अटलजी चाहते तो मुसलमानों का कत्लेआम रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया

कुमार नरेन्द्र सिंह

: इधर या उधर – किधर के थे बाजपेयी : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दिवंगत होने के बाद देशभर में उनके व्यक्तित्व और विचारों को लेकर एक बहस-सी छिड़ी हुयी है। एक तरफ जहां उन्हें नेहरू के नक्शेकदम पर चलने वाले एक महान उदारवादी के रूप में चित्रित किया जा रहा है, दूसरी तरफ वहीं एक हिन्दुत्ववादी नेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। उनके बारे में अखबारों में छपे लेखों और समाचार चैनलों पर जारी खबरों पर यदि नजर डालें, तो अधिकांश में यही बात उभरकर सामने आती है कि अटल बिहारी वाजपेयी प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तरह एक राष्ट्रवादी और उदारवादी नेता थे।

इन लेखों में प्रशस्ति भाव का अभाव कहीं नहीं दिखता। इतना ही नहीं, हमें यह भी बताया जा रहा है कि वाजपेयी को कट्टर हिन्दूवादी नजरिये से देखना वास्तव में एक बचकानी हरकत है। ऐसा कहने वालों में केवल दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग ही शामिल नहीं है, बल्कि उदारवादी और यहां तक कि वामपंथी भी शामिल हैं। तो क्या मान लिया जाए कि अटल बिहारी वाजपेयी वास्तव में एक राष्ट्रवादी-उदारवादी नेता थे और कट्टर हिन्दूवाद से उनका कोई नाता नहीं था?

किसी भी नेता या सार्वजनिक जीवन में कार्यरत किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके विचारों और कर्मों से ही हो सकता है न कि इस बात से कि वह क्या खाता-पीता है, किस तरह के कपड़े पहनता है यानी उसकी जीवन-शैली कैसी है। अगर जीवन-शैली के आधार पर मूल्यांकन को मंजूरी मिल जाएगी, तो फिर जिन्ना को भी हमें उदारवादी करार देना होगा और गांधी को एक सांप्रदायिक सोच का व्यक्ति बताना पड़ जाएगा। इसलिए किसी का मूल्यांकन और आकलन केवल और केवल उसके विचारों के आधार पर ही किया जा सकता है।

इसमें कोई शक नहीं कि अटल बिहारी वाजपेयी एक महान नेता, वक्ता और राजनेता थे। यह भी सच है कि उन्होंने अपनी पितृ-संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में आए नेताओं की तरह उनकी वाणी में मुसलमानों, दलितों, पिछड़ों, उदारवादियों और वामपंथियों के लिए तल्खी नहीं थी और अपने राजनीतिक जीवन में वह कई बार पार्टी लाइन से इतर जाते भी दिखाई दिए। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि वह राजनीति में आम सहमति के पुरोधा रहे और इसके लिए उन्होंने अपने विरोधियों से भी प्रशस्ति पायी।

इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ दोस्ताना संबंध बनाने के लिए पहल की और बस लेकर लाहौर गए। यह मानने में भी शायद ही किसी को गुरेज हो कि कश्मीर में शांति बहाली की उन्होंने ईमानदार कोशिश की और पूराने उपकरणों को खारिज करते हुए इन्सानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत की दुहाई दी। यह भी कि उन्होंने देश के ग्रामीण इलाकों को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना की शुरुआत की और राजनीतिक बदले को गर्हित बताया।

लेकिन ये सारी बातें उनके विचारों के अक्श नहीं कहे जा सकते। किसी भी देश का प्रधान ऐसा ही करता है और उसे करना भी चाहिए। क्या हिटलर ने जर्मनी का विकास नहीं किया था या आज अमेरीकी राष्ट्रपति ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने देश को फिर से महान बनाने की बात नहीं करते? इसका जवाब निश्चित रूप से सकारात्मक ही हो सकता है। इसके बावजूद यदि इन तीनों राजनेताओं पर दक्षिणपंथी कट्टरवाद को बढ़ावा देने का का आरोप चस्पां किया जा सकता है, तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को शंका का लाभ क्यों मिलना चाहिए।

