दूषित राजनीति की ध्वजवाहक कांग्रेस

राज बहादुर सिंह

: क्या है अब शेष? कदाचित अवशेष : आशंकाओं से घिरी व्याकुलता अब चरम पर पहुंच रही है। हाव भाव प्रदर्शित कर रहे हैं कि अत्यधिक शीघ्रता है। जैसे अब नहीं तो कभी नहीं। टूटे मनोबल वाले सैनिक और सिपहसालार अधीर हो चुके हैं। कदाचित इस मनोदशा के साथ कि अब न संभला तो फिर आशियाना तिनका तिनका बिखर जाएगा। और यदि उपरोक्त परिस्थितियां हों और नेतृत्व में स्वाभाविक गुण के स्थान पर थोपा हुआ ठेलू मार्का विदूषक तत्व हो तो दृश्य वैसा ही होता है जैसा इस समय नजर आ रहा है।

अब तक आप समझ ही गए होंगे कि बात दयनीय हालत में पहुंची हुई कांग्रेस और उसके और भी अधिक दयनीय नेतृत्व की हो रही है। भाषा की मर्यादा भूल चुके हैं। संसदीय मर्यादा तो कभी पास नहीं फटकी। जिसे आज चोर और गद्दार बता रहे हैं उसे गले लगाने के लिए कैसे लोकसभा में उसके गले पड़ गए थे। फिर अपने अभिनय की स्वयं सराहना करते हुए आंख मारकर सिद्ध कर दिया संसद की कार्यवाही उनके लिए कॉमेडी शो से ज्यादा अर्थ नहीं रखती।

आप को उनकी इस मानसिक स्थिति का आकलन करते हुए सहानुभूति की दृष्टि भी डालनी चाहिए। एक व्यक्ति अपनी अज्ञानता और एक धर्म विशेष को खुश करने की कोशिश में देश की कई अदालतों में डिफेमेशन के मामलों में घिरा है। अपनी माता और खास सिपहसालारों के साथ हजारों करोड़ के फ्राड के ऐसे सिक्काबन्द मामले का सामना कर रहा है जिसमे गिरफ्तारी से बचने के लिए मां बेटे को सशरीर अदालत में हाजिर होकर जमानत लेनी पड़ी हो। कांग्रेस की अधोगति का यह निकृष्टम नमूना है। भ्रष्टाचार तो जैसे परिवार और पार्टी की पहचान बन गयी है।

ऐसी मनोदशा में घिरा व्यक्ति क्या करेगा ? उसकी हर चंद कोशिश होगी कि मैं ही क्यों चोर कहा जाऊं ? औरों की भी ऐसी ब्रांडिंग कर दो। शायद ममता और अज्ञानता की छांव तले पाले पोसे गए इस नौनिहाल को पता नहीं कि यह सेकंड वर्ल्ड वॉर का समय नहीं है जब हिटलर की कयादत में नाज़ी सरकार के प्रचार मंत्री गोबल्स के इस सिद्धान्त की मान्यता को एक हद तक स्थापित मान लिया गया था कि झूठ को बार बार दोहराने से वह सत्य जैसा प्रतीत होने लगता है। अब तो गोबल्स जैसी कोशिश वह भी पॉलिटिक्स मे, हाराकिरी से कम नहीं है।

कांग्रेस कैसी राजनीति कर रही है इसकी एक बानगी इसके लोकसभा में नेता खड़गे हैं। इस साल इन्होंने अब तक छह बार लोकपाल चयन समिति की बैठक का बहिष्कार किया है। कहते हैं कि वह विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में बैठक में शिरकत नहीं करेंगे। हे देवदूत आप और आपकी पार्टी यह कब समझेगी कि कांग्रेस लोकसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल है न कि अधिकृत विपक्षी दल।लोकपाल अधिनियम 2013 के अनुसार चयन समिति का स्थायी सदस्य लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होता है जो खड़गे नहीं है। जो हो नहीं वह मानकर कैसे बुला लिया जाए। क्या 19984 में 29 सदस्यों वाली सबसे बड़ी विपक्षी तेलगूदेशम पार्टी को राजीव गांधी सरकार ने नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी थी ?

आइए अब बात राफेल की करें। कांग्रेस को तो इस मामले में खुद ही इतने सवालों के संतोषजनक जवाब पहले देने चाहिए और तब कहीं जाकर उन्हें सवाल पूछने का हक़ मिलेगा। आप कौड़ियों के भाव में खरीद रहे थे तो दस साल में खरीदा क्यों नहीं ? बाधा क्या थी ? वायुसेना की जरूरत को दस साल तक लटकाए रखने की अपराधी है कांग्रेस। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद कह रहे हैं कि रिलायंस को लेकर सही जवाब डसाल्ट एविएशन देगी। तो कैसे चोर व गद्दार बता दिया भारत के पीएम को।

ऐसा लगता है कि राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस को अब विदेशी ताकतों की जरूरत पड़ने लगी है। चीनी राजदूत और पाक के मौजूदा व एक्स राजनयिकों से चोरी चोरी चुपके चुपके की मुलाकातों को क्या संज्ञा दी जानी चाहिए ?

कुल मिलाकर कांग्रेस जल्दबाजी में है। और ठीक भी है। देश की प्रगति और उन्नति के लिए अप्रासंगिक हो चुकी कांग्रेस को जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी माज़ी का मसला हो जाना चाहिए। पराभव हो चुका है। वैभव जा चुका है। क्या है शेष ? कदाचित अवशेष।

rbsराज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.