‘एक देश में दो निशान, दो प्रधान और दो विधान’ नहीं चाहते थे डा. मुखर्जी : राम नाईक

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: राज्‍यपाल समेत कई मंत्रियों ने दी श्रद्धांजलि : लखनऊ : उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने शनिवार को डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस के अवसर पर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी चिकित्सालय (सिविल अस्पताल) प्रागंण स्थित उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर प्रदेश की मंत्री रीता बहुगुणा जोशी, मंत्री बृजेश पाठक, राज्यमंत्री स्वाती सिंह, राज्यमंत्री डा. महेन्द्र सिंह, राज्यसभा सांसद अशोक बाजपेई, विधायक सुरेश श्रीवास्तव, महापौर डा. संयुक्ता भाटिया सहित अन्य अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

राज्यपाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के प्रति यह श्रद्धांजलि होगी कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश के प्रति जो मिसाल प्रस्तुत की है, उसी रास्ते पर हम सब मिलकर चलें। कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का मानना था कि ‘एक देश में दो निशान, दो प्रधान और दो विधान’ नहीं होना चाहिए। इस बात को लेकर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्याग्रह भी किया था। डा. मुखर्जी ने सदैव राष्ट्रीय एकता की स्थापना को अपना प्रथम लक्ष्य रखा। उन्होंने कहा कि आज के परिप्रेक्ष्य में उनके जैसा सिद्धांतवादी व्यक्तित्व युवा वर्ग के लिये प्रकाश स्तम्भ के समान है।

श्री नाईक ने कहा कि महात्मा गांधी के कहने पर आजादी के बाद प्रथम केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में कोलकाता से डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा महाराष्ट्र से बाबासाहेब आंबेडकर को स्थान दिया गया। कश्मीर को लेकर वैचारिक मतभेद होने के कारण उन्होंने मंत्रिमण्डल से त्याग पत्र दे दिया तथा भारतीय जनसंघ की स्थापना की। लोकसभा में जनसंघ के मात्र तीन सदस्य होने के बावजूद भी विपक्ष के लोगों ने एकजुट होकर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नेता विपक्ष के रूप में मान्यता दी। उन्होंने कहा कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने सिद्धांतों और विचारों से कभी समझौता नहीं किया।

राज्यपाल ने कहा कि डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन प्रेरणामयी था। उनमें अद्रभुत विद्वता थी तथा उनकी भाषा शैली की विशेषता थी कि बड़ी सहजता से वे अपनी बात दूसरों तक पहुँचा सकते थे। महज 33 वर्ष की आयु में वे कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति बने थे, जो अपने आप में एक उदाहरण है। वे महान शिक्षाविद् चिंतक तथा भारतीय जनसंघ के स्थापक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता और संविधान की रक्षा के लिए डा. मुखर्जी ने अपने जीवन का बलिदान दिया था।