आज यदि भाजपा बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता पर विराजमान है, तो इसका श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को ही जाता है। वह वाजपेयी ही हैं, जो भारतीय जनता पार्टी को हाशिये से केंद्र तक पहुंचाने का वाहक बने। ऐसे में यदि वर्तमान मोदी सरकार हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा चला रही है, तो इसके लिए वाजपेयी को ही जिम्मेदार माना जाएगा। यह जानने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है कि 1980 तक वाजपेयी एक खांटी हिन्दूवादी नेता ही रहे थे।

वैसे कतिपय अवसरवादी अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो कहीं से भी ऐसा संकेत नहीं मिलता कि वह उदारवादी या नेहरूवादी थे। उदारवादी चेहरा वास्तव में उनका मुखौटा था, जिससे न केवल उन्हें बल्कि भाजपा को भी राजनीतिक लाभ मिलता था। वह समझ गए थे कि भारत में मध्यमार्गी होने से ही राजनीतिक सफलता मिल सकती है। पूरी पार्टी को मध्यमार्गी बनाने से उन्हें कोई फायदा नहीं होनेवाला था, बल्कि हानि ही होती, क्योंकि पार्टी से जुड़े अन्य कट्टरपंथी नेता और कार्यकर्ता मोहभंग का शिकार होकर शिथिल हो सकते थे।

इसके विपरीत अटल बिहारी की उदार छवि की आड़ में भाजपा के लिए अपना एजेंडा चलाते रहना आसान साबित हो सकता था और हुआ भी। वाजपेयी पार्टी का उदार चेहरा बने रहे और उसके पीछे भाजपा अपना कट्टरवादी हिन्दूत्व का एजेंडा चलाती रही। अटल बिहारी वाजपेयी का यही विरोधाभासी चरित्र उनकी सफलता की गारंटी बना।

जहां तक आरएसएस की बात है, तो वह व्यावहारिक पहलुओं के मद्देनजर ही वाजपेयी के साथ कभी नरम, कभी गरम वाला रिश्ता बनाए रखा। हो सकता है कि संघ वाजपेयी के कतिपय राजनीतिक संदेशों से असहज महसूस करती रही हो, किंतु वह यह भी जानती थी कि संघ की पाठशाला से निकलने वालों में वाजपेयी ही उसके सबसे मेधावी, महत्वपूर्ण, सफल और वफादार छात्र रहे हैं। यही कारण है कि संघ उनके कई निर्णयों और राजनीतिक संदेशों से इत्तफाक नहीं रखते हुए भी संघ उनका समर्थन करता रहा।

संघ जानता था कि वाजपेयी हिन्दूत्व के एजेंडे से कभी अलग नहीं हो सकते। संघ को मालूम था कि उसके पास वाजपेयी ही वह पासा हैं, जो हिन्दू समाज को एक कर सकते हैं। वाजपेयी ने भी हमेशा यही कहा कि वह संघ के एक समर्पित सिपाही हैं। वाजपेयी के लिए तो यह दोनों हाथों में लड्डू वाली स्थिति थी। भाजपा की आक्रामक और कट्टरवादी हिन्दूत्ववादी से वह अपने को अलग भी रखते रहे और उसी राजनीति का फायदा भी उठाते रहे। यह उनकी उदारवादी छवि का ही कमाल था कि 22 पार्टियों की मिलीजुली सरकार का वह पांच सालों तक नेतृत्व करने में कामयाब रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी उदार छवि तो बनायी जरूर, लेकिन जब भी मौका मिला अपने को हिन्दू और मुसलमान विरोधी जताने से भी नहीं चुके। वाजपेयी के उदारवादी चेहरे के आकर्षण में फंसे लोग जोर देकर कहते हैं कि उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में कभी बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लिया और कुल मिलाकर इस अभियान से कटे ही रहे। यह सच भी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह राम मंदिर आंदोलन के खिलाफ थे। उन्होंने कभी राम मंदिर आदोलन की मुखालफत नहीं की।

