सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर हंगामा है क्यों बरपा!

कुमार नरेंद्र सिंह

: समलैंगिकता कोई विकृति नहीं, बल्कि प्रकृति ही है : पिछले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सहमति से दो वयस्कों के बीच कायम होनेवाले समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर क्या कर दिया कि लगता है जैसे देश में भूकंप आ गया हो। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक में अदालत के इस निर्णय की आलोचना हो रही है। एक से एक धुरंधर अपने नथुने फुला रहे हैं और अदालत के फैसले को कोस रहे हैं। उनकी नजर में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय संस्कृति के खिलाफ तो है ही, अप्राकृतिक भी है। कई विद्वान इसे अवैज्ञानिक भी बता रहे हैं।

सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का वे न केवल जमकर मजाक उड़ा रहे हैं, बल्कि उनकी भाषा भी बहुत तल्ख और आक्रामक है। इसके विपरीत जो लोग अदालत के फैसले को उचित बता रहे हैं, उनकी भाषा डरी-सहमी है। संलैंगिकता से संबंधित समाज में प्रचलित धारणा के चलते वे खरी-खरी कहने से बचते नजर आ रहे हैं। तो क्या सच में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारतीय संस्कृति के खिलाफ और अप्राकृतिक यौन संबंधों को बढ़ावा देनेवाला है? इस सवाल का जवाब देने के पहले यह देखना-जानना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर धारा 377 को अपराध की श्रेणी से मुक्त किया है।

शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को बचाव नहीं करने वाला और मनमाना करार दिया है। उसका मानना है कि इस धारा से समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि धारा 377 एलजीबीटी के सदस्यों को परेशान करने का हथियार था, जिसके कारण भेदभाव होता है। अदालत के इस फैसले में गरिमा के साथ जीने के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता दी गयी है, क्योंकि धारा 377 के कारण एलजीबीटी सदस्य छुप कर और दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में रहने को विवश थे। कोई ये न समझे कि सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक संबंधों के खिलाफ कही जाने लाली बातों से अनजान रहा होगा।

जो लोग समलैंगिकता को भारतीय संस्कृति के विरूद्ध बता रहे हैं या अप्राकृतिक बता रहे हैं, वे वास्तव में भारतीय समाज में प्रचलित घिसी-पिटी धारणाओं के शिकार हैं। जिस समाज में सेक्स के बारे में बात करना भी गुनाह समझा जाता हो, वहां समलैंगिक संबंधों की वकालत करना किसी अपराध से कम नहीं। वास्तव में यह कहना ढोंग है कि समलैंगिक संबंध भारतीय संस्कृति के विरूद्ध है। सच तो यह है कि न केवल भारत बल्कि दुनिया के हर समाज में समलैंगिकता का प्रचलन रहा है।

भारतीय समाज में भी समलैंगिकता गहरे पैठी हुयी है। यह अलग बात है कि हम उसे मानने को तैयार नहीं होते। सच तो यह है कि भारतीय समाज में हमारा पहला यौन-संबंधी अनुभव समलैंगिक लोगों से ही प्राप्त होता है – कभी जाने में तो कभी अनजाने में और कभी-कभी उत्सुकता वश। हमारे समाज में लड़के-लड़कियों के बीच सहज संवाद को भी असहज ढंग से देखा जाता है। ऐसे में सबसे पहले समलिंगी अनुभव ही हमारे पल्ले में आता है।

हम अपने गांव-घरों में जानते रहते हैं कि अमुक व्यक्ति समलैंगिक यौन संबंध रखता है, लेकिन उसे लेकर हम कभी व्यग्र नहीं होते और ना कभी कोई परेशानी होती है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि समलैंगिक रुझान वाला व्यक्ति भी उतना ही सहज होता है, जितना अन्य। लेकिन इसे स्वीकार करने के लिए हम तैयार नहीं होते। इसलिए यह कहना कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृति के खिलाफ है, वास्तव में एक ढोंग है।

हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में भी समलैंगिक संबंधों की झलक मिलती है। वेद, पुराण से लेकर रामायण औऱ महाभारत तक में समलैंगिकता को उजागर करने वाली अनेक कहानियां मिलती हैं। समलैंगिक संबंधों को अप्राकृतिक बताने वाले शायद नहीं जानते कि समलैंगिकता कोई विकृति नहीं, बल्कि प्रकृति ही है। वेद कहता है कि विकृति भी प्राकृतिक ही है, क्योंकि वह भी प्रकृति में ही शामिल है।

