बारी के इस खेल में कल आ सकती है आपकी भी बारी…!

हरेंद्र शुक्‍ला

: बनारस में 150 इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मैनों के रोजी के सवाल पर पत्रकार संगठनों की चुप्पी क्यों? :  वाराणसी : एक प्रशासनिक फ़रमान का वज्रपात हुआ और रातो-रात वाराणसी शहर के करीब डेढ़ सौ से भी अधिक इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मैन अपनी रोजी से महरुम हो गये। त्रासद यह कि सबकी खबर लेने वाले इन बेचारों का कोई पुरसाहाल नहीं। महीना पूरे होने को हो आया, लेकिन इस घटना पर न तो अखबारों ने कोई प्रतिक्रिया दी और न ही स्वहित पोषित पत्रकारों की हित का दंभ भरने वाला कोई संगठन ही आगे आया।

यह ठीक है कि मानकों की कसौटी पर निजी चैनलों के इस मीडियाकर्मियों की हैसियत कुछ भी रही हो। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि खबर लेने और उसे देने की जिम्मेदारी का वे निष्ठा से निर्वहन कर रहे थे। बात कड़वी लग सकती है, मगर है एक दम खरी कि यह सिर्फ बारी का खेल है। किसी को यह मुगालता नहीं होना चाहिए कि अखबारों या चैनलों के रजिस्टर में उनकी नियुक्ति का ठप्पा पक्की स्याही का है। चुप्‍पी साधे लोगों को यह मानना पड़ेगा कि बारी के इस खेल में अगली बारी किसी की भी हो सकती है।

अभी भी वक्त है और वक्त का तकाजा है कि रोजी से वंचित अपने इन साथियों के लिए आवाज़ उठाई जाय और इस बंदिश से अलग कि वे किसी पत्रकार संगठन के सदस्य हैं या नहीं। गौरतलब है कि यह पूरा मामला एक नेता के कथित रंगरेलियों के एक विडियो से जुडा है। यह भी हो सकता है कि वीडियो से छेड़छाड़ की गई हो, लेकिन यह तकनीकी जांच का विषय है। सवाल यह है कि क्‍या किसी एक की गलती के लिए पूरे समूह को सजा देना उचित है? क्‍या यह नैसर्गिक न्याय के खिलाफ नहीं है?

दरअसल, पूरी कहानी यह है कि भाजपा काशी क्षेत्र के संगठन मंत्री रत्नाकर का एक आपत्तिजनक वीडियो वायरल हुआ था, जिसे डेन काशी चैनल ने खबर बनाकर चलाया था। और इसी वीडियो को डेन काशी के रिपोर्टर नितिन राय ने फेसबुक पर अपलोड कर दिया था।  सरकार के दबाव में डेन के रिपोर्टर के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया, जिसमें वह फिलहाल जमानत पर है। हालांकि वाराणसी पुलिस ने नितिन को जेल भेजने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन कोर्ट से उन्‍हें जमानत मिल गई।

इसी बीच, अचानक एक महिला पत्रकार ने भी नितिन के खिलाफ छेड़खानी और रंगदारी का मुकदमा कैंट थाने में करका दिया। इसमें भी यह हाईकोर्ट से जमानत पर हैं। नितिन का कहना है कि यह मुकदमा कैंट थाने में तब दर्ज कराया गया, जब उन्‍हें आईटी एक्‍ट के मामले में पुलिस ने कस्‍टडी में ले रखा था। दरअसल, सत्‍ता को अब लोकतंत्र में विश्‍वास नहीं रह गया है, उसे तानाशाही रास आने लगी है। और पुलिस तो लंबे समय से सत्‍ताधारियों की रखैल की भूमिका में है, जिसकी सत्‍ता होती है उसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार रहती है। चाहे वह कितना भी गलत काम क्‍यों ना हो। खैर, अब सत्‍ता के दबाव में डीएम ने फरमान जारी कर बनारस में मनोरंजन के नाम पर चलने वाले कम से कम आठ लोकल न्‍यूज चैनलों को बंद करने का फरमान सुना दिया है।  

बनारस से वरिष्‍ठ पत्रकार हरेंद्र शुक्‍ला की रिपोर्ट. श्री शुक्‍ला अमर उजालादैनिक जागरणआज समेत कई अखबारों में कार्यरत रहे हैं.