गंगा की बढ़ती लहरों से दशहत में आया यह इलाका, अब भगवान से आसरा

: गंगा कटान ने निगल ली इलाके की हजारों हेक्‍टयेर कृषि भूमि : स्‍थानीय सांसद डा. महेंद्रनाथ पांडेय इस समस्‍या से बेगाने : चंदौली :  जिले के वाशिंदे एक बार फिर दहशत में हैं। गंगा की धारा जैसे-जैसे बढ़ रही है, उनके हलक सूखते जा रहे हैं। कटान का डर उन्‍हें फिर सताने लगा है। लंबे समय से स्‍थानीय ग्रामीण कटान की समस्‍या से निजात दिलाने को लेकर सरकार से गुहार लगाते रहे हैं, लेकिन सिस्‍टम के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रहा है। अब गंगा के बढ़ने के साथ ही उनका कलेजा मुंह में आता जा रहा है। 

दरअसल, जीवनदायिनी गंगा इस धानापुर क्षेत्र के कई गांवों के लिए विनाशदायिनी बन चुकी हैं। कई काश्‍तकार परिवार भूमिहीन हो चुके हैं, कुछ बस इस बार के कटाने में हो जाने वाले हैं। अपने आंखों के सामने अपनी जमीन गंगा की गोद में समाता देखने के अलावा इन गांव वालों के पास कोई दूसरा चारा नहीं है। क्‍योंकि गंगा के बहाव को उनकी असली दिशा में लाना इन कुछ सौ या हजार की संख्‍या वाले ग्रामीणों के वश की बात नहीं है। उन्‍हें अब बस भगवान से आसरा है।

ग्रामीणों ने जनवरी में समाजसेवी अंजनी सिंह के नेतृत्‍व में लगभग बीस दिन तक धरना देकर सरकारी सिस्‍टम और जनप्रतिनिधियों की आंखें खोलने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। ग्रामीणों को लगता है‍ कि जिले के सांसद, विधायक या जिलाधिकारी जैसे इनके भाग्‍य विधाता इन्‍हें इस परेशानी से निजात दिला सकते हैं, लेकिन इस सिस्‍टम के आंख-कान ही बंद हैं। यह परेशानी से निजात क्‍या दिलाएंगे। संभावना है कि गंगा इस बार फिर कई लोगों को भूमिहीन कर जाएंगी।

सच भी है नौघरा, सहेपुर, दीयां, पसहटा, रायपुर, नरौली, धानापुर, कवलपुरा, पपरौली जैसे गांवों की हजारों हेक्‍टेयर भूमि को गंगा नदी की बदली धारा ने निगल लिया है। और अब बची खुची जमीन भी निगलने को आतुर हैं। बांके उपाध्याय का बताते हैं, ”पिछले पांच दशक में ग्राम सभा की 1000 बीघा भूमि गंगाकटान की बलि चढ़ चुकी है। इस सम्बंध में प्रशासनिक अधिकारियों समेत जनप्रतिनिधियों को मैंने कई बार पत्र लिखे, मगर नतीजा शून्‍य ही रहा।”

वह आगे बताते हैं, ”गाजीपुर की तरफ जो बालू की रेती है, उसमें बीच से नहर बना कर धारा का बहाव मोड़ा जा सकता है, जिससेकटान रूक सकती है। डाईवर्जन बांध भी एक विकल्प है।” भाजपा के प्रदेश अध्‍यक्ष डा. महेंद्र नाथ पांडेय के संसदीय क्षेत्र चंदौली के धानापुर कस्‍बे से मात्र दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित नौघरा गांव के रहने वाले अबुल कैश डब्‍बल और उनके भाई ठीकठाक जमीन के काश्‍तकार थे, लेकिन अब भूमिहीन होने के कगार पर पहुंच गए हैं।

ऐसा ही हाल राम किशुन यादव, जगदीश उपाध्‍याय, शाहनवाज खां जैसे ग्रामीणों का भी है। गंगा में आई दो-तीन बाढ़ इन्‍हें भूखमरी के मुहाने पर लाकर ढकेल देगी। इस बार फिर यही डर इन्‍हें सोने नहीं दे रहा है। गंगा की लहरों का ठोकर जमीन सह नहीं पा रही है। दरअसल, गंगा की मारक कटान कई गांवों की हजारों एकड़ खेती वाली जमीन निगल चुकी है और बची खुची जमीन भी अपने आगोश में समाहित कर लेने पर अमादा है।

