पुलिस को क्‍यों नहीं मिल पाता है अंधेरे का लाभ?

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2042

अनिल सिंह

पुलिस को लेकर मेरे मन में एक अलग तरह के सम्‍मान भाव बचपन से ही रहे हैं। मैं पुलिस को चमत्‍कारी मानता हूं, क्‍योंकि जो चमत्‍कार पुलिस कर सकती है, उसे करना भगवान के वश की भी बात नहीं है। परंतु, कुछ नासपीटों को पुलिस में हमेशा ही खामी नजर आती है। पुलिस इन नासपीटों को मुफ्तखोर, हरामखोर, ठग, बेईमान, भ्रष्‍ट, कमीनी, लापरवाह, लालची, आतंकी, धोखेबाज, अविश्‍वसनीय नजर आती है। वैसे, पुलिस को इन नासपीटों की कतई परवाह नहीं करनी चाहिए।

हां, यह और बात है कि पुलिस अपने अधिकारियों और सत्‍ताधारी नेताओं को छोड़कर किसी की परवाह करती भी नहीं है। करनी भी नहीं चाहिए। पुलिस की नियुक्ति जब ड्यूटी करने के लिये है तो वह परवाह किसी की क्‍यों करे? पुलिस की महानता के बारे में लिखना आसान नहीं होगा। पृथ्‍वी के सारे पेड़ों की कलम और समुद्र को स्‍याही बना लिया जाये, तब भी पुलिस की महिमा, चमत्‍कार का बखान संभव नहीं है। पुलिस चमत्‍कार पर चमत्‍कार करती है, और अपराधी भोंश्री और माधर भाव से पुलिस को मन में धन्‍यवाद देता रहता है।

चमत्‍कार से याद आया कि कैसे मेरे जैसे अबोध और अज्ञानी व्‍यक्ति में एक खूंखार अपराधी बैठा था और मुझे इसकी भनक तक न थी। मैं पुलिस के हत्‍थे चढ़ा तब जाकर पता चला कि‍ मैं कट्टा और हेरोइन लेकर घूमता था। धमकी देकर वसूली भी करता था। मुझे कट्टे और हरोइन पर गुस्‍सा आया कि साथ होकर भी मुझे कभी दिखे क्‍यों नहीं? धमकी से भी नाराजगी हुई कि मुझसे कभी मिली क्‍यों नहीं? खैर, मैं पुलिस के इस चमत्‍कार के समक्ष नतमस्‍तक था, भावविभोर था, कि पुलिस ना होती तो मुझे कभी पता ही नहीं चलता कि मैं मैं इतना बड़ा अपराधी हूं और कट्टा-हेरोइन लेकर चलता हूं।

बहरहाल, यह भी तय है कि पुलिस जनता के लिये कितना भी कर दे, जनता एहसान फरामोश ही रहती है। अपराधियों की जेब से हेरोइन की पुडि़या और हाफ ब्‍लेड तक ढूंढ निकालने वाली पुलिस को केवल उनके परिवार वालों और सत्‍ता में बैठने वालों के अलावा कोई प्‍यार नहीं करता, विपक्ष भी नहीं। जनता तो खैर एहसान फरामोश ही है। अब पुलिस चोरी गई कार, बाइक, मोबाइल, सोना-चांदी नहीं ढूंढ पाती तो इसमें उसकी क्‍या गलती है? लोगों के पास हेरोइन, ब्‍लेड, कट्टा, गांजा, चाकू, दो शीशी शराब ढूंढने में भी तो टाइम और मेनहत लगता है। आखिर पुलिस क्‍या-क्‍या ढूंढे-खोजे?

आरोप लगाने वाली जनता नासमझ है, कहती है कि पुलिस काम नहीं करती। जब अपराध बढ़ता है तो जनता पुलिस को कोसती है, पर यह नहीं सोचती कि जब अपराध बढ़ेगा ही नहीं तो पुलिस काम क्‍या करेगी? बिना अपराध बढ़े पुलिस कौन सा काम करेगी, इसलिये अपराध बढ़े तो समझिये कि पुलिस काम कर रही है। पुलिस काम करने के लिये अपराध को बढ़ाती है ताकि वेतन का पाई-पाई का लाभ सरकार को दिला सके। अपराध बढ़ने की स्थिति में तो जनता को खुश होना चाहिए कि पुलिस काम में लगी हुई है। और काम में लगी है, तभी तो अपराध बढ़ रहा है। फिर भी कुछ नासमझ लोग पुलिस को खाली समझते हैं।

वैसे भी, खाली दिमाग शैतान का घर होता है। पुलिस भी खाली रहेगी तो यहां छापामारी करेगी, वहां छापामारी करेगी। बिना वजह लोग परेशान होंगे। अब पुलिस किसी धन्‍ना सेठ के गोदाम पर छापामारी करने, किसी सेठ के बैंक लॉकर को तलाशने, चोरी-छुपे काम करने वालों को परेशान करने के लिये तो बैठी नहीं है। पुलिस का काम है कि अपराध होने के बाद अपराधी को पकड़ना, इसलिये अपराध बढ़ेगा तभी तो वह काम करेगी, अपराध बढ़ेगा नहीं तो पुलिस रोकेगी किसको? अपराध बढ़ना तो पुलिस के काम करने का सबूत है।

