पाकिस्तान में इमरान की ताजपोशी के मायने

राज बहादुर सिंह

: मगर नाटक पुराना चल रहा है : किसी भी स्वस्थ, सभ्य समाज के लिए इंसाफ एक बेहद जरूरी और अपरिहार्य तत्व और जरूरत है। तकरीबन 22 सालोँ की कड़ी मेहनत के बाद इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के साथ इंसाफ हुआ है। यह बहस का मुद्दा है कि क्या इस इंसाफ को सुनिश्चित करने में पाक सेना और आईएसआई की भी भूमिका है ? और है तो किस हद तक ? इस पर बहस हो सकती है लेकिन इस पर बहस नहीं हो सकती कि दोनों की भूमिका है तो जरूर।

जैसे संकेत हैं और खुद इमरान खान ने आगे आकर जिस तरह डिजगनेट पीएम की तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस की है उस को देखते हुए उनका पड़ोसी और बदतरीन दुश्मन होने की पूरी क्वालीफिकेशन रखने वाले पाक का अगला पीएम बनना तय लगता है। और साथ ही इमरान खान की आज की भाषा और भाव से यह भी तय है कि वह पिंजरे के तोते से अलग कुछ भी नहीं है। सेना जितनी चाभी भरेगी फ़ास्ट बॉलर उतनी ही रफ्तार से गेंद करेगा।

इमरान खान ने आज भारतीय सेना को मानवाधिकार हनन के लिए दोषी ठहरा दिया। लफ्फाजी के तहत आप का एक कदम तो हमारा दो कदम जैसा जुमला भी छोड़ दिया। चीन से दोस्ती मजबूत करने ही नहीं बल्कि माईबाप जैसा दर्जा भी दिया। अमेरिका के लिए सर्द भाषा और बराबरी की बात करना साफ जाहिर करता है कि क्रिकेट कप्तान पाक का कप्तान नहीं है और असली कप्तान नॉन प्लेइंग प्लेयर (आर्मी और आईएसआई) ही हैं।

पाकिस्तान का अमेरिका से बराबरी की बात करना एक चुटकुले से ज्यादा मायने नहीं रखता। एक दाता है और दूसरा भिखारी जिसे अब भीख मिलने में दिक्कत पेश आने लगी है और वह कटोरा लेकर अमेरिका के चीन और रूस जैसे दुश्मनों की ओर ताक रहा है। बैलेंस करने के लिए फरमा दिया कि सऊदी अरब और ईरान दोनों से ही बेहतर सम्बन्ध रखने हैं। पाक बॉर्डर पर ईरान के साथ हालात क्या हैं, रोज सामने आता है। सेना के लाडले होना एक बात है और आवाम के लाडले होना दूसरी बात है।

तहरीक-ए-इंसाफ को अब मुल्क के साथ और आवाम के साथ इंसाफ करना होगा। इमरान खान ने भारतीय मीडिया की भले ही इस बात के लिए आलोचना की है कि उसने उन्हें विलेन पेंट किया लेकिन क्या यह सच नहीं है कि तालिबान से लेकर दीगर चरमपंथियों के लिए इमरान ने समय समय पर खुलकर हमदर्दी जाहिर की है।भूलना नहीं चाहिए कि मुशर्रफ ने जब लोकतंत्र का गला घोंटा था तो इमरान ने सेना की जमकर हिमायत की थी।

जाहिर है कि इंसाफ के नाम वाली पार्टी सत्ता में आ तो जरूर गयी है लेकिन ये किसी और के साथ तो छोड़िए खुद अपनी अन्तरात्मा के साथ भी न्याय कर पाएगी इसकी सम्भावना नगण्य है। पीएम बनने जा रहा शख्स अपने देश द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद पर रस्मी तौर पर भी न बोल सका तो उसकी हैसियत का अंदाज़ा बखूबी लगाया जा सकता है। इंसाफ के नाम पर नाइंसाफी देखने को तैयार रहिए क्योंकि-

नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है।

rbsराज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.