चाणक्‍यों के दंभ पर भारी पड़े भाजपा कार्यकर्ता, ये जख्‍म बन सकता है नासूर

कार्यकर्ता

: सहानुभूति की लहर भी नहीं आई काम, नाराज कार्यकर्ताओं ने सिखाया सबक : लखनऊ। कैराना और नूरपूर में भाजपा नहीं हारी है बल्कि दंभ हारा है। वह दंभ, जिसके बारे में कहा जाता था कि भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं प्रदेश संगठन महामंत्री ऐसे चाणक्‍य हैं, जिनकी रणनीति किसी भी स्थिति में विपक्षियों को धराशायी कर सकती है। भाजपा को संयुक्‍त विपक्ष ने बल्कि उनके अपने कार्यकर्ताओं ने हराया है, जिन्‍हें भाजपा का शीर्ष नेतृत्‍व सरकार बनने के बाद भूल गया था। भाजपा को किसी नेता ने नहीं बल्कि उस जनता ने हराया है, जिसे भाजपा मूर्ख समझ बैठी थी।

कैराना और नूरपुर में लहर पर कहर इस कदर हावी हो गया कि सहानुभूति भी मरहम नहीं बन सकी। फूलपुर और गोरखपुर में मिले जख्‍य कैराना और नूरपुर ने और गहरे कर दिए हैं, जिसका असर वर्ष 2019 के आम चुनाव में भी देखने को मिल सकता है। अब शीर्ष नेतृत्‍व और भाजपा के रणनीतिकारों के मन में यह डर जरूर बैठ गया होगा कि कहीं यह जख्‍म नासूर ना बन जाए। वैसे भी, संयुक्‍त विपक्ष को भाजपा को हराने का कम से कम एक फार्मूला तो मिल ही गया है।

कैराना में भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह को पिता के मौत की सहानुभूति तक नहीं जिता सकी। मृगांका सिंह 50 हजार से भी ज्यादा वोटों से हार गईं। यह सीट उनके पिता और इस सीट से सांसद बने हुकुम सिंह की असमायिक मौत के बाद खाली हुई थी। मृगांका को संयुक्‍त विपक्ष के सहयोग से रालोद के टिकट पर उतरीं तबस्‍सुम हसन ने पराजित किया। इस हार ने भाजपा के लिए एक खतरा यह भी पैदा किया है कि पश्चिम बेल्‍ट में मजबूत प्रभाव रखने वाला जाट वोटर अजित सिंह के पाले में वापस लौट सकता है। यह स्थिति भाजपा को पश्चिम में हाशिए पर पहुंचा सकता है।

नूरपुर में भी भाजपा विधायक लोकेंद्र सिंह की असामयिक और दुखद मौत का लाभ नहीं मिला। उनकी पत्‍नी अवनि सिंह अपने पति की सीट पर लगभग छह हजार वोटों से पराजित हो गईं। कैराना एवं नूरपुर की इस हार-जीत का असर तकनी‍की रूप से भाजपा की सरकारों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन इसके सियासी निहितार्थ दूर तक असर करने वाले हैं। भाजपा की तरफ से भले ही सफाई दी जा रही हो कि लंबी कूद के लिए दो कदम पीछे खिंचने होते हैं, लेकिन उसे पता है कि यह कदम जनता ने खिंच दिए हैं और संयुक्‍त विपक्ष ने पीछे होने को मजबूर कर दिया है।