खेल के मैदान की कहावत राजनीति में चरितार्थ कर पाएगी भाजपा?

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अरविंद कुमार चौधरी 

: भाजपा को उपचुनाव में हार से इतना प्रेम क्यों? : लखनऊ : उपचुनावों में मिल रही एक के बाद एक हार से भाजपा को शायद कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है।  तभी भाजपा सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उपचुनाव में मिली हार के बाद एक पत्रकार द्वारा पूछे गये सवाल पर बेबाक जवाब दिया कि कभी-कभी लंबी छलाँग लगाने के लिए दो कदम पीछे भी जाना पड़ता है। मगर क्या भाजपा को मिली हार पर राजनाथ सिंह का यह जवाब सही है? क्या वास्तव में भाजपा उपचुनाव में मिली हार को दो कदम पीछे हटना कहकर यह साबित करना चाहती है कि वह जान बूझकर यह उपचुनाव हारी है, जिससे वह 2019 में लंबी छलाँग लगाएगी। यानी पूर्ण बहुमत से फिर से सरकार बनाएगी?

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयान से तो यही साफ होता है कि भाजपा के राजनीतिक तरकश में अभी वह तीर बाकी है, जिससे भाजपा 2019 में  सरकार बनाने के लक्ष्य को भेद पाने में कामयाब हो जायेगी। अगर वास्तव में भाजपा के राजनीतिक तरकश में जीत दिलाने वाला वो तीर बाकी है तो भाजपा को उपचुनाव में हार से इतना प्रेम क्यों? भाजपा जीत दिलाने वाले उन तीरों का इस्तेमाल अभी क्यों नहीं करना चाहती है?

क्या उपचुनाव में हार के पीछे भाजपा की कोई चुनावी रणनीति है, जिससे वह विपक्ष को 2019 में बड़ा झटका देने की तैयारी चुपचाप कर रही है? अब देखना यह है कि राजनीति में खेल के मैदान की यह कहावत कितनी चरितार्थ होगी कि कभी-कभी लंबी छलाँग लगाने के लिए दो कदम पीछे हटना पड़ता है। क्योंकि लोकतंत्र, राजनीति एवं खेल का मैदान तीनों में बहुत समानता नहीं होती। लोकतंत्र में हर इंसान को अपना फैसला लेने की स्वतंत्रता होती है। खेल के मैदान में खिलाड़ी के निर्णय में  कोच और कप्तान का भी हस्तक्षेप संभव है।

राजनीतिक में पार्टी के निर्णय चाहे कितने भी अच्छे क्यों न हो जाएं, लेकिन अगर वो जनता के हित में नहीं हो तो लोकतंत्र का एकमात्र वोट भी उस निर्णय का विरोध करने का हक रखता है। इसलिए लिए खेल के मैदान की कहावत को राजनीतिक में चरितार्थ करने के लिए भाजपा को उन नीतियों के तीर अपने तरकश से निकालने होंगे, जो विपक्ष को तो धाराशायी करने में कामयाब हों,  साथ ही साथ 2019 में  सत्तारूढ़ रहने के लिए भाजपा को पूर्ण बहुमत भी दिला पाएं।

कर्नाटक के नाटक ने राजनीति के मंच के कुछ  छलिया कलाकारों के किरदार में बड़ा बदलाव ला दिया है, जो भले ही 20019 में विपक्ष को सत्ता हासिल न करा पाए, मगर भाजपा को बड़ी चुनौती दे सकते हैं, जिससे भाजपा को सत्तारूढ़ होने के बावजूद भी बार-बार विरोध का सामना करना तय रहेगा। भाजपा के अपने गठजोड़ वाले छोटे-मोटे दल भी बड़ी मांग रख सकते हैं, जो कांग्रेस ने कर्नाटक से शुरू करा दिया है।

एक कहावत यह भी है कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। और भारतीय  राजनीति में इस तरह के कई खरबूजे हैं, जो गिरगिट से जल्दी रंग बदलने में महारत रखते हैं। इसलिए भाजपा को सिर्फ विपक्ष के महागठबंधन से ही नहीं बल्कि अपने सहयोगियों की भी मुँह माँगी कीमत पूरी करने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। देखते हैं 2014 से भारतीय राजनीति में शुरू हुए बदलाव के दौर में अभी तक जो चंचलता है वो 2019 तक कितने रंग बदलती हैं।

अरविंद कुमार चौधरी स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. कई पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं.