…और 12 जून के इस फैसले ने पूरे भारत को हिला दिया था

संसद

राज बहादुर सिंह

: न्याय की विजय का महापर्व है 12 जून : जय जय जगमोहन की : लखनऊ : आज 12 जून है। इस तारीख का विशेष और ऐतिहासिक महत्व है। एक ओर जहां इस तारीख ने देशवासियों का विश्वास देश की न्यायिक व्यवस्था के प्रति मजबूत किया, वहीं इस के नतीजे में सत्ता के मद और लोभ में चूर शख्सियत ने लोकतंत्र को कुचल देने जैसा शर्मनाक और अतिवादी कदम उठा लिया।

जी हां। आज हम सर झुकाते हैं जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के समक्ष जिन्होंने 12 जून 1975 को न्याय के प्रति विश्वास को और गहरा करते हुए तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करते हुए रद कर दिया था। उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हुए कुर्सी छोड़ कर अदालती लड़ाई लड़ने के बजाय कुर्सी के मोहपाश में बंधी घबराई सामंतवादी सोच की इंदिरा ने वो किया, जिस ने भारत को पूरी दुनिया में लज्जित कर दिया।

इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर देश के लोकतंत्र को कलंकित कर एक काला अध्याय जोड़ दिया और फिर आगे जो कुछ हुआ सब इतिहास में दर्ज है। लोकतंत्र के प्रति किए गए इस कुकृत्य के लिए कांग्रेस को रोज सुबह देश से क्षमा मांगनी चाहिए, लेकिन विडंबना है कि इसका स्वनाम धन्य नेतृत्व रोज लोकतंत्र बचाने का प्रलाप करता है। मतलब हरण करने वाले वरण करने का ढोंग कर रहे हैं।

और तो और जो नेता इमरजेंसी के खिलाफ लड़े। उत्पीड़न सहा। यातनाएं सहीं। उनमें से भी कई नेता कांग्रेस के मूढ़ नेतृत्व के साथ गलबहियां कर रहे हैं। पता नहीं किस स्वार्थ, भय अथवा लोभ ने उनकी मनोदशा को ऐसी स्थिति में ला दिया है। लोकतंत्र तो अपनी रफ्तार से सुचारू और सुरुचिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ता जा रहा है और जड़ हो चुका एक राजनीतिक वर्ग लोकतंत्र की आड़ में अपने स्वार्थों को बचाने की ऐसी अनैतिक लड़ाई लड़ रहा है, जो लगभग हारी जा चुकी है। बहरहाल नमन जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा को जो आज हमारे बीच नहीं हैं।

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.