अलबत्ता, बाबरी मस्जिद विध्वंस के एक दिन पहले लखनऊ में कार सेवकों के समक्ष भड़काऊ भाषण जरूर दिया, जिसमें बड़ी चतुराई से उन्होंने कहा कि अयोध्या में बैठने की जगह ठीक नहीं है, क्योंकि वहां बहुत उबड़-खाबड़ है और बैठने लायक बनाने के लिए जमीन को समतल करना जरूरी है। क्या यह किसी उदारवादी नेता का कथन हो सकता है? इतना ही नहीं, जिस दिन हिन्दूवादी कट्टरपंथी बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर रहे थे, उस दिन वाजपेयी संघ के मिलिटेंट नेताओं के समूह के साथ ही बैठे हुए थे।

आज मीडिया से जुड़े लोगों को वाजपेयी के दिए हुए उन भाषणों की याद नहीं रह गयी है, जो उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ दिया था। 1980 में असम के नेल्ली में दिए गए अपने भाषण में उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ जमकर जहर उगला था और उन्हें देश से बाहर निकाल भगाने की अपील की थी। मालूम हो कि उसके थोड़े दिन बाद ही वहां दंगे हुए और एक समूह विशेष के लोगों को निशाना बनाया गया।

इस बात को भी खूब प्रचारित किया जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने 2002 के दंगों के दौरान वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का राजधर्म का पाठ पढ़ाया था। यह ठीक है कि वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी, लेकिन क्या एक प्रधानमंत्री के लिए किसी आमजन की तरह नसीहत देना ही पर्याप्त है? अगर वाजपेयी चाहते तो, वह तुरन्त प्रभाव से मोदी सरकार को बर्खास्त कर सकते थे या केंद्र की अन्य मशीनरी की सहायता से मुसलमानों का कत्लेआम रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उनका असली चेहरा भी जल्दी ही तब उजागर हो गया, जब गुजरात दंगों के दो महीने बाद ही 12 अप्रैल, 2002 को गोवा में हो रहे भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने कहा, ‘यदि साबरमती एक्सप्रेस में निर्दोष और असहाय यात्रियों जिंदा जलाने की साजिश नहीं रची गयी होती, तो गुजरात की त्रासदी को रोका जा सकता था। गुजरात की घटना निंदा के लायक तो है, लेकिन सवाल तो यह भी है कि आग किसने लगायी, आग कैसे फैली।’ कहने की आवश्यकता नहीं कि गुजरात दंगों के लिए वह मुसलमानों को ही दोषी बता रहे थे।

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान अपने पड़ोसियों के साथ शांति से नहीं रह सकते। उन्होंने तलवार और दहशत के बल पर अपना प्रसार किया। अन्य किसी की बात को यदि छोड़ भी दिया जाए, तो स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपने बारे में यही कहा है कि वह आजीवन एक हिन्दूवादी रहे हैं। उनका यह कहना हमें नहीं भूलना चाहिए कि उनके उदारवादी होने का दुष्प्रचार वामपंथी व अन्य उदारवादी करते हैं, लेकिन सच यह है कि मैं हमेशा ही संघ के विचारों और कार्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहा हूं। अपनी एक कविता में भी वह कहते हैं (वैसे यह कविता उन्होंने तब लिखी थी, जब वह दसवीं क्लास में पढ़ रहे थे) – हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय। संक्षेप में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हीं के बनाए रास्ते पर आक्रमकता के साथ चल रहे हैं।kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। वह राष्‍ट्रीय सहारा, हमार टीवी, नई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।