पत्रकार विरोधी सरकार और अपने नेता हेमचंद्रजी

Anti-Journalist

अनिल सिंह

परलोक भवन में अचानक अवस्‍थी साहब के ऑफिस का दरवाजा खुला और हेमचंद्र धड़धड़ाते कदमों से अंदर घुस गये. उनके साथ दो-तीन लोग और थे. कुर्सी पर बैठते ही हेमचंद्र ने थोड़ी तेज आवाज में कहा, ”क्‍या अब यह सरकार हम जैसे पत्रकारों के जीने पर भी पाबंदी लगायेगी? सेंसर करेगी?” Anti-journalist

मनमोहन अवस्‍थीजी ने हेमचंद्र की बात सुनने के बाद कहा, ”हेमजी पहले आप चाय पीजिये, फिर हम आपकी समस्‍या सुनते हैं.” Anti-journalist

अरे हां, हेमचंद्रजी के बारे में तो बताना भूल ही गया!

तो आपको बताते हैं कि हेमचंद्र जी पत्रकारों के जाने माने नेता हैं. चुनावी काल में निकलते हैं, सलाम दुआ करते हैं और फिर जीत कर किसी महानगर निकल जाते हैं. इनके अधिकांश संगी साथी पढ़ने-लिखने जैसे फालतू कामों में ज्‍यादा टाइम बरबाद नहीं करते, और अफसर-नेता के घरे-द्वारे बराबर टहला करते हैं, लिहाजा इनका प्रचार-प्रसार का कार्यक्रम लगातार चलता रहता है. अनवरत. पहले तो अपने ही नगर-शहर में इतना प्राप्‍त कर लेते थे कि प्रवासी बनने की नौबत नहीं आती थी, लेकिन पत्रकार विरोधी सरकार आने के बाद इनके दिन मुश्किल भरे हो गये हैं. परिवार चलाने के लिये किसी महानगर में प्रवास करना पड़ता है. दिन बहुत मुश्किल आये पड़े हैं. खैर.

मनमोहन अवस्‍थी जी के निर्देश पर चपरासी हेमचंद्रजी और उनके साथियों के लिये चाय लेकर आ गया. फिर अवस्‍थी जी ने पूछा, ”हां, बताइये क्‍या दिक्‍कत आन पड़ी जो आप जैसे बड़े नेता को यहां आना पड़ा?”

”अब दरोगा-पुलिस खबर लिखने पर धमकी देंगे, इस राज में”, हेमजी ने चाय की घूंट गले के नीचे उतारने के बाद गरजते हुए कहा!

”ऐसा क्‍या हो गया हेमजी?”

”आप पूछ रहे ऐसा क्‍या हो गया? मेराज अली ने कल फेसबुक पर थानेदार की अवैध कमाई को लेकर एक खबर लिखी, खबर लिखने के बाद थाने के दारोगा ने धमकी दी कि है कि पोस्‍ट हटा लो नहीं तो अंदर कर दिये जाओगे. अब बताइये मान्‍यता वाले पत्रकारों के ये दिन आ गये”, हेमजी ने नाक के नीचे सरक आये चश्‍में के ऊपर से झांकते हुए कहा!

हेमजी की शिकायत सुनने के बाद कहा, ”अच्‍छा! मेराज जी आप एक आवेदन दे दीजिये, पूरा मामला लिखकर मैं कार्रवाई कराता हूं”, अवस्‍थी जी ने कहा.

”सर पेज नहीं लाये हैं, कल लिखकर दे जायेंगे”, मेराज जी ने कहा.

”पेज मिल जायेगा, टेंशन मत लीजिये, आप आवेदन लिखकर दे दीजिये”, यह कहते हुए अवस्‍थी जी ने अपने चपरासी से पेज लाने का आदेश दिया.

”कलम भी नहीं है सर, कल लिखकर ले आयेंगे”, मेराज भाई एकदम गिड़गिड़ाने वाले आवाज में अपनी बात कही.

”कलम भी मिल जायेगा, आप परेशान मत होइये”, अवस्‍थीजी ने कहा.

चपरासी मेराज को कलम और पेज दे गया. वह एक किनारे बैठकर आवेदन लिखने लगे.

इधर, हेमचंद्रजी का गुस्‍सा सातवें आसमान पर जा रहा था, ”बताइये, अब ऐसे दिन आ गये कि कोई भी ऐरा-गैरा मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों तक को धमकी दे दे रहा है. ऐसे दिन की उम्‍मीद नहीं थी. किसी सरकार में पत्रकारों का इतना अपमान नहीं हुआ. इस सरकार में ऐसा हाल हो गया है कि मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकारों को अपना काम धाम छोड़कर कमीशनरी और अधिकारियों के चक्‍कर काटने पड़ रहे हैं. मेराज अपना साइकिल स्‍टैंड का काम छोड़कर सुबह से टहल रहा है. सुंदर की मिठाई की दुकान है, उसे कर्मचारियों के भरोसे छोड़कर आया है, लेकिन मेराज का दोस्‍त है और दोस्‍त की परेशानी में साथ खड़ा रहना जानता है. पर यह धमकी अब हम लोग बर्दाश्‍त नहीं करेंगे आपको बता दे रहे हैं.”

