प्रशासनिक अधिकारी जन-गण-मन के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखे : हृदय नारायण दीक्षित

लखनऊ। प्रशासनिक सेवाओं में बहुत ही प्रतिभा सम्पन्न लोग चयनित होकर आते है। गांव-देहात में रहने वाले लोगों के मन में इन सेवाओं के प्रति ईश्वर से भी ज्यादा सम्मान का भाव रहता है। उनके मन में यह धारणा गहरे से बैठी हुई है कि यदि जिले में जिलाधिकारी से मिलेंगे, तो उनकी समस्याओं का समाधान अवश्य होगा। जन-गण-मन में प्रशासनिक सेवाओं के प्रति इस भाव को संजोए रखने की आवश्यकता है। यह बात श्री हृदय नारायण दीक्षित, अध्यक्ष, विधान सभा उत्तर प्रदेश ने आज विधान भवन स्थित टण्डन हॉल में प्रशासनिक सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को सम्बोधित करते हुए कहा।

उन्होंने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि देश एवं प्रदेश के निर्माण के लिए नई-नई चुनौतियां आई है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री ने गरीबों, वंचितों-दलितों के उत्थान एवं विकास के लिए और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए बहुत ही महत्वाकांक्षी योजनाओं का सूत्रपात किया है। मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों ने महत्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन में उत्कृष्ट कार्य करके प्रदेश को एक उन्नत प्रदेश बनाने की दिशा में कार्य भी कर रहे है। इसमें उनकी और भी प्रभावी भूमिका की आवश्यकता है।

श्री दीक्षित ने कहा कि जन प्रतिनिधि विधायक चुने जाने के बाद विधान सभा में सदस्य के रूप में नीति व विधान बनाने का कार्य करते है। परन्तु नीति एवं विधान का क्रियान्वयन करने का कार्य प्रशासनिक अधिकारियों का है। इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी अतिमहत्वपूर्ण हो जाती है। श्री दीक्षित ने कहा कि अक्सर यह देखने को मिलता है कि प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और राजनीतिज्ञों के बीच अच्छे सम्बन्ध नहीं होते, जबकि जन प्रतिनिधि संवैधानिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। प्रशासनिक अधिकारियों को जन प्रतिनिधियों के साथ उनके कर्तव्य निर्वहन के बीच मधुर एवं सरल संबंध स्थापित करने चाहिए। दोनों संस्थाएं महत्वपूर्ण है। उनके बीच संवाद रसपूर्ण होना चाहिए।

श्री दीक्षित ने विधायिका, कार्यपालिका की कार्यप्रणाली की चर्चा करते हुए कहा कि विधायिका का मुख्य कार्य विधान का निर्माण एवं कार्यपालिका को जवाबदेह बनाना है। सदन में प्रश्नों एवं अन्य सूचनाओं के उत्तर मंत्रिपरिषद के सदस्यों द्वारा दिए जाते है। इस सूचना को देने का कार्य प्रशासनिक तंत्र का ही होता है। अपनी बुद्धि, मेधा, प्रज्ञा एवं क्षमता का उपयोग कर सही सूचनाओं को देकर विधायिका को कार्यपालिका के प्रति जवाबदेह बनाने में बहुत बड़ा मददगार साबित हो सकता है।

उन्होंने इस अवसर पर बोलते हुये कहा कि ब्रिटिश काल के समय में मैक्समूलर जैसे प्रसिद्ध ज्ञानवेत्ता एवं दार्शनिक हुए थे। उनके द्वारा भारत में आने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को यहां के दर्शन, ज्ञान एवं संस्कृति से सीख लेकर राष्ट्र निर्माण की तरफ उन्मुख होने का संदेश दिया गया था। उन्होंने कहा कि वर्तमान भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को भी अंग्रेजों के ज्ञान, दर्शन एवं संस्कृति से प्रेरणा लेकर अपने कर्तव्यबोध से जनसेवाओं के प्रति संकल्पबद्ध एवं संवेदनशील होना चाहिए।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान के अपर निदेशक श्री संजय कुमार सिंह यादव, सत्र-समन्वयक सुश्री संध्या भदौरिया व उ0प्र0 विधान सभा के प्रमुख सचिव श्री प्रदीप कुमार दुबे ने प्रशिक्षु अधिकारियों को विधायिका व कार्यपालिका के सम्बन्धों के बारे में प्रकाश डाला। इस अवसर पर सभी प्रशासनिक अधिकारियों को अध्यक्ष, विधान सभा द्वारा लिखित ‘‘भगवद्गीता रि-विजटेड‘‘ अंग्रेजी प्रति व विधान सभा की पत्रिका ‘‘संसदीय दीपिका‘‘ की एक-एक प्रति भी प्रदान की गयी।