तब अटलजी लखनऊ मध्य से विधानसभा चुनाव भी हार गए थे

राज बहादुर सिंह

: दर्द दिया तो दवा और दुआ भी दी लखनऊ ने : अटल के लिए अत्यंत शुभ सिद्ध हुआ लखनऊ : बना ऐसा रिश्ता जो मर कर भी न टूटे : लखनऊ : जहां से दर्द मिला वहीं से दवा भी मिली और बोनस के तौर पर दुआ तो ऐसी मिली कि सियासत को मानो पंख लग गए। पार्टी भी निखरती गयी और खुद अटल बिहारी वाजपेयी का कद भी उत्तरोत्तर बढ़ता गया और देखते ही देखते वह न केवल भारत के प्रधानमंत्री बने बल्कि उनकी गणना विश्व के नेताओ में की जाने लगी। लखनऊ ने जो तब नहीं दिया था, उससे कहीं ज्यादा और भव्य बाद में दे दिया।

अटल बिहारी का लखनऊ से गजब का रिश्ता रहा। तरुणाई के दिनों में पत्रकार के रूप में लखनऊ में वक्त गुजारन के बाद उन्होंने 1957 के दूसरे लोकसभा चुनाव में यहीं से चुनाव लड़ा, लेकिन भारतीय जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी को कांग्रेस के पुलिन बिहारी बनर्जी ने कड़े मुकाबले में लगभग 12 हजार वोटों से हरा दिया। बहरहाल वाजपेयी बलरामपुर से भी चुनाव लड़े थे और वहां से जीत कर वह 1957 में पहली बार लोकसभा पहुंच गए।

वह फिर 1962 में लखनऊ से चुनाव लड़े और इस बार उनका रास्ता रोक दिया बैरस्टिर बीके धवन ने। सितारे मानो गर्दिश में थे तो वाजपेयी बलरामपुर में भी सुभद्रा जोशी से हार गए। कम लोगों को ही मालूम है कि वाजपेयी लखनऊ मध्य सीट से 1952 में विधान सभा चुनाव भी हार गए थे। लगातार तीन बार मिली मायूसी के बाद वाजपेयी का चुनावी नजरिए से लखनऊ से नजरें फेर लेना लाजिमी भी था और हुआ भी यही।

कोई तीन दशक बाद वाजपेयी ने फिर लखनऊ को आजमाया और इस बार लखनऊ ने न केवल उनका दर्द दूर कर दिया बल्कि कुछ ऐसी दुआ दी कि फिर वाजपेयी ने मुड़ कर नहीं देखा। दरअसल 1991 की सफलता की पटकथा 1989 के लोकसभा चुनाव में दिखायी पड़ गयी थी, जब निर्दलीय चुनाव लड़े बलराज मधोक को 73 हजार वोट मिले और विजयी जनता दल के मान्धाता सिंह को 1.1 लाख और उपविजेता कांग्रेस के दाऊजी गुप्ता को 95 हजार वोट मिले।

बहरहाल 1991 के बाद 1996, 1998, 1999 और 2004 में भी लखनऊ ने वाजपेयी को विजयी बनाया। इस दौरान राज बब्बर, मुजफ्फर अली, डा. कर्ण सिंह, राम जेठमलानी जैसे नामचीन लोगों ने उनका रास्ता रोकने की कोशिश की, लेकिन वाजपेयी कहां रुकने वाले थे। पहली बार लखनऊ से चुने जाने के बाद वह 1991 से अगले पांच साल तक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे जो उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था।

इसे भाग्य कहें या तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की दूरदर्शिता या मजबूरी, जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को कई मौकों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भेजा। दरअसल उस समय केंद्र में कैबिनेट स्तर का विदेश मंत्री था नहीं, विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद ऐसे मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिहाज से कनिष्ठ पड़ते थे और देश की बात होने पर वाजपेयी ने ऐसे दायित्व को निभाने के लिए कभी दलगत राजनीति के आधार पर अनिच्छा नहीं व्यक्त की।

लखनऊ की दुआओं ने और असर दिखाया। वाजपेयी पहले 13 दिन, फिर 13 महीने और फिर पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे। लखनऊ भी उन सौभाग्यशाली संसदीय क्षेत्रों में शामिल हो गया जिसका चुना हुआ प्रतिनिधि प्रधानमंत्री बना। अलग-अलग कारणों से उन्होंने लखनऊ के साथ-साथ कभी गांधीनगर तो कभी विदिशा से भी चुनाव लड़ा, लेकिन सीट लखनऊ की ही बरकरार रखी।

जाहिर है कि लखनऊ से सांसद चुना जाना स्वयं वाजपेयी के साथ-साथ भाजपा के लिए भी अत्यंत शुभ सिद्घ हुआ। दोनों के लिए यह दौर उत्थान का रहा। अंतिम बार वह 2004 में लखनऊ से लोकसभा के लिए चुने गए और फिर स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट आने के कारण वह चुनावी राजनीति से अलग हो गए, लेकिन न उनके दिल से लखनऊ और न लखनऊ वालों के दिल से वह अलग हो सके। यह एक ऐसा अटूट रिश्ता था जो मर कर भी नहीं टूटने वाला।rbs

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासत, फिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.