इस आपरेशन में जर्मनी की बनी माउजर C96 प्रयोग की गई

राज बहादुर सिंह

: नौ अगस्त – जंगे आजादी का अहम और वंदनीय मोड़  :  काकोरी कांड के नायकों को शत शत नमन :  लखनऊ : नौ अगस्त। यह महज एक डेट नहीं है। यह एक मोड़ है इतिहास मोड़ने के लिए। इसमें निर्भीकता है, साहस है, कुर्बानी का अजीम जज्बा है और देश प्रेम की इंतिहा है। जवानी देश के लिए एक कुर्बानी है। और भी जितने विशेषण आप जोड़ सके फिर भी पलड़ा उस अजीमुश्शान कारनामे का ही भारी रहेगा, जो जवानी ने किया नौ अगस्त 1925 को, जिसे काकोरी षड्यंत्र का नाम दिया फिरंगियों ने। हालांकि यह आजादी की लड़ाई का न भुलाया जा सकने वाला सुनहरा अध्याय था।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान का ब्रेन चाइल्ड था काकोरी में ट्रेन से अंग्रेजों के खजाने में जमा कराए जा रहे भारतीय धन को लूटना। करीब आठ-दस लोग और शामिल थे आपरेशन को एक्सक्यूट करने में और जर्मनी में बनी चार माउजर C96 प्रयोग की गईं। लूटी गई धनराशि लगभग आठ हजार रुपये थी और दुर्भाग्य यह हुआ कि इस घटना में अहमद अली नामक शख्स की गैर इरादतन हत्या हो गयी। और इसने लूट के साथ हत्या का केस बना दिया।

काकोरी ट्रेन कांड के सिलसिले में तीन दर्जन से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए। मुकदमे की लंबी कार्यवाही चली। चार क्रांतिकारियों को फांसी हुई। देश प्रेम में डूबे कई मतवालों को काला पानी से लेकर सालों तक की सजाएं हुईं। गोरखपुर में फांसी के फंदे को चूमने वाले बिस्मिल की उम्र तीस साल थी। फैज़ाबाद जेल में मृत्यु दंड को अंगीकार करने वाले अशफाक उल्लाह खान केवल 27 साल के थे। क्रमश: गोंडा और इलाहाबाद में फांसी के फंदे पर झूले राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह ने केवल 26 और 35 बसंत देखे थे।

काकोरी कांड में फांसी का फंदा चूमने वाले ठाकुर रोशन सिंह काकोरी ट्रेन मामले में शामिल नहीं थे, लेकिन गोरे फिरंगियों ने उनके साथ भी देश प्रेम के जुर्म में ”इंसाफ” करते हुए उन्हें भी शहीद कर दिया। काकोरी कांड ने क्या संदेश दिया? भरी जवानी में नतीजा जानते हुए भी इस तरह का कदम उठाने के जज्बे को सलाम। हजार हजार सलाम। सजा पाए लोगों ने पोलिटिकल प्रिजनर का दर्जा पाने के लिए कई दिन तक जेल में भूख हड़ताल भी की।

जंग-ए-आजादी में काकोरी कांड ने क्या भूमिका निभायी? किस तरह का प्रेरक प्रसंग यह रहा? यह सब दर्ज है इतिहास में लेकिन ठीक से नहीं। सरकार का यह दायित्व है कि वह काकोरी जैसे प्रेरक कांड को अनिवार्य रूप से देश भर में हर भाषा के पाठ्यक्रम में शामिल कराएं। क्या इन शहीदों को मरणोपरांत भारत रत्न नहीं दिया जाना चाहिए? क्या हर्ज है अगर हम प्रेरणा दे सकें अपनी नई पीढ़ी को। क्यों नहीं भारत रत्न इन शहीदों को? खैर नौ अगस्त को काकोरी कांड को अंजाम देने वाले भारत माँ के अमर सपूतों को शत शत नमन। बस इन शब्दों के साथ शीश नवाता हूं –

दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वफ़ा आएगी।rbs

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.