नरौली जैसे गांव के कई वाशिंदे तो बस एक अदद बाढ़ आई नहीं कि बेघर हो जाएंगे। गंगा की यह विनाशलीला कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है बल्कि यह लोभ, लालच, संवेदनहीनता और प्रकृति से खिलवाड़ करने का प्रतिफल है, जिसके लिए कम से कम यह ग्रामीण कतई दोषी नहीं हैं। गंगा में बालू खनन के दौरान नियम के प्रतिकूल खनन से यह स्थिति पैदा हुई है। अभी हाल ही में बनारस के रमचंदीपुर में तय सीमा अधिक अवैध खनन कर दिया गया। शासन-प्रशासन के जिम्‍मेदार लोग आंख मूंदे रहे।

जब किसी ग्रामीण ने कोर्ट की शरण ली तो इनकी नींद में खलल पड़ा और जांच करने का ड्रामा और दोषी तय करने का खेल शुरू हो गया। दरअसल, यह खेल प्रत्‍येक सरकार में चलता रहता है, आगे भी चलता रहेगा, लेकिन इससे जो नुकसान हुआ यह कि इसकी वजह से गंगा अपने मूल धारा यानी बहाव एरिया से हट जाएंगी और इसकी कीमत उन्‍हें चुकानी पड़ेगी, जो इस मामले में कहीं से भी दोषी नहीं हैं। एक ईमानदार योगी कितना बदलाव कर लेंगे, जब काम करने वाले सिस्‍टम की नसों में भ्रष्‍टाचार ही दौड़ रहा है, लेकिन इसकी कीमत उस आम जनता को चुकानी पड़ती है, जिसका इसमें कोई रोल नहीं होता है।

इस मामले को लेकर शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की सक्रियता का आलम यह है कि केवल खानापूर्ति की जा रही है। चंदौली के सांसद डा. महेंद्रनाथ पांडेय इस मामले को लेकर बहुत चिंतित नहीं दिखते हैं। उनके संसदीय क्षेत्र चंदौली में गंगा कटान मामले में उनसे संपर्क करने में ही पसीने आ गए। जब भी उनसे उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, वह इतने बिजी मिले कि उनसे संपर्क करना संभव नहीं हो पाया।

गंगा कटान पर लंबा काम करने वाले वाले चंदौली के पत्रकार एम अफसर खां कहते हैं, ”प्रकृति के मूल रचना के साथ जब भी छेड़-छाड़ होती है, तब वही चीजें इंसानों के लिए विनाश का सबब बन जाती हैं। इंसान अक्सर अपने ही बुने जाल में फंसकर तड़फड़ाता नजर आता है और जब उसे होश आता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसा ही माजरा धानापुर ब्लाक के दर्जनों गांव के लोगों के साथ घटित हो रहा है।”

चंदौली जिले में गंगा किनारे बसे गांवों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। अफसर आगे बताते हैं, ”बात विगत पांच दशक पुरानी है। कृषि उत्थान की खातिर धानापुर क्षेत्र के रायपुर में गंगा नदी पर नगवां पम्प कैनाल की स्थापना की गयी थी। गंगा नदी ही चन्दौली व गाजीपुर जनपद को बांटती है, इसलिए कैनाल स्थापना से पूर्व गंगा की धारा का बहाव गाजीपुर की तरफ था, मगर कैनाल स्थापना के बाद गंगा की धारा को चन्दौली की तरफ मोड़ा गया, जो कि विकास की जीवन रेखा खींचने की बजाय विनाश की लकीर खींच रही है।”

वह आगे बताते हैं, ”एक तरफ तो कैनाल ने दर्जनों गांवों को सिंचित करने का काम किया है तो दूसरी तरफ इसकी वजह से सैफपुर, दीयां, प्रसहटां, हिंगुतरगढ़,  बुद्धपुर, नौघरा, रायपुर, नरौली,  मुहम्मदपुर,  बड़ौरा खालसा,  मिश्रपुरा, अमादपुर, मेढ़वां,  नगवां, कवलपुरा, प्रहलादपुर,  डबरिया,  गुरैनी,  बीरासराय, अवहीं, महुंजी समेत धानापुर विकास खण्ड के दर्जनों तटवर्ती गांवों पर कटान का संकट गंभीर हो चुका है। कुछ गांवों के वजूद पर संकट मण्डरा रहा है।”

इस कटान का असर है कि सैफपुर से महुजी तक दस हजार बीघा से ज्यादा भूमि गंगा में विलीन हो चुकी है। गंगा कटान ने गंगबरार को तो पूरी तरह निगल लिया है। अब बारी अराजी दीयारा की है, जो हर साल बरसात में टूट रही है। चकेरी घाट से चलती गंगा की धारा दक्षिण दिशा में आकर टकराती है, जिसकी वजह से व्यापक पैमाने पर कटान होता है। कटान की वजह से नौघरा में आकर गंगा ने यू आकार ले लिया है। नौघरा गांव के सामने गंगा के बीच में जमा बालू का टीला चंदौली को सबसे ज्‍यादा क्षति पहुंचा रही है। खुद को जमींदार कहने वाले भूमिहीन की श्रेणी में पहुंच चुके हैं।