खजुराहो और कोणार्क मंदिर की दीवारों पर समलैंगिक यौन मुद्राओं वाली मूर्तियां इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय संस्कृति में समलैंगिकता कभी वर्जित नहीं रही। अगर यह वर्जित होता, तो इसके खिलाफ दंड का प्रावधान भी जरूर होता, लेकिन हमारे किसी भी धर्मग्रंथ में समलैंगिकता के खिलाफ दंड का प्रावधान नहीं है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी इसे केवल विकार मानता है और समलैंगिक संबंध रखने वालों के लिए निम्नतम सजा का विधान रखता है, जिसमें गंगा नदी में स्नान करने से लेकर दान करने की बात कही गयी है।

ऐसी अनेक कहानियां हैं, जिनमें परोक्ष रूप से समलैंगिक संबंधों का विवरण है। समलैंगिकता को हमारे देश में कभी अपराध नहीं माना गया। इसे आपराधिक कृत्य तो अंग्रेजों ने बनाया। दरअसल, समलैंगिकता को अपराध बताने का प्रचलन अब्राहमवादी नैतिकता से नि:सृत है, जिसे ईसाई धर्म ने परवान चढ़ाया। कोई यह न समझे कि अब्राहमवादी धर्मों यानी यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म मानने वालों में समलैंगिकता का प्रचलन नहीं है।

इस्रायल यहूदियों का देश है, लेकिन वहां समलैंगिकों को वे सारे अधिकार प्राप्त हैं, जो अन्य लोगों को प्राप्त हैं। तेल अवीब को तो दुनिया का गे कैपिटल कहा जाता है। इसी तरह इंग्लैंड, अमेरिका और स्कैंडिनेवियन देशों यथा स्वीडेन, फिनलैंड, नार्वे आदि में भी संमलैंगिक समुदाय के लोगों के अधिकार सुनिश्चित किये गये हैं। हमने विक्टोरियाई नैतिकता को ही अपनी नैतिकता समझ ली और समलैंगिकता को अपराध मानने की मानसिकता गढ़ ली।

आज अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य की यौन अभिरुचि वातावरण, प्रचलित मान्यताओं और जैविक तत्वों के जटिल अंतरक्रिया का परिणाम होता है, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण जैविक कारण होते हैं। किसी व्यक्ति के यौन रुझान का निर्धारण जीन से होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समलैंगिक रुझान के लिए माता-पिता के हार्मोन्स, क्रोमोजोम्स, बहुजैविक प्रभावों, मस्तिष्क की संरचना आदि जिम्मेदार होते हैं। वैज्ञानिकों की नजर में समलैंगिक यौन आकर्षण, व्यवहार और अभिरुचि कोई विकृति नहीं, बल्कि सहज अभिरुचि है।

समलैंगिक यौन रुझान कहीं से भी कोई विकृति नहीं है, बल्कि पूरी तरह सहज और समान्य बात है। इतना ही नहीं, वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि समलैंगिक संबंध रखने वाले संतुष्टिपूर्ण जीवन जी सकते हैं तथा वे अपने संबंधों के प्रति उतने ही ईमानदार हो सकते हैं, जितने अन्य आम लोग। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि उनकी जिंदगी किसी आम आदमी से बदतर होती है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि समलैंगिक संबंध कोई वैकल्पिक यौन संबंध का मामला नहीं है, बल्कि यह जेनेटिक है, जिसे किसी उपाय या परामर्श के जरिये बदला नहीं जा सकता। यदि हम मान लें कि समलैंगिकता का मूल कारण जेनेटिक है, तो हम नैतिकता के पचड़े में पड़ने से तो बच ही सकते हैं, साथ ही इसके लिए समलैंगिक लोगों को दोषी ठहराने की प्रवृति पर भी लगाम लगायी जा सकती है।

आधुनिक शोधों से यह स्थापित हो चुका है कि हमारी यौन अभिरुचि की उत्पत्ति जैविक है यानी समलैंगिकता भी उतनी ही प्राकृतिक है, जितनी विपरीतलिंगी यौनिकता। जैविक रूप से जन्में पुरुष को किसी अन्य पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं किया जा सकता, इसके लिए उसकी जैविक संरचना ही अलग होनी चाहिए। कहने का अर्थ यह कि समलैंगिक यौन संबंध के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमारी स्टीरियोटाइप यानी घिसी-पिटी धारणा पर आधारित है, जिसका न तो कोई वैज्ञानिक आधार है और न सांस्कृतिक। जरूरत है मानसिकता और समझ बदलने की।kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। वह राष्‍ट्रीय सहाराहमार टीवीनई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।