वाह रे कैशलेस : जनता कैश से लेस, सरकार की ऐश ही ऐश

डाकघर

अरविंद कुमार चौधरी 

: डाकघर पीएम की मंशा पर लगा रहे दाग : इलाहाबाद : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब नोटबंदी का फैसला लिया था तब किसी को अंदाजा नहीं था कि कैश की ऐसी किल्‍लत पैदा हो जाएगी। जनता की परेशानियों का अंदाज लगने के बाद प्रधानमंत्री ने कैशलेस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का प्रयास शुरू किया। प्रधानमंत्री की सोच थी कि इससे कैश की परेशानी कम होगी दूसरे लेन-देन में पारदर्शिता आने के साथ भ्रष्‍टाचार में कमी आएगी।  

आमजन ने पीएम के इस निर्णय का साथ दिया और कैशलेस लेन-देन शुरू कर दिया, लेकिन सरकारी तंत्र इसे असफल करने में जुटा हुआ है। जनता सहयोग कर रही है। निजी संस्थान भी कैशलेस प्रणाली को  बढ़ावा देने में प्रयासरत हैं। बड़े बड़े शाँपिंग माल के साथ-साथ छोटे दुकानदारों  ने भी कैशलेस की सुविधा ग्राहकों को दे रहे हैं, लेकिन हर अभियान की तरह सुस्त सरकारी तंत्र और मनमानी करने वाले अफसरों के चलते इस मामले में भी जनता मूर्ख बनती ही नजर आ रही है।

सरकार के अपने तंत्र में ऐसे बहुत से कार्यालय एव संस्थान हैं, जहाँ प्रतिदिन लाखों रूपये का लेन-देन नकद में ही होता है। उदाहरण के तौर पर  इलाहाबाद का प्रधान ड़ाकघर, यहाँ  भी कैशलेस सुविधा उपलब्ध नहीं है। यहाँ  प्रतिदिन हजारों लोग  ग्राहक के रूप आते हैं। किसी को किसान विकास पत्र खरीदना होता है तो किसी को आरडी करानी होती है। किसी को डाक टिकट, पोस्टल आर्डर खरीदना होता तो कोई आरडी जमा करने आता है। काफी संख्या में लोग यहाँ रजिस्टर्ड ड़ाक एवं स्पीड पोस्ट करने के लिए आते हैं।

इसके अलावा भी बहुत सी सरकारी योजनाएँ ऐसी हैं, जिनका संचालन डाकघरों से ही होता है। ऐसी ही एक योजना है सुकन्या। प्रधानमंत्री नरेन्द्र के राष्ट्रीय सत्ता में आने के बाद लोगों ने बेटियों के लिए इस योजना में अच्छा निवेश किया है। सिर्फ इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में  डाकघरों की आय में इजाफा भी हो रहा है, मगर एक विडम्बना यह भी है कि जहाँ एक ओर भारतीय जनता मोदीजी के आह्वान पर अपनी परेशानियों को नजर अंदाज करते हुए कैशलेस सिस्टम को बढ़ावा देने में सरकार का सहयोग कर रही है, वहीं डाक घर जैसे बड़े संस्थान अपने यहाँ कैस लेस सुविधा उपलब्ध कराने में या तो नाकाम हैं या वह प्रधानमंत्री मोदी के सपने को ठेंगा दिखा रहे हैं।

डाकघर में प्रतिदिन लाखों का लेन-देन होता है, इसके बावजूद डाकघर प्रशासन प्रधानमंत्री की मंशा के विपरीत कैशलेस की दिशा में कोई कदम नहीं उठा रहा है। इस तरह सरकार के अपने ही विभाग सरकारी मंशा के विपरीत काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसमें डाक घर भी अपना पूर्ण योगदान दे रहे हैं। सरकार निजी संस्थानों पर तो कैशलेस सिस्‍टम अपनाने का जोर दे रही है लेकिन अपने सरकारी तंत्र को कैशलेस करने से पीछे क्यों है? यह मसला समझ नहीं आता हैं?

क्या इसके पीछे सरकार की नीति कमजोर है? या सरकारी संस्थान कामचोर हो चुके हैं? ओर क्या सरकारी नीतियाँ एवं आदेश सिर्फ जनता और निजी संस्थानों के लिए ही हैं? जनता तो सरकार को सहयोग कर रही है, मगर जनता को कैशलेस सिस्टम में सरकार से सहयोग के नाम पर कुछ नहीं मिला रहा बल्कि जनता मूक दर्शक बनकर खुद का शोषण होते देखने को मजबूर है। बैंक अपनी मनमानी कर रहे हैं। एटीएम खाली हो जाते हैं। कहीं कार्ड से पैमेंट पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है तो कहीं पेटीएम ओर भीम जैसे एप पैसे को अटका कर बैठ जाते हैं, तो कहीं कार्ड से न्यूनतम भुगतान की सीमा तय कर दी गयी है।

सरकारी कार्यालयों एवं संस्थानों का तो हाल यह है कि पहले तो कैशलेस की सुविधा है ही नहीं। और कहीं अपवाद के तौर पर मिल जाए तो मशीन को बंद करके पीछे रखे रहते हैं। कोई जागरूक ग्राहक चला जाए तो मशीन चालू की जाती है, वो भी सरकार और मोदी को कोसते हुए। वाह रे मोदीजी का कैशलेस, जनता कैशलेस सरकार की ऐश ही ऐश।arvind

अरविंद कुमार चौधरी स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. कई पत्र-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं.