आपकी सेहत के लिए घातक है बोतलबंद पानी, ये रहा कारण

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आलोक कुमार

: पानी जो हम पीते हैं, उसी सहारे जीते हैं : पाकिस्तान को लेकर उत्सुकता है। कॉपरेटिव नेता अशोक डबास मिले। वहां की हुंजा वैली की तारीफ करने लगे। यह हिमालय की तलहटी में है। वहां इंसान की औसत उम्र सबसे ज्यादा है। सत्तर-पचहतर साल का व्यक्ति बिलकुल जवान। सौ-एक सौ बीस साल तक मस्ती से जी लेना, वहां आम बात है।

डबास साहब का ताल्लुक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से है। संघ का व्यक्ति पाकिस्तान की तारीफ करे, तो वैचारिक विरोध वाले अचरज से भर सकते हैं। लेकिन पानी को लेकर थोड़ी समझ है। 2012 से जलजोगिनी चला रहा हूं। 2013 की अक्षय तृतीया पर देवघर के शिवगंगा की सफाई का सामर्थ्य साधा। पिताजी मौजूद रहे। इसके जरिए जो जपता रहता हूं, डबास साहब की बात वहीं आकर पहुंची।

वह बताने लगे, जीवन से पानी का गहरा रिश्ता है। बेहतर स्वास्थ्य के लिए भोजन से ज्यादा पानी की क्वालिटी का महत्व है। पानी के रास्ते ही बीमारी इंसान को जब्ज कर लेता है। गुणवत्ता की परख का मापक पानी का पीएच लेवल है। पिछले दिनों हमारे दफ्तर की संध्या जी के पतिदेव और दिल्ली जल बोर्ड के मशहूर इंजीनियर भाटी साहब को सुन रहा था। वह अनुभव से बता रहे थे कि दिल्ली के जिन इलाकों में गंगा वाटर की सप्लाई है, वहां आरओ लगाना बेवकूफी है। आरओ गंगा वाटर के बेशकीमती मोल्येक्यूल्स को खत्म कर देता है। आरओ पानी में कैल्सियम को नहीं बचने देता है। यह हड्डी से जुड़े रोग की सबसे बड़ी वजह है।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन से बता दिया है कि मेरे ननिहाल में पटवारी पोखर से ज्यादा बेहतर सोनेलाल पोखर का पानी क्यों था। पीएच लेबल के अंतर से ही सोनेलाल पोखर के पानी में पकाने पर दाल जल्दी गल जाता और आंगन के पोखर के पानी में दाल गलता ही नहीं था। बज्जर हो जाता था। मां कहती है, आपसी झगड़े में सोनेलाल का पोखर सूखने लगा, तो दाल गलाने पीने के लिए बगल के कुंए के पानी का इस्तेमाल होने लगा। भोजन के लिए पोखर और पीने के लिए कुएं के पानी का इस्तेमाल होता था। पूरे गांव में कुलजमा एक चापाकल था। ठंडे पानी के लिए बच्चे किलोमीटर दूर से उसे बोझकर लाते थे। ननिहाल मधुबनी जिला के बलाट गांव में है।

बात चली तो बोतल बंद पानी का पीएच लेवल सबसे घटिया होने का पता लगा। चर्चा के दौरान मशहूर चार्टर अकाउंटेंट मुकेश जैन मौजूद थे। वह दिल्ली के द्वारका में रहते हैं। वहां इन दिनों जल बोर्ड सुपर ट्रीटेड वाटर दे रहा है। यह स्वास्थ्य के लिए घातक बन रहा है। द्वारका में लोग जमकर बीमार पड़ रहे हैं। किडनी के मरीजों की आबादी बढ़ती जा रही है। इस खतरे के प्रति लोग सरकार को लगातार आगाह कर रहे हैं। लेकिन बात नहीं बन रही।

उन्होंने याद दिलाया कि जैन धर्म में पानी छानकर पीने की परंपरा है। महावीर जैन के अनुयायी सदियों से पानी को लेकर सुचिता पाले हैं। वो मानते हैं कि ज्यादा देर तक स्थिर पानी सेहत के लिए नुकसानदेह होता है। पीने से पहले उसे हिल्कोरना चाहिए। 48 घंटे से ज्यादा स्थिर जल में कीटाणु पैदा हो जाते है। जैन साहब खुद किसी जल को सफेद सूती के कपड़े से छाने बिना ग्रहण ही नहीं करते। कहते हैं पानी को घडे-बोतल आदि में ज्यादा समय तक कैद रखना ठीक नहीं।

सवाल मौजूं हो गया है कि हम जो पानी पी रहे हैं। जिसे शरीर में उतार रहे हैं। वह अंदर जाकर क्या कर रहा है? इसकी खबर होनी चाहिए। इसपर बहस होनी चाहिए। नतीजा निकलना चाहिए। पिताजी शाकाहारी रहे। उनका जोर भोजन पर था। बाहर पका कम खाते। घर का खाना पसंद करते। भाव प्रधान रहे। उनकी चिंतन में ये बात नहीं रही कि पानी भी खराब हो सकता है। वह कहते आप जिस किचन का बना खाते हैं, उसे बनाने वाले का भाव महत्वपूर्ण होता है। आपका स्वास्थ्य तदनुरुप ढल जाता है। आपके चिंतन पर भनसिया के भाव का गहरा असर पड़ता है। इस नतीजे के विश्लेषण को उनसे विस्तार से नहीं जान पाया।

हां, एक ट्रेन यात्रा में पिताजी के उम्र के सहयात्री से मुलाकात याद है। वह सहरसा के आरके सिंह थे। बहत्तर की उम्र में नौजवान लगे। हर स्टेशन पर उतरते, पीने के पानी को बोतल में भरते और उसे पीते रहे। बालक वैभव से बातों-बातों में खेलते रहे। बेटे को जब हमने बंद बोतल का पानी पिलाया, तो रोकने लगे। उन्होंने कहा कि बच्चे के इम्यून पॉवर को मारने का पाप न करूं।

उनकी राय में हम जिस बोतल बंद पानी को शुद्ध जल समझते हैं, वह नुकसानदेह है। अगर उसकी आदत पड़ गई, तो अंदर की प्रतिरोधक ताकत शिथिल पड़ जाएगी। ये प्रतिरोधक क्षमता की ताकत ही है, जो हमारे स्वास्थ्य का आधार है। बीमारी को हमसे दूर भगाए रखने का आणविक अस्त्र है। प्रतिरोधक क्षमता की मजबूती के लिए अपने यहां 72 घाट का पानी पीने का रिवाज है। जिसने जितने जगह की पानी पी, वह उतना ही बलवान। उतना ही स्वस्थ। यानी ननिहाल वालों को सोनेलाल के पोखर सूखने का अफसोस पालने के बजाय पटवारी पोखर के पानी से दाल गलाकर खाने की कोशिश करनी चाहिए।

विकट पानी हमारी प्रतिरोधक क्षमता को तराशता रहता है। पानी के जरिए हमारे अंदर उतरने वाले कीटाणुओं से निरंतर लड़ता रहता है। हुंजा वैली की पानी पीने के लिए काराकोरम के इलाके तक भारत की पहुंच होनी चाहिए। भारत-पाकिस्तान बंटवारे को खत्म करना चाहिए। जब उत्तर और दक्षिण कोरिया में दोस्ती गंठ सकती है, तो किस्मत से हम भी एक हो सकते हैं। इस लड़ाई में जीत सुनिश्चित करने का शौर्य पाले रखना चाहिए।

वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक कुमार के फेसबुक वाल से साभार. आलोक कुमार आजतक समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रहे हैं.