एनआरसी भाजपा की रणनीति तो विरोध ममता सहित विपक्ष की मजबूरी

कुमार समीर

: पूरे देश में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा : नई दिल्‍ली : असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) मसले पर जो कुछ हो-हल्ला हो रहा है, उसका दूरगामी प्रभाव जो भी हो लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से यह सब कुछ रणनीति के तहत ही हो रहा है। असम में कांग्रेस राज को खत्म कर सत्ता में आई भाजपा रणनीति के तहत ही एनआरसी मसले पर अपना कड़ा रुख अपनाए हुई है वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित विपक्ष का एनआरसी का विरोध मजबूरी हो गई हैं। विरोध नहीं करने पर अस्तित्व का खतरा इन्हें महसूस होने लगा है। 

जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह 2019 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ही अब कोई कदम बढ़ा रही है और एनआरसी मुद्दा भी उसी रणनीति का हिस्सा है। माना जा रहा है कि इसके जरिए असम, पश्चिम बंगाल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में मजबूत पकड़ बनाना भाजपा का उद्देश्य है। 2016 में असम विधानसभा चुनाव में एनआरसी को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा यह सफल प्रयोग कर चुकी है। इसका काफी फायदा चुनावी नतीजों में देखने को मिला।

असमी मुस्लिम बनाम बांग्लादेशी मुस्लिम के कैम्पेन ने भाजपा की जीत में बड़ा रोल अदा किया था। भाजपा के रणनीतिकारों की मानें तो एनआरसी का मुद्दा न सिर्फ नॉर्थ ईस्ट बल्कि पूरे देश में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा, क्योंकि दिल्ली-एनसीआर, बिहार, मुंबई, झारखंड समेत देश के लगभग सभी मेट्रो शहरों में बांग्लादेशी घुसपैठिए बड़ा मुद्दा है। रोजगार में कमी का प्रमुख कारण बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए को मानकर पूरे देश में एनआरसी मसौदा तैयार करवाने की भाजपा की योजना है।

असम में एनआरसी मसौदा भाजपा के लिए लिटमस टेस्ट की तरह है। टेस्ट के रिजल्ट को देखकर ही भाजपा की योजना इस मसले पर आगे बढ़ने की है। यानि भाजपा को इस मसले पर सफलता की दरकार है, लेकिन वहीं ममता सहित सारे विपक्ष को इस मसले की असफलता की दरकार है, क्योंकि विपक्ष के समक्ष अस्तित्व का खतरा इससे उत्पन्न होने का हो गया है।

ममता सहित प्रमुख विपक्षी पार्टियां इस मसले पर लगभग एकजुट हो गई हैं और एनआरसी के फाइनल ड्रॉफ्ट का इस आधार पर पुरजोर तरीके से विरोध करना शुरू कर दिया है कि एनआरसी मसौदा दोषपूर्ण है। मसौदे से बाहर किए गए 40 लाख लोगों में से अधिकांश भारतीय हैं। कई अनपढ़ होने की वजह से रह गए हैं। सरकार को ऐसे लोगों को कानूनी मदद देनी चाहिए जिनलोगों के नाम इसमें नहीं है।

ममता बनर्जी का तो यहां तक कहना है कि मेरे माता-पिता को भी अपनी नागरिकता प्रूफ करनी होती तो शायद वो कभी नहीं कर पाते क्योंकि वो साधारण किसान थे। 40 लाख लोगों को मसौदे से बाहर रखकर देश को बांटने का प्रयास राजनीतिक उद्देश्य से किया जा रहा है, जिसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कांग्रेस सहित लगभग सारा विपक्ष भी इस पर एकमत है। यानि भाजपा की अगुवायी वाली केंद्र सरकार व विपक्ष आमने सामने हैं और कोई भी पीछे मुड़ने के मूड में नहीं है।

विपक्ष की नजर राजनीतिक सियासी समीकरण पर टिकी है क्योंकि असम में 35 प्रतिशत मतदाता मुश्लिम हैं और ये 14 में से 6 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। 40 विधानभा सीटों पर बंगाली भाषी मुस्लिम वोटरों की बहुलता है इनमें से 24 विधानसभा सीटों पर तो मुस्लिम निर्णायक भूमिका में हैं। मसलन धुबरी में तो 70 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं वहीं बरपेटा में 55, मंगलदोई में 50, करीमगंज में 49 तक प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। विपक्ष केंद्र सरकार पर देश को बांटने व अपनी सरजमीं पर शरणार्थी बनाने के आरोप लगाकर इन मुस्लिम वोटरों की सहानुभूति लेने में जुट गया है और अब देखने वाली बात है कि कौन कितना सफल होता है।

लेखक कुमार समीर वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. सहारा, नई दुनिया, फोकस टीवी समेत कई अन्‍य संस्‍थानों में भी वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं.