हे! बीजेपी के कर्णधारों अटल जी की आत्मा तुम्हें कभी माफ नहीं करेगी

कुणाल वर्मा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आराध्य अटल बिहारी वाजपेयी जी की शवयात्रा में जो उदाहरण प्रस्तुत किया वह अतुलनीय है। यही हिन्दु संस्कार है। शवयात्रा में शामिल लोग पार्थिव देह के पीछे-पीछे शवदाह गृह तक जाते हैं। प्रधानमंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सांसद, वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं ने इसी वैदिक परंपरा का निर्वहन किया। पूरा विश्व इसका साक्षी बना। पर अब जो बीजेपी कर रही है उसने तो संपूर्ण हिन्दू वैदिक परंपरा का मजाक ही बना डाला है।

एक ऐसा मजाक जिसे अटल जी आत्मा कभी माफ नहीं करेगी। हिन्दू धर्म और वैदिक परंपरा की दुहाई देने वालों ने राजनीति के हमाम में अपना एक ऐसा दुषित चेहरा सामने ला दिया है जिससे हर एक हिन्दू शर्मशार है। जिस शवयात्रा में पैदल चलने को वैदिक संस्कार माना गया, क्यों उसी संस्कार को बीजेपी के कर्णधारों ने अस्थि कलश के विसर्जन में तिलांजलि दे दी। आइए पहले समझते हैं कि वैदिक परंपराओं में अस्थि विसर्जन को लेकर क्या-क्या कहा गया है।

आपने कभी सोचा है कि क्यों अपने प्रियजनों की मृत्यु के वक्त हम गंगाजल उनके मुंह में डालते हैं?

इसका सीधा जवाब है। वैदिक काल से यह परंपरा चली आ रही है। वेद पुराणों में भी इसका कई जगह वर्णन मिलता है। माना जाता है कि गंगा जीवनदायनी है। इसमें स्रान करने मात्र से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। यहां तक की मृत्यु के बाद भी गंगा नया जीवन प्रदान करने वाली मानी जाती है। यही कारण है कि दाह संस्कार के बाद भी एक वैदिक संस्कार के निर्वहन के लिए हम मां गंगा के तट तक जाते हैं। माना जाता है कि इसके बिना किसी मृत देह से आत्मा की मुक्ति संभव नहीं।

आइए एक नजर वैदिक और वैज्ञानिक तथ्यों पर भी डालें

आपमें से अधिकतर लोगों ने डीएनए जांच की बात सुनी होगी। डीएनए को लेकर सामान्य सी बात हम सभी समझते हैं कि मृत्यु के काफी समय बाद भी, मृत शरीर के जला देने के बाद भी, लाश सड़गल जाने के बाद भी दांत, हड्डी, नाखून या एक छोटे बाल से भी डीएनए टेस्ट के द्वारा हम उस मनुष्य के बारे में सभी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। अब इसका वैदिक आधार आपको समझने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। कहने का तात्पर्य है कि मृत शरीर का जब दाह संस्कार किया जाता है उसके बाद चिता की राख को एकत्र कर हम उसे किसी नदी में प्रवाहित कर देते हैं।

अमूमन गंगा में प्रवाहित करने की प्रथा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शरीर जल जाने के बाद भी राख में मौजूद हड्डी, दांत आदि में आत्मा का बसेरा होता है। उसमें स्पंदन होता है। वह तभी मुक्ति पाती है जब तक की उसे जल में प्रवाहित न किया जाए। अस्थियों में विद्यमान मृतदेह के अवशेष के एक छोटे से कण के स्पंदन तथा तरंगें भी व्यक्ति के स्पंदन तथा तरंगों से मेल खाती हैं।

वैदिक आधार है कि अनिष्ट शक्यिां मृत देह की अस्थियों में स्पंदन के कारण अपना निवास खोजती हैं। यह अनिष्ठ शक्तियां जैसे भूत-प्रेत-पिसाच तामसिक स्वरूप के होते हैं और ये मृत शरीर और उनकी अस्थियों के मध्य एक सूक्ष्म बंधन में बंधे होते हैं। इसी कारण माना जाता है कि जब अस्थियों का विसर्जन हो गया तो मृत शरीर से निकली आत्मा ने मुक्ति पा ली।

जिस डीएनए टेस्ट की बात मैंने ऊपर की है वह मृत शरीर के अवशेषों का स्पंदन ही होता है। अग्नि संस्कार के बाद अस्थियों का जल में विसर्जन करने के पीछे भी वैदिक संस्कार और आधार ही है। मृत पुर्वजों को मृत्योत्तर जीवन में गति मिले और उनके जीवित परिजनों पर न्यूनतम नकारात्मक प्रभाव हो, यही इसका प्राथमिक उद्देश्य है।

\गरुड़ पुराण भी में इस बात का जिक्र है कि अस्थियां एकत्र करने के बाद तत्काल उसका विसर्जन जरूरी होता है। हालांकि विभिन्न हिन्दू परंपराओं में इसके दिन को लेकर अलग-अलग प्रचलन और मान्यताएं मौजूद है। पर सामान्यत: तीन दिन बाद अस्थियां एकत्र की जाती हैं। माना जाता है कि दाह संस्कार के बाद दो से तीन दिन तक वहां अग्नि का वास होता है। इस राख को ठंडा होने के बाद अस्थियां एकत्र की जाती हैं।

