हार गई कांग्रेस पहला राउंड, प्रणब संघ के संग

प्रणब

राज बहादुर सिंह

बात अगर सियासी बढ़त की थी तो प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय जाने भर से ही कांग्रेस पहला राउंड हार गई। क्या कहा क्या समझा गया इस पर बहस होती रहेगी लेकिन प्रणब दा को जाने से रोकने की कांग्रेस की कोशिश उसकी बेचैनी को दर्शाता था और यहीं पर उस की हार हो गयी।

संघ के कार्यक्रम में यूं तो हर ऐरे गैरे को बुलाया नहीं जाता। और अगर संघ अपने किसी धुर विरोधी को बुलाए और वह आए तो इस के लिए दोनों की प्रशंसा की जानी चाहिए। प्रणब दा ने जो कुछ कहा वैसा ही कुछ अपेक्षित भी था। उनका संघ संस्थापक को श्रद्धांजलि देने जाना और उन्हें भारत माता का अमर सपूत कहना कथित बुद्धिजीवियों और कथित सेक्युलरों के लिए झटका था।

निजी तौर पर मैं प्रणब दा का प्रशंसक नहीं रहा और इसके कारणों की चर्चा का इस विषयवस्तु से कोई मतलब नहीं है। लोगों की जानकारी के लिए बता दूं कि राजीव गांधी ने 1986 में प्रणब दा को कांग्रेस से निकाल दिया था। वजह चापलूस थे जिन्होंने राजीव को समझा दिया था कि वह पीएम बनने की इच्छा रखते हैं। यह आशंका सही हो सकती थी। ऐसी इच्छा गुलाम के अलावा किसी भी आजादाना ख्याल के शख्स की हो सकती है।

खैर कांग्रेस से निकाले जाने के बाद प्रणब दा ने अपनी पार्टी बनाई लेकिन कुछ खास कामयाबी नहीं मिली और फिर राजीव गांधी से उनका 1989 में पैच अप हो गया और वह कांग्रेस में लौट आए। तब से वह कांग्रेस में बने रहे। उनकी उपेक्षा कर जब सरदारजी को पीएम बनाया गया तो उनकी कैबिनेट में प्रणब दा नहीं रहना चाहते थे लेकिन सोनिया गांधी की मनुहार पर तैयार हुए और बाद में उन्हें राष्ट्रपति बनाकर कांग्रेस ने सरकार का न सही प्रोटोकाल में उन्हें सुपीरियर कर दिया।

अब लौटते हैं मौजूदा संदर्भों पर। प्रणब दा ने एक मैसेज तो सरदारजी को दिया। बताया कि पॉलिटिशियन और नौकरपेशा में क्या फर्क होता है। उन्हें पद से हटे अभी बनुश्किल एक साल ही हुआ है लेकिन वह सुर्खियों में आए वह भी एक ऐतिहासिक दस्तक के साथ। सरदारजी को पद छोड़े चार साल से ज्यादा हो गए लेकिन अभी भी चाभी भरे खिलौने की तरह मां-बेटे के पीछे चलते रहते हैं। पता नहीं किस उम्मीद में। किस आकांक्षा में।

एक परसेंट वोट न पाने वाली पार्टियां छाती पीट रही हैं। प्रणब दा की बेटी के बारे में क्या कहें ? कोई जानता भी न उन्हें अगर वह प्रणब दा की बेटी न होतीं। बहरहाल यही बोलने की आज़ादी है। प्रणब दा ने इस आज़ादी का उपयोग राष्ट्रवादी और सौहार्द के लिए संकल्पित आरएसएस जैसे संगठन के मंच से अपनी बात कहने के लिए किया। इस साहस और निर्भीकता के लिए प्रणब दा प्रशंसा के पात्र हैं।

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासत, फिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.