हॉकी नहीं या हॉकी का कोहिनूर भारत रत्न लायक नहीं

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राज बहादुर सिंह

: सरकार को बतानी चाहिए दद्दा की अनदेखी की वजह : फिर हुई मेजर ध्यान चंद की उपेक्षा : भारत रत्न हो या कोई और पुरस्कार। जिसे भी ठीक समझा जाता है उसे दिया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दलीय सरकारों का पुरस्कार के लिए व्यक्ति के चयन के प्रति रवैया तनाम वजहों से अलग अलग होता है। बहरहाल हैरत होती है इस बात पर कि साल दर साल गुजरते गए। सरकार किसी की रही हो। सभी ने पुरजोर मांग के बावजूद हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद दद्दा को भारत रत्न के लायक नहीं समझा। सभी सरकारें इस मामले में एक ही थैली की चट्टी बत्ती साबित हुईं।

आखिर भारत सरकार को यह बताना चाहिए कि क्या वह हॉकी के खेल को इस लायक नहीं समझती कि उसके कितने भी या यूं कहें कि महानतम खिलाड़ी को भारत रत्न दिया जाए। कुछ साल पहले सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने के साथ खेल की दुनिया को भी भारत रत्न के दायरे में ले लिया गया लेकिन मेजर ध्यान चंद को इससे महरूम रखा गया।

किसी को कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। भारत रत्न पुरस्कार नहीं मिलेगा तो मेजर ध्यानचंद की महानता कम नहीं होगी। बर्लिन में प्रशंसा और आश्चर्य में डूबी हिटलर की आंखों ने हॉकी के कोहिनूर को जिस तरह देखा और फिर अपने देश से खेलने का प्रस्ताव दिया वह शायद किसी भी पुरस्कार से बड़ी बात थी।

भारत रत्न पाने वालों की तादाद भी बढ़ती जा रही है और वक्त के बढ़ते पहिए के साथ ऐसा होना लाजिमी भी है लेकिन जैसे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जनता के धन से अपना वेतन भत्ता बढ़ाने के लिए जबरदस्त ढंग से एकमत हो जाते हैं वैसे ही अब तक कि सभी सरकारें मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने के मामले में एक मत रही हैं।

क्या कांग्रेस सरकार कभी नानाजी देशमुख का चयन करती भारत रत्न के लिए या भाजपा सरकार राजीव गांधी का करती ? इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा लेकिन दद्दा को रिजेक्ट करने में विभिन्न सरकारों का समान व्यवहार निंदनीय है। इसकी जितनी भर्त्सना की जाय कम है। और इसका कारण न जान पाना और कष्टप्रद है।

ऐसा नहीं है कि भारत रत्न पुरस्कार के लिए चयन के मामले में सदैव मेरिट का ही ख्याल रखा गया। अभी कई ऐसे नाम लिए जा सकते हैं और इस बात के समर्थन में कई तर्क दिए जा सकते हैं कि अमुक व्यक्ति इस सम्मान का हकदार नहीं था। समय समय पर लोगों ने अपनी नाराजगी जाहिर भी की। मुझे याद है कि जब पंडित भीमसेन जोशी को इस सम्मान के लिए चयनित किया गया तो पंडित जसराज ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी क्योंकि वह स्वयम को जोशी से किसी मामले में कमतर नहीं मानते थे।

चयनित होने या न होने के ढेरों उदाहरण हैं। बहरहाल मेजर ध्यानचंद को नजरअंदाज करने के सरकारों के फैसलों को नजरअंदाज कर पाना मुश्किल है। आखिर देश को यह जानने का हक़ है कि किस कारण हर सरकार उन्हें अनुपयुक्त पाती आयी है भारत रत्न के लिए। शायद कारण जानने के बाद देश खुद तय कर लेगा कि सरकारों का फैसला कितना जायज या नाजायज था।

rbs

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासत, फिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.