”थोड़ा धैर्य रखिये, मैं सब ठीक करा दूंगा. आपकी पसंद की सरकार आयेगी”, मनमोहन अवस्‍थी जी ने काइंया मुस्‍कान के साथ हेमचंद्रजी को आश्‍वस्‍त किया.

हेमचंदजी भी गहरी मुस्‍कान के साथ उनका जवाब दिया.

”आवेदन हो गया मेराजजी? मुझे भी निकलना है मीटिंग के लिये, हेमजी अपने अजीज हैं इसलिये रूक गया, जल्‍दी कीजिये”, अवस्‍थी जी ने कहा.

मेराज भाई अचानक हड़बड़ा गये. अब तक समझ में नहीं आ रहा था कि आवेदन शुरू कहां से करें और खत्‍म कहां से करें. अब तक कभी आवेदन खुद लिखने की नौबत ही नहीं आई थी. बल्कि अपने से कभी कुछ लिखने की नौबत ही नहीं आई थी मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार होने के बावजूद, लेकिन पहली बार उनपर विपत्ति का पहाड़ टूटा था, लिहाजा परेशान थे. सुंदर भी उनके साथ आवेदन लिखाने में लगे थे, लेकिन दोनों दोस्‍त थे और जिगरी वाले दोस्‍त लिहाजा एक दूसरे की कोई मदद नहीं कर पा रहे थे. और वह जिगरी ही क्‍या जो दोस्‍त के काम आ जाये!!

वह दोनों दोस्‍त आवेदन का खाका खींचने में बिजी थे, उन्‍हें आवेदन लिखना राकेट बनाने के काम से भी ज्‍यादा मुश्किल लग रहा था, तब तक हेमजी ने जेब से एक कागज निकाली, और अवस्‍थी जी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ”भाई साहब, ये दो सीओ लेबल के अधिकारी हैं. बहुत दिन से शंटिंग में हैं. अपने खास हैं. रिश्‍तेदारी में आते हैं. इनका कहीं ठीक जगह दिखवा दीजिये.” Anti-journalist

”चलिये देख लेंगे, जो बेहतर होगा, वहां करा देंगे”, अवस्‍थी जी ने टालने की गरज से कहा.

”करा देंगे नहीं, एक बार फोन कर दीजिये, अब अपने ही लोगों को न्‍याय नहीं मिलेगा इस जाति विशेष की सरकार में”, हेमचंद्रजी ने नथुने फड़काते हुए कहा. Anti-journalist

अवस्‍थी जी ने किसी जिम्‍मेदार को फोन करके हेमचंद्रजी के दोनों नजदीकी अधिकारियों को ठीक जगह पर पोस्टिंग देने का निर्देश दिया. Anti-journalist

इधर, आवेदन का डिजाइन अब तक तैयार नहीं हो पाया था. दोनों साथी पत्रकार अपना साइकिल स्‍टैंड और मिठाई की दुकान छोड़कर आवेदन तैयार करने में जुटे थे, लेकिन यह कोई जलेबी तो थी नहीं कि गोल गोल घुमा दिया जाये.

हेमचंद्रजी की परेशानी हल हो चुकी थी, उन्‍हें भी कहीं निकलने की जल्‍दी थी. उन्‍होंने ललकारते हुए पूछा, ”क्‍या भाई आवेदन पूरा हो गया?” Anti-journalist

”सर दरोगा वाला नंबर याद नहीं आ रहा है, जिससे धमकी आई थी, वह दूसरे वाले मोबाइल में है”, मेराज ने थूक गले में गटकते हुए कहा.

”चलो फिर, कल नंबर याद करके आवेदन अवस्‍थीजी को दे देना, उस दारोगा का इलाज हो जायेगा”, हेमचंद्रजी ने उठते हुए कहा.

आज 15 दिन हो गये मेराज वकील साहब से आवेदन लिखवाने के बाद रोज हेमचंद्रजी के पास आता है कि अवस्‍थीजी के यहां चलो, लेकिन हेमजी को अभी तक इस जाति विेशष की सरकार में किसी और रिश्‍तेदार या परिचित सीओ लेबल के अधिकारी के पोस्टिंग की जिम्‍मेदारी नहीं मिल पाई है शायद!!