मुख्‍य सचिव ने उस अंग्रेज लेडी से कहा, ”कहिए तो आकर अकेलापन दूर कर दूं”

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दयानंद पांडेय

: सीएम नारायण दत्‍त तिवारी ने हटा दिया : लखनऊ : एक समय उत्तर प्रदेश में मुख्य सचिव थे रामलाल। मुख्य सचिव मतलब प्रदेश का सब से बड़ा अफ़सर। नारायणदत्त तिवारी मुख्य मंत्री थे और इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री। लंदन से एक मिनिस्टर सपत्नीक आए थे सरकारी यात्रा पर। मंत्री की पत्नी के पिता ब्रिटिश पीरियड में लखनऊ की रेजीडेंसी में रह चुके थे। मिनिस्टर की पत्नी बिना किसी प्रोटोकाल के लखनऊ घूमना चाहती थीं। रेजीडेंसी देखना चाहती थीं। पिता की यादों को ताज़ा करना चाहती थीं।

इंदिराजी ने नारायणदत्त तिवारी से बिना किसी प्रोटोकाल के किसी सीनियर अफ़सर को उन के साथ लगा देने को कहा। तिवारीजी ने सीधे मुख्य सचिव को ही उन के साथ लगा दिया। मुख्य सचिव रामलाल ने मोहतरमा के साथ पूरा सहयोग करते हुए लखनऊ घुमाया। मोहतरमा उन के साथ बहुत ही सहज हो गईं। कह सकते हैं कि खूब खुल गईं।

देर शाम कोई आठ बजे रामलाल ने मोहतरमा का हालचाल लेने के लिए फ़ोन किया और पूछ लिया, कैसी हैं। मोहतरमा बेकत्ल्लुफ़ हो कर बोलीं, अकेली हूं। रामलाल तब तक देह में शराब ढकेल चुके थे। कुछ शराब का असर था, कुछ मोहतरमा की बेतकल्लुफी। रामलाल बहक गए। सो बोले, कहिए तो मैं जाऊं, अकेलापन दूर कर दूं। मोहतरमा ने बात टाल दी और पलट कर अपने पति से रामलाल की लंपटई की शिकायत की।

पति ने इंदिरा गांधी को यह बात बताई। इंदिरा गांधी फोन कर नारायणदत्त तिवारी पर बरस पड़ीं कि किस बेवकूफ को साथ लगा दिया! अब दूसरे दिन रामलाल जब आफिस पहुंचे तो वहां उन के आफ़िस में ताला लटका मिला। ताला देखते ही वह भड़क गए। बरस पड़े कर्मचारियों पर। लेकिन ताला फिर भी नहीं खुला। तो वह और भड़के, कि तुम सब की नौकरी खा जाऊंगा! लेकिन ताला नहीं खुला तो नहीं खुला।

मौका देख कर एक जूनियर अफ़सर उन के पास आया और धीरे से बताया कि माननीय मुख्यमंत्रीजी के निर्देश पर यह सब हुआ है, कृपया माननीय मुख्यमंत्री जी से मिल लीजिए। अब रामलाल के होश उड़ गए कि क्या हो गया भला? भाग कर मुख्यमंत्री आवास गए। तिवारी जी शालीन व्यक्ति हैं, संकेतों में सब समझा दिया। लेकिन रामलाल अब मुख्य सचिव नहीं रह गए थे।

उन्हें परिवहन निगम का चेयरमैन बना दिया गया था। लेकिन तब यह खबर किसी अख़बार में नहीं छपी, लेकिन बहुत पहले जब यह किस्सा एक आईएएस अफ़सर ने मुझे सुनाया तो मैं ने उन्हें खुमार बाराबंकवी का एक शेर सुना दिया :

हुस्न जब मेहरबां हो तो क्या कीजिए 
इश्क के मग्फिरत की दुआ कीजिए।

कोई धोखा न खा जाए मेरी तरह 
सब से खुल कर न ऐसे मिला कीजिए।

तो क्या यह भी मी टू ही था?

लेखक दयानंद पांडेय जानेमाने वरिष्‍ठ पत्रकार एवं उपन्‍यासकार हैं. इनकी कई कहानियां तथा उपन्‍यास की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. श्री पांडेय खरी-खरी लिखने-बोलने के लिए जाने जाते हैं. राष्‍ट्रीय सहारा समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनका लिखा एफबी वॉल से साभार लिया गया है.