हां, मैं चोर हूं, मैंने अटल जी के घर चोरी की

आलोक कुमार

: आडवाणी इतनी छूट नहीं देते कि कोई चोरी की बात कर ले : नई दिल्‍ली : हां, मैं चोर हूं। महानायक के घर में चोरी की है। चाहे तो कोई मुकदमा कर ले। वकील दोस्तों की चांदी कट जाएगी। आज सच उद्घाटित करते हुए संकोच नहीं हो रहा है, क्योंकि इसका वास्ता सीधे अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा है।

बात 1994 की है। अटल जी विपक्ष के नेता थे। पत्रकार के नाते मिलना लगा रहता। वो छह रायसीना रोड की कोठी में रहते थे। उनसे हुई एक मुलाकात चिर स्मरणीय है क्योंकि वह चौर्य जैसे घत्कर्म से जुड़ी है।

एक दिन अचानक उस्ताद आलोक तोमर के साथ छह रायसीना रोड आवास पर पहुंच गया। बाहर कड़क मूंछ वाले शिवकुमार जी मिले। भैया (स्वर्गीय आलोक तोमर) और शिवकुमार जी के रिश्ते अनौपचारिक थे। एकपल बिठाए बिना उन्होंने तत्काल अंदर जाने का आदेश दे दिया।

अटल जी उल्लसित मुद्रा में थे। आंगन में कुत्ते के साथ खेल रहे थे। हमारे पहुंचते ही उसे दूर ले जाने का आदेश दिया। फिर मुलाकात का मकसद पूछा। दोनों ग्वालियर से लेकर राजनीति और न जाने इधर-ऊधर की कितनी बातें करते रहे। मैं मूक दर्शक बना रहा। ज्यादा खुला नहीं।

कोठी से बाहर निकलने का रास्ता लाइब्रेरी से था। रैक में कुछ किताबें थी। हम वहां थोड़ा रुके। उनमें आलोक तोमर जी की किताब “प्रतिसमाचार” भी थी।

मैंने कहा – भैया ये पढ़ी नहीं है। उन्होंने किताब उठाई। उसपर लगी धूल झाड़ी और मेरे हाथ में थमा दी। आदेश दिया कि शर्ट में छिपा लो। बड़े भाई ने ना नुकुर करने की गुंजाईश ही नहीं छोड़ी।

फिर हम चोर की मुद्रा में मुस्कुराते हुए अटल जी के घर से बाहर निकल आए। शिवकुमार जी को दूर से ही हाथ हिलाते हुए धन्यवाद दिया। अफसोस कि उस चोरी की बात को चौबीस साल दवाए रखा। काश, कोई मौका मिला होता, तो सामने खड़े होकर पश्चाताप कर लेता।

बाद में राजग की सरकार बनी, तो अटल जी प्रधानमंत्री बने। तब पत्रकारिता में मेरे जिम्मे गृह मंत्रालय था। अटल जी से कम और आडवाणी जी को कवर करता रहा। उनके साथ देशाटन का खूब मौका लगा।

आडवाणी जी आदर्शमूर्ति हैं। वह मिलने वालों को इतनी छूट नहीं देते कि कोई चोरी की बात कर ले। उनसे इस तरह की बात नहीं की जा सकती है। लेकिन इरादा था कि कभी पीएमओ कवर करने जाऊं। प्रधानमंत्री को फुर्सत में पाऊं तो जरुर कहूंगा।

लेकिन ऐसा कोई एकांत वाला मौका नहीं मिला, जिससे उनके सामने खड़ा होकर पश्चाताप करता और सजा मांग लेता। अटल जी को भेंट की गई वह किताब आज भी मेरे किताबों के रैक में है।

अटल जी के भाषण सुनने की पहली याद स्कूल की है। बात 1982 की। इंदिरा गांधी सत्ता में थी। मुजफ्फरपुर के चक्कर मैदान में रैली थी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी आए थे। पार्टी नई थी। कमल निशान नया था। उससे वोटर को परिचित करना जरुरी था। इसके लिए वो ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे थे।

वाजपेयी जी घूम घूमकर सफाई दे रहे थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री को कभी चंडी या दुर्गा नहीं कहा। ऐसा कहा होता, तो यह हमारी आराध्य देवी का अपमान होता। मैं भला ऐसा कैसे कह सकता हूं।

अटल जी 1971 में बंगलादेश युद्ध विजय के समय इंदिरा गांधी को लेकर कही अपनी ही बात को अफवाह बताए जा रहे थे। ताकि कांग्रेस से खुद को अलग दिखा पाएं। इसके लिए वह अपनी सफाई पेश कर रहे थे पर मैं उन अभागों में हूं कि जो उनके घर चोरी की लेकिन कभी सफाई पेश नहीं कर पाया। पश्चाताप का मौका नहीं निकाल पाया।

स्कूली दिनों में बीबीसी हिंदी सर्विस पर ही अटल जी को पहली बार सुना था। ऑल इंडिया रेडियो पर विपक्ष को कम समय मिलता। यह शिकायत आम थी। मुजफ्फरपुर में मामा थे। बेतिया से निकल उनसे मिलने गया था। उसी रोज वहां अटल बिहारी वाजपेयी जी की सभा थी। विशाल भीड़ उमड़ी थी। मामा जी के साथ मोटरसाइकिल से पहुंचे थे। दूर लाउडीस्पीकर के नीचे खड़ा होकर सुन रहे थे। इतनी दूर से मंच की झलक पाना नामुमकिन था।

कोलाहल के बीच अटल जी मंच पर पहुंचे। जोरदार स्वागत हुआ। शोर कम होने का नाम नहीं ले रहा था। अटल जी उठे और माइक पकड़ ली। बोल पड़े – “जानता हूं। आप बिहारी हैं। शांत नहीं होंगे। पर आपको बता दूं, आप बिहारी हैं, तो मैं अटल बिहारी हूं। हिलने वाला नहीं हूं। बोले बिना नहीं जाऊंगा।“ भीड़ सम्मान में एकदम से शांत हो गई।

उनके ओजपूर्ण भाषण का एक-एक वाक्यांश याद रखना तो कठिन है। लेकिन उन्होंने गफलत का इजहार करते हुए एक स्थापित मुहावरे को बदल दिया। उसकी जगह नया मुहावरा गढा था। वह खूब याद है। उन्होंने कहा- यहां दाल में काला नहीं, चीनी में चींटा है।

वरिष्‍ठ और देश के जाने माने पत्रकार आलोक कुमार के एफबी वाल से साभार. श्री कुमार आजतक, सहारा समय समेत कई चैलनों एवं अखबारों में काम कर चुके हैं.