सांसद-विधायक रह चुकने के बावजूद भौकाल मेंटेन नहीं करते हैं रामकिशुन यादव

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  • पंडित कमलापति त्रिपाठी परपंरा के नेता है पूर्व सांसद
  • जनता के लिये हमेशा खुले रहते हैं इनके घर के दरवाजे

लखनऊ : चंदौली जिले के बरहनी विकास खंड के कच्‍चे-पक्‍के रास्‍ते से धूल उड़ाती एक स्‍कार्पियों पौनी गांव पहुंचती है। गाड़ी की अगली सीट पर कुर्ता पैजामा पहनकर बैठे नेताजी हाथ जोड़े आने-जाने वालों का अभिवादन करते हैं। सामने से जनता भी नेताजी को प्रणाम, सलाम करते हुए पल्‍लगी  मारती है। इसी बीच में नेताजी किसी से पूछ लेते हैं, ”का हो रमेश का हालचाल बा?” रमेश जवाब में कहते हैं, ”सांसदजी देखते हऊआ देश क हाल, बस बीत रह बा कइसहूं। आजकल तब बस वादा होत ह, नेता-अधिकारी के त मिलहीं के फुर्सत नाही बा।”

ऐसा अक्‍सर होता है। नेताजी चंदौली जिले के जिस गांव में पहुंच जाते हैं, पचीस-पचास लोग उनके जानने वाले होते हैं। जनता उन्‍हें भले ही सांसदजी कहती हो, लेकिन वह छह साल से बिना किसी पद के हैं, लेकिन उनसे अपनी समस्‍या कहने वाले अब भी उतने ही हैं, जितने छह साल पहले रहे होंगे। आज भी वह अधिकारियों से उसी तरह जनता की बात को लेकर फोन करते हैं, जितना वह छह साल पहले करते रहे होंगे। आज भी उनके घर पर सुबह-सुबह फरियादियों की उतनी ही भीड़ जुटती है, जितनी सरकार रहने पर जुटती होगी।

यहां बात हो रही है चंदौली जिले के पूर्व सांसद रामकिशुन यादव की। समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं, अब नहीं हैं, लेकिन जनता के बीच उनकी पकड़ अब भी उतनी ही मजबूत है, जितनी पहले कभी रही होगी। जिले के वर्तमान सांसद एवं केंद्रीय मंत्री डा. महेंद्रनाथ पांडेय पिछले नौ महीने से बाहर हैं। जनता उन तक सहजता से अपनी समस्‍या तक नहीं पहुंचा सकती, मिलना तो दूर की कौड़ी है। समस्‍या पहुंचा भी दी तो कोई गारंटी नहीं है कि उनकी तरफ से कोई नोटिस लिया जाये, लेकिन वही जनता जब रामकिशुन के पास पहुंचती है तो नोटिस ही नहीं लिया जाता बल्कि संबंधित अधिकारी को तत्‍काल फोन कर मदद करने को कहा जाता है।

दो बार मुगलसराय के विधायक और एक बार चंदौली के सांसद रह चुकने के बावजूद रामकिशुन में नये नेताओं जैसी अकड़ नहीं है। कोई भौकाल या ठसक भी नहीं है। उनके आगे पीछे बंदूकधारियों की कोई फौज भी नहीं चलती है। उन तक पहुंचने में चार जगह जांच की रस्‍म अदायगी का भी झंझट नहीं है। उनसे आप बिना किसी लाग लपेट के मिल सकते हैं या वह किसी बाजार में पैदल चलते हुए ही कहीं आप से टकरा सकते हैं। आप अगर उनसे नाराज हैं तो उनको दो-चार बातें भी सुना सकते हैं और वो सहजता से मुस्‍कुराते हुए कोई मजाकिया जवाब देकर आगे बढ़ सकते हैं। समस्‍या समाधान लायक हो तो आप से रूक कर पूछ भी सकते हैं।

दरअसल, चंदौली का दुर्भाग्‍य है कि पंडित कमलापति त्रिपाठी के बाद कोई ऐसा नेता नहीं मिला, जिसकी जनता में पकड़ हो। जो जनता की नब्‍ज को समझता हो। दलीय राजनीति में हार-जीत अलग पैमाना है, लेकिन फिलहाल चंदौली में रामकिशुन यादव के कद का कोई जननेता नहीं है, जो इतना सहज और सरल हो। वो पंडित कमलापति त्रिपाठी की परंपरा के नेता हैं। आज के ज्‍यादातर नेता सुरक्षा काफिले और भौकाल मेंटेन करते हुए चलने को ही अपनी उपलब्धि मानते हैं, उस दौर में रामकिशुन बिना किसी भौकाल के, बिना किसी सुरक्षा के नेतागिरी करते हैं।

इसका कारण भी है कि वह भौकाल या धन के नेता नहीं बल्कि जन के नेता हैं। दलीय एवं विचारधारा की राजनीति करने के बावजूद किसी से उनकी व्‍यक्तिगत अदावत नहीं है। आप किसी से पूछ लें कि चंदौली का सबसे बड़ा और अच्‍छा नेता कौन है तो दूसरी पार्टी का वोटर, जो वोट उन्‍हें भले ना देता हो, वो भी रामकिशुन का ही नाम लेगा। वह आज भी अपने खेतों में खाद डलवाते, पानी लगवाते या गन्‍ना रोपवाते नजर आ सकते हैं। वह सुबह-सुबह अपने खेत-खलिहान की ओर टललते भी मिल सकते हैं। वह शहरी चकाचौंध से दूर अब भी अपने गांव में ही रहते हैं। राजनीति से जब सादगी-सरलता दूर होती जा रही है, भौकाल-दिखावा-पैसा अपने चरम पर है, उस दौर में रामकिशुन यादव जैसे समाजवादी नेता उम्‍मीद जगाते हैं।

उत्‍तर प्रदेश की सीमा के आखिरी छोर पर बिहार को जोड़ने वाले चंदौली जनपद का दुर्भाग्‍य है कि उसे पंडित कमलापति त्रिपाठी के बाद लंबे समय तक कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं मिला, जिसकी सरकार में हनक हो, जो इस इलाके की तस्‍वीर बदल सके। जिसकी सभी वर्गों में स्‍वीकार्यता हो। छात्र राजनीति से पल्‍वित-पुष्पित रामकिशुन सांसद रहते अपनी हनक भी दिखाई और स्‍वीकार्यता भी बनाई। उनकी लिमिटेशन य‍ह है कि वह एक क्षेत्रीय पार्टी की राजनीति करते हैं। मोदी लहर में वो चुनाव भले ही हार गये हों, लेकिन चंदौली में सकलडीहा रोड पर बन रहा रेल ओवरब्रिज और तमाम काम उन्‍हीं की मेहनत का नतीजा है, श्रेय भले ही कोई और लूट ले। और हां, वे फेसबुक-ट्वीटर के नेता नहीं, जनता के नेता हैं।