उन्‍होंने कहा – मैं तुम्हे ब्लॉक कर दूंगा, और कर दिया

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अनिल सिंह

: वॉटसएप पानी में उबालकर दो चम्‍मच अच्‍छे दिन के साथ देना है : मुझे याद है बचपन में एक बार आउट दिए जाने के बाद ‘खेलब ना खेले देब खेलवे बिगाड़ब’ कहकर बैट लेकर भागने लगा तो हमारे दोस्‍त हमको पकड़कर बल भर वहीं कूंच दिए थे. गिरा-गिरा के मारे थे. हम कई दिन तक अपने दोस्‍तों से नाराज रहे, यह बात उनको भी पता थी और हमको भी, लेकिन अब दौर बदल गया है. सब कुछ बदल गया है.

कौन कहां किसको कूंच दे रहा है, पते नहीं चल रहा है. कौन किससे नाराज हो जा रहा है बुझइबे नहीं कर रहा है. सोशल मीडिया ने तो अइसे अइसे बहादुर पैदा कर दिए हैं कि अगर उन्‍हें फेसबुक पर अकेला छोड़ दिया जाए तो दोस्‍त तो छोडि़ए पाकिस्‍तान को बर्बाद करके रख देंगे. एक भाई ने तो अमेरिका को सीधी धमकी दे दी फेसबुक पर, भला हो केंद्र सरकार बीच में पड़कर मामले को सुलटा लिया अन्‍यथा अब तक अमेरिका विश्‍व के नक्‍शे से गायब हो चुका होता.

खैर, परसों की बात है. हमें हमारे एक मित्र विकास फेसबुक पर विकास दिखा रहे थे, और हम थे कि हमें कुछ नजर ही नहीं आ रहा था. वो थे कि जबरिया दिखाने को तैयार थे. ऐसा लग रहा था कि अगर हम नहीं देखे तो वो फेसबुकवे पर कट्टा चला देंगे. हमें मोदियाबिंद नहीं था, लिहाजा विकास कहीं नजरे नहीं आ रहा था. दुर्वासा की तरह अइसे क्रोधित होकर हमें ब्‍लाक करने की धमकी दे दी, जइसे हमारी नौकरिये छीन लेंगे. और हमें बिना पीएफ के जिनगी गुजारनी पड़ेगी.

हम घबराए माफी मांगने की तैयारी कर ही रहे थे कि झट से ब्‍लाक कर दिए. यह कहते हुए कि फलाने-चिलाने भी तुमको ब्‍लाक कर दिए हैं. अब हमें आजतक नहीं पता चल पाया था कि फलाने-चिलाने हमसे कब नाराज हुए, किस बात पर खुनसाए और कब हमे बर्खास्‍त करके चले गए. कब हमसे छोटी उंगरी सटा के कट्टी कर गए? और हम बर्खास्‍तगी होने के बावजूद फेसबुक पर गैरकानूनी तरीके से नौकरी किए जा रहे थे.

एक रोज पता चला कि कानूनी तरीके से फेसबुक पर लगातार बहादुरी दिखा रहे हमारे एक मित्र दूसरी तरफ से आए क्रास फायर में घायल हो गए हैं. उन्‍हें आनन-फानन में टाइमलाइन अस्‍पताल में भर्ती कराया गया. डाक्‍टर ने मित्र की गंभीर हालत देखते हुए बताया कि मोदियाबिंद होने के चलते इनकी हालत गंभीर है. विकास के ओवरडोज के चलते यह भीतर से कमजोर हो गए हैं. इन्‍हें तत्‍काल बुलेट ट्रेन से स्‍मार्ट सिटी ले जाना पड़ेगा. वहीं इनका इलाज संभव है.

डाक्‍टर विजय पांडेय ने सुझाव दिया कि बुलेट ट्रेन के स्‍मार्ट सिटी में पहुंचने तक इन्‍हें आधे-आधे घंटे पर बीस-बीस लाइक देते रहना है. हर दूसरे घंटे पर इनके लिए तीन कमेंट और एक शेयर जरूरी है. अगर टैग हो सके तो इनके सुधरने की संभावना ज्‍यादा रहेगी. इन्‍हें ब्‍लाक से पूरी तरह बचाना है. अगर हालत में इसके बावजूद सुधार ना दिखे तो इन्‍हें ट्विटर पर ले जाकर रीट्विट कर देने पर हालत स्थिर रहेगी. बीच-बीच में वॉटसएप पानी में उबालकर दो चम्‍मच अच्‍छे दिन के साथ देने पर स्‍मार्ट सिटी पहुंचने तक इनमें आंशिक सुधार दिखने लगेगा.

बहरहाल, अब हालात ऐसे बन गए हैं कि मेरे एक मित्र अपने से ज्‍यादा अपनी पत्‍नी के टाइमलाइन पर समय गुजारते हैं. उससे भी ज्‍यादा अपनी प्रेमिका के टाइमलाइन पर नजर आते हैं. एक बार नेटवर्क गायब होने के चलते आफलाइन हो गए थे, पत्‍नी चिंतित हो गई. मोहल्‍ले में मित्र के आफलाइन होने की खबर फैलते ही लोग टेंशन में आ गए. कई पड़ोसी सबसे पहले उनकी प्रेमिका की टाइमलाइन पर उन्‍हें ढूंढने की असफल कोशिश की. फिर कुमार आलोक ने पुलिस को सूचना दी.

पुलिस ने कई लोगों की टाइमलाइन पर मेरे मित्र को तलाशा. उनकी प्रेमिका की टाइमलाइन पर पहुंची पुलिस तो देखा कि वह भी आफलाइन है. पुलिस ने संभावना जताई कि दोनों कहीं खतरे में हैं या फिर दोनों सोशल मीडिया से फरार हो गए हैं. कई लोगों के टाइमलाइन से निकलने के बाद पुलिस ने सही में जीप निकाली, लेकिन इसी बीच सूचना मिली कि मेरे मित्र आनलाइन हो गए हैं. पुलिस समेत पत्‍नी और पड़ोसी सभी ने राहत की सांस ली.

मैं इनदिनों इनफिरियारटी कांम्‍पलैक्‍स से गुजर रहा हूं. चोरी में पकड़े जाने से पहले नकल करने पकड़ा गया रमेशवा ईमानदारी पर इतना लिखता है कि हमारा अपने पर से भरोसा ही उठ गया है. हम खुद को बेइमान समझने लगे हैं. ऐसा लग रहा है कि सब सुधर गया है खाली हमिए नहीं सुधरा जा हैं. पूरा देश अच्‍छा सोच रहा है, केवल हमहीं हैं जिसकी सोच गड़बड़ है. हां, सब सोच रहे हैं, पूरा देश सोच रहा है, बस सब सोच रहा है.