संघर्ष से ज्यादा गठबंधन पर केंद्रित है विपक्ष

मनोज श्रीवास्तव

लखनऊ। लोकसभा चुनाव 2019 की तैयारी में लगा विपक्ष केंद्र सरकार के तानाशाही और जनहित विरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने के बजाय गठबंधन के मुगालते में फंसा है। वोट बैंक के हिसाब से उत्तर प्रदेश में विपक्ष की राजनीति की धुरी बनी बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने अभी अपना पत्ता नहीं खोला है। पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार बसपा से गठबंधन का संकेत दे रहे हैं।

कांग्रेस यूपी में विपक्ष के राजनैतिक गठबंधन में स्टेपनी से ज्यादा हैसियत नहीं रखती। नेतृत्व बचाने के भय में सोनिया गांधी ने यूपी में संघर्षशील नेताओं को निपटाते-निपटाते कांग्रेस को ही निपटा दिया। विपक्ष में रह कर अखिलेश सरकार से दो-दो हाथ करने वाले कार्यकर्ताओं को राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव 2017 में समाजवादी पार्टी से हाथ मिला कर कांग्रेस का बंटाधार कर दिया।

गठबंधन के ख्यालों में डूबे राहुल-अखिलेश केंद्र सरकार द्वारा 15 लाख खातों में डालने, हर वर्ष 2 करोड़ बेरोजगार युवकों को नौकरी देने, बैंकों द्वारा उपगोक्ताओं के आर्थिक शोषण और रेलवे की ध्वस्त व्यवस्था में यात्रियों की तबाही को मुद्दा बना कर कोई प्रदर्शन न करके फिसड्डी साबित हो गए हैं। अवैध बग्लादेशियों और रोहग्निओं के मुद्दे पर एकजुट होने वाली पार्टियां जनविरोधी नीतियों के विरोध में आकर सामूहिक प्रदर्शन नहीं कर पाए। यूपी में अपराध सर चढ़ कर बोल रहा है, राजधानी में अकेला बदमाश राजभवन और मुख्यमंत्री के मुख्य रास्ते पर बैंक लूट कर भाग गया, पुलिस हाथ मलती रह गयी।

कथित सरकारी तैयारी के बाद भी बाढ़ से जनता जूझने को मजबूर है। एक ही दिन राजधानी के अलग-अलग क्षेत्रों में पुराने मकान ध्वस्त होने से 4 मौतें हो गयीं। मेरठ के खाद्यान्न घोटाले मामले में जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी प्रदेश सरकार सीबीआई जांच के आदेश देने से भाग रही है।

इस संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार दिवस दुबे का कहना है कि यूपी में भाजपा की केंद्र और प्रदेश दोनों सरकारों ने जनता को केवल झुनझुना थमाया है, यदि विपक्ष एक भी दल जनहित को वरीयता देता तो वह गठवन्धन से ज्यादा सरकार विरोधी नीतियों पर दो-दो हाथ करने पर जुटती।manoj

 

वरिष्‍ठ पत्रकार मनोज श्रीवास्‍तव की रिपोर्ट.