महबूबा की नाकामी और नासमझी का नुकसान देश ने उठाया

modi mahbuba

राज बहादुर सिंह

: …कोई कितना मुखालिफ हो, उसे अपना बनाती है :  लखनऊ : इस्तीफा देने के बाद महबूबा मुफ्ती ने कहा कि काश्मीर में बल प्रयोग करने से बात नहीं बनेगी। हो सकता है कि उनके पास इस का कोई आधार हो, लेकिन इस से बड़ा और कटु सत्य यह है कि कश्मीर में तो आज तक बल प्रयोग हुआ ही नहीं और यही वजह है कि गद्दारों और उनके हिमायतियों के हौसले बढ़ते गए। आगे भी सरकार गद्दारों के खिलाफ कठोर कदम उठाएगी, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता।

गोस्वामी तुलदीदास का यह कथन शाश्वत सच्चाई है कि दुष्टों के लिए ”भय बिन होय न प्रीति” ही सही रणनीति है। यह नीति शत प्रतिशत न सही, लेकिन 90 प्रतिशत सही हो सकती है और इसकी सफलता को इजराइल के सुरक्षा बलों और पोलिटिकल लीडरशिप के फोर्सेज के काम में दखल न देने की पालिसी के जरिए देखा और समझा जा सकता है।

पीडीपी के साथ सरकार बनाने का भाजपा का फैसला तब के हालात में मजबूरी से प्रेरित ही सही, लेकिन एक सही फैसला था। राजनीति एक अलग तरह की प्रयोगशाला भी होती है और भाजपा-पीडीपी गठबंधन एक प्रयोग ही था। जोखिम से भरा प्रयोग। लेकिन फिर जोखिम भी राजनीति का अभिन्न हिस्सा है और कई बार न चाहते हुए भी इससे बचना मुमकिन नहीं होता। यही भाजपा और पीडीपी दोनों के साथ हुआ।

इस गठबंधन से कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सीने पर सांप लोटते रहे और आज जब यह गठबंधन टूट गया तो दोनों को मसर्रत हासिल हुई होगी, यह कह पाना मुहाल है। दोनों ने ही वैकल्पिक सरकार के गठन से इनकार भी कर दिया है। कांग्रेस की तो हालत जम्मू-कश्मीर में लगभग खस्ताहाल हो चुकी है और इसे किसी की बैसाखी मिलना भी नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है।

महबूबा का यह कहना कि उन्होंने धारा 370 खत्म नहीं होने दी, महज कोरी गप है। धारा 370 को खत्म करने की एक प्रक्रिया है और इसके लिए जितनी विधायी ताकत चाहिए वह भाजपा के पास थी ही नहीं। ऐसे में 370 को बनाए रखने का श्रेय लेने की महबूबा की कोशिश बेहद बचकाना है। महबूबा ने रमजान के महीने में सीज फायर तो कराया, लेकिन न तो उनकी अपील असरदार साबित हुई और न ही वह गद्दारों और आतंकियों के मंसूबों को समझ सकीं। उनकी नाकामी और नासमझी का नुकसान देश ने उठाया।

बहरहाल भाजपा और पीडीपी का गठबंधन दोधारी तलवार था और दोनों को ही इसकी चुभन महसूस भी होने लगी थी। दोनों अपने आगाज के अंजाम से नावाकिफ भी नहीं थे। बहरहाल अब गवर्नर राज नाफ़िस होना तय माना जा रहा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सुरक्षा बलों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर देश हित में काम करने की आज़ादी हासिल हो सकेगी।

और जहां तक पीडीपी और भाजपा के रिश्ते टूटने की बात है तो सियासत में यह कोई खास मायने नहीं रखता। किसी शायर के लफ्जों में इसे आसानी से यूं समझा भी जा सकता है-

सियासत जब जरूरत हो नया रिश्ता बनाती है,
कोई कितना मुखालिफ हो उसे अपना बनाती है।rbs

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.