संघ की उस हद को भी लांघ गए थे अटलजी, जिसे ठेंगड़ी नहीं लांघ पाए  

चंचल सिंह

: उनका कद संघी खांचे से भी बड़ा हो गया : प्रणाम अटल जी! अटल जी का जाना अखरेगा। राजनीति और समाज दोनों को यह कमी टीसती रहेगी। अटलजी पर पंडित नेहरू का जनतांत्रिक चरित्र अंदर तक समा गया था और उन्होंने कभी उसे छिपाया नहीं बल्कि मुखर होकर दमदारी से बोलते रहे। राजनीति में वैचारिक मतभेद को परे हटा कर अटलजी अपने विरोधियों से भी खुल कर अपनत्व का बोध देते रहे। नतीजतन उनका कद संघी खांचे से भी बड़ा हो गया।

एक दिलचस्प वाकया है, जो पंडित नेहरू और अटलजी के आमजन के बीच की ग्राह्यता का उदाहरण देता है। संघ एक व्यक्ति विशेष को हद तक ही ऊपर उठने का मौका देता है, उस हद को लांघने का मतलब होता है उसे दूसरी डगर पर लगा दो। इसके कई उदाहरण हैं, आडवाणी सामने हैं। दत्तोपंत ठेंगड़ी और अटलजी साथ-साथ ऊपर उठना शुरू किए। संघ ने दत्तोपंत को मजदूर यूनियन तक पहुंचा कर एकाकी दे दिया, लेकिन अटलजी के साथ ऐसा नहीं कर पाए।

पंडित नेहरू की तरह अटलजी भी संगठन के मामले में फिसड्डी रहे पर अवाम के निहायत ही चहेते बन चुके थे। चुनांचे अटलजी अपने मोकाम तक पहुंच गए।  अटल जी वक्ता बहुत अच्छे थे, बोले क्या? यह कम ही बता पाते रहे लेकिन बोले अच्छा। एक वाकये का चश्मदीद गवाह हूँ। 78 में आजमगढ़ संसदीय सीट पर उपचुनाव था। जनता पार्टी से उम्मीदवार थे राम बचन यादव और कांग्रेस से श्रीमती मोहसिना किदवई।

आजमगढ़ में केन्दीय मंत्री, सूबे के मंत्री, गरज यह कि आजमगढ़ में रहने तक कि जगह नहीं रही। जार्ज अपने पुराने कामरेड रामप्यारे उपाध्याय वकील (शायद यही नाम था) के निर्माणाधीन मकान के एक कमरे में रुके थे। वहीं हम भी थे। इतने में एक अम्बेसडर गाड़ी आकर रुकी और उस में से अटल जी बाहर आये। बरामदे में एक चारपाई पड़ी थी हमने उसे बिछा दिया। अटल जी बैठ गए। विदेश मंत्री थे।

बोले – जार्ज साहब कब तक उठते हैं? हमें हंसी आ गयी, अटलजी ने बालसुलभ सवाल किया, क्या हुआ, हँस रहे हो? हमने कहा जार्ज साहब ढाई-तीन बजे उठ जाते हैं, तैयार होते हैं फिर कागजात देखते हैं, अल सुबह एक झपकी जरूर ले लेते हैं। अटलजी गौर से सुनते रहे, इतने में जार्ज साहब खुद बाहर आ गए। आते ही आते जार्ज ने कहा काफी पिया जाय। उपाध्याय जी घबड़ाये लेकिन थे ख़ुत्थड समाजवादी, बोले – जार्ज! यह दिल्ली बम्मई नहीं है, आजमगढ़ है चाय मिल जाय यही क्या कम है। हम चारो जोर का ठहाका लगाए।

जार्ज ने कहा काफी हमारे पास है, बस पानी गर्म करा दो। बातचीत के दौरान अटलजी ने आने का सबब बताया – ‘आज शाम हम दोनों लोगों की सामूहिक सभा है गांधी मैदान में। हम चाहते थे कि आप देर से आएं। जार्ज ने तुरंत हामी भरी – ठीक है, हम बिलरियागंज निकल जाते हैं वहां से वापसी में देर तो हो ही जाएगी। जार्ज फिर मेरी तरफ मुड़े और अटलजी से परिचय कराया, ये चंचल है, विश्वविद्यालय छात्रसंघ का अध्यक्ष चुना गया है।

फिर हमसे बोले अटलजी के बाद कुछ देर तुम भीड़ रोक लोगे? तुम बोलना तब तक हम आ ही जायेंगे। अटल जी के बोलने के बाद भीड़ रोकना मामूली काम नहीं था, लेकिन हमने कर के दिखाया। एक घंटे तक मुतवातिर बोला, नौजवानों का भरपूर समर्थन, जार्ज रात के बारह बजे वापस आये तब तक मैदान भरा पड़ा मिला। बहरहाल, अटलजी ने बड़े गौर से देखा। तो आप हैं चंचल? चौबे जी (स्वर्गीय लालमुनि चौबे जो अटलजी के बहुत नजदीक रहे) ने चर्चा की थी। अध्यक्ष,  दो बार बुदबुदाए फिर उठ खड़े हुए काफी के लिए धन्यवाद।  अटल जी और जार्ज के ये रिश्ते उत्तरोत्तर और प्रगाढ़ होते गए इस पर फिर क़भी।  सादर नमन अटल जी।

 वरिष्‍ठ समाजवादी चिंतक तथा बीएचयू के अध्‍यक्ष रहे चंचल सिंह के फेसबुक वाल से साभार. चंचलजी ना केवल समाजवादी विचारधारा के पोषक रहे बल्कि उन्‍होंने इसे अपने जीवन में भी उतारा.