…और सौभाग्‍य देखिये कि स्‍पोर्टस कार दिलाने आ गया कोरोना!

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अनिल सिंह

बीते साल सूखा नहीं पड़ा था, और दुर्भाग्‍य से बाढ़ भी नहीं आई थी. यह बहुत ही विषम परिस्थिति थी. बड़े हाकिम लोग, जिन्‍हें आजादी के बाद आईएएस कहा जाने लगा था, तकलीफ में थे. इस साल उन्‍हें जनता की सेवा करने का मौका नहीं मिल पाया था, और जनता की सेवा किये बगैर कोई आईएएस रह जाये, यह वैसा ही पाप था जैसा सतयुग में रावण ने लघुशंका के चक्‍कर में शिवलिंग को चरवाहे को थमा देने का किया था. एक हाकिम ने अपने बच्‍च से वादा किया था कि इस बरसात तुम्‍हें स्‍पोर्टस कार दिलायेंगे, और दुर्भाग्‍य देखिये कि ना तो  सूखा पड़ा और ना ही बाढ़ आई. अचानक आई इस आपदा से हाकिम के साथ उनका पूरा ऑफिस भी दुखी था. कई सपने जन्‍म लेने से पहले गर्भ में ही कालकवलित हो गये थे. ये अत्‍यंत महाविनाशकारी साल था.

इस हृदय विदारक आपदा से केवल राहत विभाग ही नहीं, बल्कि सूखा, बाढ़, ओला, बरबादी  में काम आने वाले तमाम विभागों के लोग भी दुखी थे. बहुतेरों मेहनती और ईमानदार सरकारी कर्मचारियों ने बाढ़ और सूखे के भरोसे ही देश-विदेश घूमने, जमीन-मकान बनवाने तक के छोटे-मोटे सपने पाल रखे थे, लेकिन भगवान ने उनके सपनों पर वज्रपात कर दिया था, और वो भी तब, जब वे हर रविवार की सुबह गाय को घास-रोटी खिलाते थे, शाम को चीटियों के बिलों में मीठा आटा डालते थे तथा हर मंगल-शनि को हनुमान मंदिर जाते थे. इन्‍हीं सत्‍कर्मों के चक्‍कर में पिछले दसियों सालों से ये सदाचारी कर्मचारी लोग एक बार भी टाइम पर ऑफिस नहीं पहुंच पाये थे, उसके बाद भी भगवान ने इतनी कठोरता दिखाई थी. यह दिल तोड़ देने तथा मन को झकझोर देने वाला हादसा था.

कैसी भी मुश्किल हालात में हिम्‍मत ना हारने वाले हाकिम लोग अक्‍सर  कागजों पर भी बाढ़-सूखा लाने की क्षमता से लैस थे, ठीक वैसे ही जैसे मेघनाथ नागपाश लाने की क्षमता से. इनकी कलम इतनी ताकतवर थी, कि खुद की मेहनत से लाये गये सूखे-बाढ़ में पूरा ऑफिस हरा-भरा कर देते थे, कानों कान किसी को खबर तक नहीं होती थी, लेकिन कहावत हैं ना कि हर दिन ना होत एक समाना! इन पर भी ऐसा ही वज्र टूट पड़ा है. कागजों पर बाढ़-सूखा लाने की क्षमता में बीते तीन सालों में उसी तरह मुश्किल आई है, जैसे पाकिस्‍तान को कर्ज मिलने में आई है. नये वाले मुखिया को लंदन में होटल वगैरह खरीदने में कतई दिलचस्‍पी नहीं है, और ना ही बादल या आसमानपुर महल बनवाने का कोई शौक! इसलिये गाय-चींटी से मामला कंट्रोल नहीं हो पा रहा है, और यह एक ऐतिहासिक घटना है, जो अर्थशास्‍त्र से जुड़कर भौतिक विज्ञान को मात दे रही है.

कहते हैं ना कि भगवान के घर अंधेर भले हो, लेकिन देर नहीं होता है! ऐसा ही हुआ है, भगवान से गाय-चींटियों के पालनकर्ताओं की दुर्दशा देखी ना गई और इनके बीबी-बच्‍चों की प्रार्थना सुन ली, जो तमाम सपनों के असमय गर्भपात हो जाने से दुख के भारी सागर में गोते लगा रहे थे. भगवान ठहरे दयालू, उनसे यह दुख देखा ना गया. फटाक से उन्‍होंने पीड़ा से जूझ रहे हाकिमों की मदद के लिये कोरोना को भेजा और पिछले दस साल में सूखा-बाढ़ ना आने से हुए नुकसान की भरपाई एक साथ कर दी. सारे हाकिम एक साथ मिलकर जनता की सेवा कर रहे हैं. जमीन पर बहुतेरे काम हो रहे हैं, लेकिन उससे ज्‍यादा हवा में और सबसे ज्‍यादा कागजों पर राहत काम शुरू हो चुके हैं.

कोरोना ने जो खुशियां हाकिमों को दी है, उतनी खुशी अंग्रेजों को यह देश लूटते समय भी शायद ही मिली हो! जनता की सेवा में ये हाकिम इतने बिजी हैं कि ये किसी का भी फोन नहीं उठा पा रहे हैं, फोन थककर स्‍वीच ऑफ हो जा रहे हैं, क्‍योंकि कागजी सेवा इतना आसान नहीं होता, जितना मूर्ख आम आदमी समझ लेता है. वैसे, लॉकडाउन के चलते ये जानकारी नहीं मिल पा रही है कि हाकिम लोग ठेकेदारों-दलालों-बिचौलियों इत्‍यादि से सेवा शुल्‍क अपनी मां के एकाउंट में मंगवा रहे हैं, पेटीएम करवा रहे हैं या फिर नकद ही ले रहे हैं! मैं उन ऐतिहासिक अर्थशात्रियों को भी सलाम करता हूं जो गांव की चार बीघा जमीन बेचकर शहर में पचासों बीघा ले लिये हैं! ये सब करना भी इतना आसान नहीं होता, जितना आम आदमी समझ लेता है!