अगर केजरीवाल की राजनीति सही है तो उन्हें ‘झेलना’ चाहिए

संजय कुमार सिंह

नई दिल्‍ली : इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के दो मुख्य राजनीतिक दलों और सत्ता में रह चुके क्षेत्रीय दलों की तुलना में आम आदमी पार्टी की राजनीति अलग है। अगर यह शत प्रतिशत सही न हो तो भी देश में चल रही और की जा रही आम राजनीति से काफी अलग है। कहना चाहिए बेहतर है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने जो काम किए हैं वो आपकी नजर में अपर्याप्त या बेमतलब हो सकते हैं, पर आम आदमी की भलाई के लिए तो हैं ही। इनमें स्कूलों का स्तर सुधरना और सरकारी अस्पतालों में इलाज बेहतर होना दो बड़ी बातें हैं। दिल्ली सरकार में इसके लिए बजट बढ़ाया गया है वह अपनी जगह है ही।

दूसरी ओर, आप अरविन्द केजरीवाल या उनकी सरकार की कार्यशैली से असहमत हो सकते हैं, पर इसमें कोई दो राय नहीं है कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली सरकार के काम काज में अड़ंगे लगाती है। उसे काम नहीं करने देती है और परेशान करती है। आप यह भी कह सकते हैं कि अरविन्द केजरीवाल इसपर शोर ज्यादा मचाते हैं, पर यह नहीं कह सकते हैं कि ऐसा कुछ है ही नहीं।

अरविन्द केजरीवाल भी मनुष्य हैं, गलतियां उनसे भी हो सकती है। मुद्दा नीयत होना चाहिए। अगर आप नीयत देखें तो कौन ज्यादा ठीक लगता है? जो आदर्श राजनीतिज्ञ होने का प्रचार करके आया था या जो आम आदमी होने का दावा कर रहा था?

मेरा मानना है कि केंद्र सरकार के तमाम विरोध के बावजूद आम आदमी पार्टी की सरकार अच्छा काम कर रही है और भाजपा की तरह दबाव में नहीं है। वह ना विरोधियों को परेशान कर रही है ना चुप रहने के लिए मजबूर कर रही है। ना उनके पीछे अपना दिमाग खराब कर रही है। ना प्रचार पर पैसे उड़ा रही है। जहां तक आत्मविश्वास की बात है वह भी कम नहीं है।

तमाम तरह से परेशान किए जाने और सच्चे झूठे आरोप लगने के बावजूद राज्य सभा की सीटों के मामले में उसने वही किया जो उसे करना था। ना वह किसी के झासें में आई ना किसी को अनुचित लाभ उठाने दिया। इन तमाम खासियतों के बावजूद मैं महसूस करता हूं कि आम लोग और इनमें निष्पक्ष कहे जा सकने वाले पत्रकार शामिल हैं, आम आदमी पार्टी का मजाक उड़ाते हैं।

ताजा मामला आशुतोष और फिर आशीष खेतान के पार्टी छोड़ने का है। मैं नहीं जानता वास्तविक कारण क्या है और इन लोगों ने सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। फिर भी बहुत सारे लोग इसके लिए अरविन्द केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हो सकता है ये लोग अरविन्द केजरीवाल की कार्यशैली और व्यवहार से दुखी होकर ही अलग हुए हों पर मुद्दा तो यह है कि अरविन्द केजरीवाल अगर सही काम कर रहे हैं तो उनका साथ दिया जाना चाहिए।

अगर अरविन्द अलग किस्म की राजनीति कर रहे हैं, उसकी जरूरत है तो उनका साथ दिए जाने की जरूरत है। अगर वह आपके अनुकूल नहीं है तो उसे अनुकूल बनाने की कोशिश कीजिए। अरविन्द को छोड़कर तो आप उन्हें कमजोर करेंगे या भाजपा अथवा कांग्रेस में चले गए तो उसे मजबूत करेंगे। यह कम नहीं है कि अरविन्द केजरीवाल अन्ना हजारे के दूसरे शिष्यों की तरह पहले ही मलाई खाने नहीं चले गए।

इसमें कोई शक नहीं है कि देश की राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है। वोट की राजनीति अचानक बदलना बहुत मुश्किल है। ऐसे में अरविन्द केजरीवाल अगर कुछ कर रहे हैं, कर पा रहे हैं तो उनका साथ देने की जरूरत है। हो सकता है राजनीति करने की उनकी शैली अलग हो पर देश सेवा तो हो रही है।

भ्रष्ट सरकार के तहत अलग-अलग अपने ढंग से देश सेवा करना और सरकार में रहकर देशसेवा करने में फर्क है। कोशिश यह होनी चाहिए कि सरकार में रहकर अच्छे काम किए जाएं। यह मुश्किल है और हो सकता है इस मामले में अरविन्द की राजनीति आपको पसंद न हो, पर अंतिम परिणाम ठीक है, लक्ष्य की ओर तेज गति से बढ़ना संभव है तो मेरा ख्याल है कि अरविन्द का साथ देना चाहिए।

अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम चाहे जैसी हो, भ्रष्ट या बेईमान नहीं है। यह मैं कोई निजी अनुभव से नहीं कह रहा, पर जिस ढंग से केंद्र सरकार परेशान करती रही है, उसमें अगर कुछ भी गलत होता तो अरविन्द अभी तक बच नहीं पाते। बचे हैं तो इसीलिए कि ईमानदार हैं। पार्टी के दूसरे लोगों के खिलाफ जो मामले लिखवाए गए उनकी सत्यता से भी यह साबित होता है कि भाजपा सरकार आप नेताओं को येनकेन प्रकारण परेशान करने में लगी हुई है।

इन स्थितियों में अगर अरविन्द का व्यवहार ठीक नहीं है तो दूसरे नेता का व्यवहार अच्छा होगा, इसकी कौन सी गारंटी है। आम राजनीतिक दल तो चाहते ही हैं कि ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवार चुनाव मैदान में हों ताकि जीत काम से कम जोड़ तोड़ से ज्यादा सुनिश्चित हो। अरविन्द का विरोध करके उनसे अलग होकर असल में यही किया जा रहा है।

वरिष्‍ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से साभार. श्री सिंह जनसत्‍ता समेत कई संस्‍थानों को सेवा दे चुके हैं. फिलहाल अपने वेंचर अनुवाद का संचालन कर रहे हैं.