गरुड़ पुराण ही कहता है कि तीन दिन के बाद अगर किसी कारणवश इसका विसर्जन संभव नहीं तो इसे घर में नहीं रखना चाहिए, इसे मिट्टी के कलश में बंद कर घर के बाहर किसी वृक्ष पर लटका देना चाहिए। पुराणों में कहा गया है कि जल सर्वसमावेशक होता है। अत: वह अस्थियों में विद्यमान मृतदेह के शेष स्पंदनों को अपने अंदर समाहित कर लेता है।

आइए अब सांसरिक लोक में लौटते हैं

ये तो रही वैदिक बातें। अब सांसरिक दुनिया में आते हैं। हरदिल अजीज नेता अटल जी की मृत्यु के बाद क्या हुआ इस पर फिर से लौटते हैं। शवयात्रा में वैदिक परंपराओं का निर्वहन करनेवालों ने अस्थि विसर्जन को इतना राजनीतिक अखाड़ा क्यों बना दिया है? अटल जी के दाहसंस्कार के बाद सबकुछ बेहतर हुआ। सभी रीति रिवाजों से उनकी अस्थियां एकत्र की गर्इं। परिजनों के हाथों उसका मां गंगा की कोख में विसर्जन भी कर दिया गया। वैदिक परंपरा तो कहती है कि यहीं उस मृत आत्मा की यात्रा संपन्न हो गई।

पर बीजेपी क्या कर रही है

अब भी अटल जी की अस्थियों को विभिन्न कलशों में लेकर पूरे देश में यात्राएं निकाल रही है। आखिर अटल जी की अस्थियों को इतना ग्लैमराइज करने की क्या जरूरत आ पड़ी है। बीजेपी की इस अस्थि नौटंकी में राजनीति की शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी जब अस्थियों को हरिद्वार लाया गया था।

उत्तराखंड की धरती से शुरू हुआ यह अस्थि पॉलिटिक्स अब कई राज्यों में अपना जलवा दिखाएगा। पहला जलवा तो हरिद्वार से ही शुरू हो गया। उत्तराखंड के दो कैबिनेट मंत्रियों सतपाल महाराज और मदन कौशिक की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता सामने आई। सतपाल महाराज जहां इन अस्थियों को प्रेमनगर आश्रम में रखवाना चाहते थे, बात लगभग फाइनल भी हो गई थी, लेकिन मदन कौशिक ने अपना दबाव कायम कर इसे शांतिकुंज में रखवाने का प्रोग्राम बना डाला।

बात यहीं थम जाती तो ठीक था, पर हुआ क्या? फाइनली न तो प्रेमनगर से अस्थि यात्रा निकली न शांतिकुंज से। यात्रा निकली भल्ला इंटर कॉलेज से। यह वही इंटर कॉलेज है जहां कभी अटल जी ने अपनी जनसभाएं की थी। भल्ला इंटर कॉलेज ने बीजेपी के दिग्गज नेताओं के बीच सीधे टकराव को तो टाल दिया, लेकिन मैसेज क्या गया?

मैसेज साफ है। यह अस्थि यात्रा सिर्फ एक राजनीतिक प्रोपगेंडा है। वोटों के धु्रवीकरण का एक नायाब तरीका है। अटल जी जैसी शख्शियत की मृत्यु को राजनीतिक महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर चढ़ाना है। यह बेहद दुखद स्थिति है। जिस वैदिक परंपरा की दुहाई दी गई, उसी वैदिक परंपरा को तार-तार किया जा रहा है। जिस धूमधाम से विभिन्न राज्यों के बीजेपी प्रभारियों या बड़े नेताओं के बीच अस्थि कलश का वितरण किया गया उसे देखकर दुख हुआ। अब उसी तरीके से विभिन्न राज्यों में इन अस्थियों के विसर्जन का पूरा शेड्यूल मीडिया के पास भेजा जा रहा है।

जब हरिद्वार में मुक्ति मिल गई तो फिर अस्थियों के अवशेषों को सहेजने की जरूरत नहीं थी। अगर बीजेपी को अटल जी की मौत का राजनीतिक फायदा ही लेना था तो वैदिक परंपराओं के साथ नहीं खेलना चाहिए था। अटल जी याद में तमाम कार्यक्रमों का आयोजन किया जा सकता था। श्रद्धांजलि सभाओं का वृहत आयोजन किया जा सकता था।

उनकी जिंदगी की यादों, उनको मिले सम्मानों आदि के साथ एक बस या ट्रेन को डेकोरेट कर पूरे देश भर में निकाला जा सकता था। अटल यात्रा के नाम से उनकी जीवनी को पूरे देश में प्रदर्शित करने से भी राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता था। ‘रथयात्रा’ बीजेपी के लिए जीवन दायनी बनी थी। ठीक उसी तरह उत्तरप्रदेश सहित तमाम राज्यों में रथयात्रा के रूप में अटल यात्रा का आयोजन किया जा सकता था।

पर अफसोस ऐसा नहीं हो सका। वैदिक परंपराओं के अनुसार आज भी अटल जी की आत्मा अपनी मुक्ति की राह देख रही होगी। मुक्ति के मार्ग पर चली उनकी यह अस्थि यात्रा कब जाकर समाप्त होगी, इसका इंतजार रहेगा। पर हिन्दू धर्म की दुआई देने वालों ने हिन्दू धर्म की सारी परंपराओं का सर्वनाश कर दिया है। इसका मुझे अफसोस रहेगा।

लेखक कुणाल वर्मा वरिष्‍ठ एवं जानेमाने पत्रकार हैं. वे आई नेक्‍स्‍ट, दैनिक जागरण समेत तमाम बड़े संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. फिलवक्‍त आज समाज के समूह संपादक के रूप में सेवारत हैं.