कुछ तो पुलिस पर घिनौने आरोप लगाने से भी नहीं हिचकते हैं। और सबसे दुखद तो यह है कि आरोप लगाते समय पुलिस के स्‍टैंडर्ड का ख्‍याल तक नहीं रखा जाता है। बहुतेरे आरोप लगा देते हैं कि पुलिस अपने संरक्षण में हेरोईन, शराब, गांजा, अफीम, चरस, डीजल, पेट्रोल बिकवा रही है। भई, अब इन मुंहझुलसों को कौन समझाये कि पुलिस यह सब नहीं बिकवायेगी तो क्या मूंगफली, चना और भूजा बिकवायेगी? आखिर स्टैण्डर्ड भी तो कोई चीज होती है!

कुछ चिरकुट तो यह भी आरोप लगा देते हैं पुलिस नकली सामानों की बिक्री करवा रही है। भई, तो क्या हमारे देश की पुलिस इतनी अमीर है कि वो फैक्ट्री खुलवाकर असली सामान बनवा कर बिकवायेगी? तुम्‍हें डूब मरना चाहिए मरकिरौनों कि पुलिस यह सारे काम तो बिल्‍कुल फ्री, बिना किसी तनख्वाह के करती है, सेवा भाव से करती है। सरकार तो उसे सिर्फ अपराध रोकने के पैसे देती है, पुलिस तो इस तरह के काम जनहित में करती है और इसका कोई वेतन भी नहीं लेती है। समाजसेवा समझ कर करती है। अब ऐसे में कोई आरोप लगाये तो बुरा तो लगेगा ही!

वैसे भी, जो काम सरकारों को करना चाहिए, वह काम पुलिस अपने बूते कर रही है। पुलिस अपने निजी प्रयास से सैकड़ों बेरोजगारों को अपने दम पर रोजगार उपलब्ध करवा रही है। गली, चौराहों, नुक्कड़ पर ट्रक, बस, ठेला, खोमचा, मिट्टी के तेल को डीजल बनाने वालों, पानी को शराब बनाने वालों, सरकारी सामानों को बाजार में बेचने वालों से राजस्व अर्जन के कार्य में तमाम बेरोजगार युवकों को लगाकर पुलिस उन्‍हें रोजगार दे रही है। अपने संरक्षण में हेराइन, गांजा, शराब बिकवाकर भी पुलिस ने कई लोगों को स्‍वावलंबी बना रखा है। पुलिस की तो जयकार होनी चाहिए। इसके लिये सम्‍मान होना चाहिए!

पुलिस अपने लाभ के लिये कुछ भी नहीं करती है। यहां तक कि अंधेरे का लाभ भी पुलिस को नहीं मिलता है। अंधेरे के लाभ को लेकर मुझे शुरू से ही खुन्‍नस रही है। अंधेरे से मेरी इसी के चलते कभी पटी नहीं, क्‍योंकि अंधेरे का लाभ उठाकर बदमाश का एक साथी भाग जाता है और पुलिस को अंधेरे का कोई लाभ नहीं मिल पाता है। आखिर अंधेरे को पुलिस से इतनी जलन क्‍यों होती है कि वह उन्‍हें कोई लाभ नहीं उठाने देता है। पुलिस ने इस अंधेरे का क्‍या बिगाड़ रखा है, जो उसे लाभ देने में संकोच करता है?

याद है ना, पुलिस को मुखबिर से सूचना मिलती है, फलाने बदमाश बड़ी घटना को अंजाम देने जा रहे हैं, पुलिस अपने पेटेंट अड्डे, यह देश में हर पुलिस थाने का अपना एक बिना बैनामे की जमीन होती है, पर घेरेबंदी करती है। बदमाश किधर से भी आये, पायेंगे कि घेरेबंदी वहीं होती है। दो बदमाश आते हैं, पुलिस हाथ देती है, बाइक की रफ्तार बढ़ जाती है, पीछे बैठा बदमाश पुलिस पर गोली चलाता है, आत्‍मरक्षार्थ पुलिस भी गोली चलाती है, एक बदमाश नीचे गिर जाता है, दूसरा बदमाश अंधेरे का लाभ उठाकर भाग जाता है। ये अंधेरा भी नासपीटा पुलिस वालों से जलन रखता है।

खैर, पुलिस तो जनता की सेवा के लिये है। पुलिस का काम है समाज से अपराध को कम करना, पुलिस जब अपराध कम करने के लिये मामलों को दर्ज नहीं करती तो कुछ लोगों का गुर्दा दुखने लगता है। आखिर आंकड़ों में अपराध कम होगा, तभी तो जुर्म कम होंगे। अगर आप लूट लिये जाते हैं, आपके दुकान का शटर तोड़ दिया जाता है, घर में चोरी कर ली जाती है, रेप होता है तो इसमें पुलिस का दोष कहां है? पुलिस ठीक करती है जो आपका मामला दर्ज नहीं करती है? जब सारे अपराध पुलिस ही रोकेगी तो हम और आप क्या करेंगे?