल्म देखकर निकला था। जैसे ही आगे बढ़ा, रिक्शा वाले की आवाज आई। ए बाबू तनी इसको पढ़कर बता दीजिए क्या लिखा है? वापस आया तो उसने एक मोड़ी हुए पर्ची पकड़ा दी।

उसको पढ़ा। उसमें कुछ 3 किलो आटा, 1 किलो चावल, एक पाव रिफाइन, 5 रुपये की हल्दी इत्यादि जैसी एक लिस्ट थी, जो पेंसिल से लिखी हुई थी। अब मुझे 120 और 130 रुपये का मतलब समझ में आ चुका था। मैंने पूछा आप के साथ कौन कौन रहता है और आप कहाँ रहते हैं?

बोले बाबू इसको पढ़कर बता दीजिए देरी हो रही है। जोर देने पर बताया कि उनकी पत्नी, एक ही बेटी है, जिसकी शादी हो चुकी है। वो आजकल आई हुई है। एक छोटी नतिनी है। बिहार के रहने वाले हैं। पाहुन किसी सब्जी मंडी में किसी सेठ के यहां काम करते हैं, शायद आज़ाद पुर बताया।

जहां मैं उतरा था वहाँ से मेरे रेगुलर राशन वाले चचा की दूकान कुछ कदमों की दूरी पर थी। उनको वहां ले गया और चार लोगों के लिए जितना मेरे घर मे राशन लगता लगभग उतना एक बोरी में पैक करवाना शुरू किया। दुकान वाले मोहन चाचा भी इशारा कर रहे थे कि इतना मत करो।

मैंने उनसे पूछा कि आपका कितना बकाया है, अब तक? तो बोले कुछ नहीं। फिर आपको दिक्कत क्या है? उनहोंने कहा जो मर्जी आए करो।  रिक्शा वाले बुजुर्ग संकोच के मारे कई बार मना किये, पर जब देखा कि नहीं मानेगा तो फुट फुट कर रोने लगे।

बोले रोज रोज 50 रूपया करके इस दुकान पर जमा कर दूंगा। मैंने कहा जब भी आपको वापस करने का मन करे तो अपना भतीजा समझ कर आशीर्वाद दे दिया कीजियेगा। मेरे पास पहुँच जाया करेगा। उनका गमछा गीला होता जा रहा था। मोहन चचा भी डबडबा गए।

कई बरस हो गए। पर इस घटना के बाद मैं अक्सर साइकिल रिक्शा पर ही चलने की कोशिश करता हूँ । कल गोरखपुर में स्टेशन के पास के बस अड्डे से यूनाइटेड सिनेमा के पास जाते वक्त भी जो अनुभव हुआ वो भी मार्मिक था।

कुछ लोग इनके बारे में तरह तरह की बातें करते हैं, पर परत के अंदर भी परतें होती हैं। यह मेरा अनुभव है। कुछ महीनों पहले बलिया में सोनबरसा हॉस्पिटल से बैरिया जाते वक्त जो मिले थे, उन पर तो शॉर्ट फिल्म बनाऊंगा। विचलित हो गया था उनको जानकर, सुनकर। उनका मदद लेने का तरीका भी नायाब था।

बाबा का ढाबा से जो शुरुआत हुई है, इसे हम अपने स्तर पर बढ़ाने की कोशिश सामर्थ्य अनुसार करते रहें। बाबा का सेव, बाबा की मूंगफली, बाबा का रिक्शा, बाबा की सब्जी इत्यादि। निश्चित तौर पर हम सबने भी ऐसा कुछ किया ही होगा, महसूस किया होगाl इसे आगे बढ़ाते रहें।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्‍ठ मीडियाकर्मी, फिल्‍मकार एवं लेखक हैं. आजकल पत्रकारिता के अध्‍यापन के कार्य से जुड़े हुए हैं.