अब तो बस आवाज ही आवाज है

राज बहादुर सिंह

बहस मुबाहिसे से श्रेष्ठता को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचना मुमकिन हो सकता है लेकिन यह तय कर पाना मुश्किल है कि रफी साहब इंसान बेहतर थे या गायक बेहतर। जैसे उनके कंठ से निकले नगमों की तादाद कम नहीं है वैसे ही उनकी सज्जनता, विनम्रता और सद्भावना के किस्से भी कम नहीं हैं। और दो तरफा कामयाबी और शोहरत के लिए उन्हें परवरदिगार ने केवल 56 साल की हयात बख्शी लेकिन यह उनकी उपलब्धि को कमतर न कर सकी।

रफी साहब की गायकी के तमाम तकनीकी पहलुओं पर तो कोई मायनाज फनकार ही रौशनी डाल सकता है। मैं तो जो कुछ कहूंगा वह तो बतौर श्रोता की हैसियत से ही होगा। उनकी दिलकश आवाज और गाने के और भी दिलकश अंदाज के शैदाई के तौर पर। विविध भारती से लेकर विविध उपलब्ध माध्यमों से गीत सुने और खूब सुने और खूब लुत्फ उठाया। और यह सिलसिला अब भी जारी है और ताउम्र रहेगा।

रफी साहब में बतौर गायक न जाने कितनी खूबियां थीं और इनमें से एक थी कि उन पर कोई किसी कैम्प विशेष के होने का ठप्पा नहीं लगा सकता। अमूमन लोग उन्हें केवल नौशाद साहब से जोड़ देते हैं। यह ठीक है कि नौशाद साहब से उनकी अच्छी ट्यूनिंग थी और उनके कैरियर के शुरुआती दिनों में वह मददगार भी थे लेकिन उस दौर का कौन ऐसा संगीतकार था जिसका गुजारा रफी साहब के बगैर हुआ हो।

बात चाहे कालजयी शंकर-जयकिशन की हो, सचिन दा की हो या फिर रौशन और ओपी नैय्यर की हो या फिर गजल के शहंशाह मदन मोहन साहब की हो। रफी साहब ने नए संगीतकारों के साथ काम करने से कभी गुरेज नहीं किया और उनकी आवाज के सहारे एलपी जैसे संगीतकार महानता की सीढ़ियां चढ़ते गए। ऊषा खन्ना और इकबाल कुरेशी जैसे नए म्यूजिशियन को भी उनका साथ मिला।

रफी साहब की रेंज के बारे में इतना ही कह सकता हूं कि ” न भूतो न भविष्यति ” । न कोई हुआ और कोई होगा इसकी कामना तो की जा सकती है लेकिन यह पूरी होगी, कम से कम मैं तो इसे लेकर मुतमइन नहीं हूँ। उनके समकक्ष गायकों में रफी साहब की बड़ी इज्जत थी। मन्ना डे ने उनकी श्रेष्ठता को स्वीकार किया और किशोर कुमार तो उनके कितने बड़े फैन थे इसका अंदाज़ा इस हक़ीक़त से लगाया जा सकता है कि किशोर दा के ड्राइंग रूम में केवल एक तस्वीर थी। और वह थी हर दिल अजीज रफी साहब की। महेन्द्र कपूर तो उनके मुरीद थे और उन्हें उस्ताद का दर्जा देते थे।

रफी साहब ने राज कपूर के अलावा तकरीबन सभी बड़े अभिनेताओं को अपना स्वर दिया लेकिन सिर्फ यही उन्हें महान नहीं बनाती। जानी वाकर और महमूद जैसे कॉमेडियन्स पर भी उनकी आवाज खूब फबी। याद कीजिये-सर जो तेरा चकराए या फिर महमूद पर- काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। या फिर महमूद पर फिल्माए गीत- मैंने रखा है मोहब्बत अपने दीवाने का नाम या फिर-ये तेरी, सादगी ये तेरा बांकपन।

कहने का सार यह कि हर तरह के कलाकार के लिए रफी साहब फिट थे। अलबत्ता हयात के खांचे में वह फिट नहीं हुए।। हयात ने उनका साथ नहीं दिया। महज 56 साल की उम्र में रफी साहब हमें छोड़ गए। और हम यह कहते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं–

छुप गए वो साज-ए-हस्ती छेड़ कर
अब तो बस आवाज ही आवाज है।

rbsराज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.