गांधी के इस प्रस्‍ताव पर माउंटबेटेन स्‍तब्‍ध रह गए थे और जिन्‍ना भौचक्‍क

कुमार नरेन्द्र सिंह

: एक अनावश्यक विवाद : चंद दिनों पहले तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा ने भारत के बंटवारे के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार बता कर एक अनावश्यक विवाद पैदा कर दिया है। दलाई लामा का कहना है कि गांधी जी मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए तैयार थे, लेकिन नेहरू को यह स्वीकार नहीं था, जिसके चलते देश का बंटवारा हुआ। वैसे यह कोई पहली बार नहीं है, जब भारत के बंटवारे के लिए नेहरू को जिम्मेदार बताया जा रहा है।

सच तो यह है कि आजादी के बाद से ही अनेक संगठन और लोग, जिनमें कतिपय देशी-विदेशी विद्वान भी शामिल हैं, बंटवारे का ठिकरा नेहरू के सर पर फोड़ते रहे हैं। यह अलग बात है कि किसी ने भी अंतिम रूप से इसे सिद्ध नहीं किया है। जितने भी तर्क और तथ्य दिए जाते हैं, वे विश्लेषणात्मक और बात से बात निकालने की कवायद ही नजर आते हैं।

दलाई लामा का ताजा बयान इस भोजपुरी कहावत को चरितार्थ करते नजर आता है कि ‘जेकरा खातिर चोरी कइलीं उहे कहे चोरा’ यानी जिसके लिए चोरी की वही अब चोर बता रहा है। आज दलाई लामा की जो हैसियत है, वह मूल रूप से नेहरू की समझदारी औऱ दया का ही प्रतिफल है। बहरहाल, दलाई लामा के बयान को दो स्तरों पर परखने की जरूरत जान पड़ती है – तथ्यात्मक और राजनीति जन्य।

प्रथम नजर में उनका बयान उस राजनीति का हिस्सा नजर आता है, जिसके अंतर्गत नेहरू को एक खलनायक के रूप में तब्दील करने की साजिश भरी कोशिश चल रही है। वैसे आजादी के पहले से ही कतिपय संगठन इस कोशिश में जुटे हुए हैं। संघ परिवार इस कोशिश का प्रथम और प्रबल प्रणेता रहा है। चूंकि पिछले चार साल से देश की सत्ता पर उसी के राजनीतिक फ्रंट यानी भारतीय जनता पार्टी काबिज है, इसलिए शरणार्थी के रूप में रह रहे दलाई लामा को कई कारणों से आज उसकी ज्यादा जरूरत हो सकती है और है भी।

ऐसे में यदि कोई कहता है कि दलाई लामा का ताजा बयान सरकार की सदिच्छा और सहयोग पाने की मंशा से दिया गया है, तो उसे क्योंकर गलत करार दिया जा सकता है। वैसे भी दलाई लामा कोई इतिहासकार नहीं हैं कि उनकी बात को ज्यादा तवज्जो दी जाए। बेहतर होगा कि वह केवल दलाई लामा ही बने रहें।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महात्मा गांधी ने 1 अप्रैल, 1947 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटेन को जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे सुनकर स्वयं माउंटबेटेन भी स्तब्ध रह गए थे। लेकिन साथ में उन्होंने यह शर्त भी जोड़ी थी कि उनकी अगुआई में केवल मुस्लिम लीग सरकार बनाए और उसमें कांग्रेस शामिल नहीं होगी, वह केवल सहयोग करेगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सबसे पहले इस प्रस्ताव को स्वयं जिन्ना ने ही खारिज किया था।

जहां तक नेहरू की बात है, तो उनकी आपत्ति इस बात पर थी कि मुस्लिम लीग देश के सभी मुसलमानों की प्रतिनिधि पार्टी होने का दावा नहीं कर सकती। इतना ही नहीं, लोकतंत्र में बहुसंख्यक लोगों के आग्रह को कैसे नजरअंदाज किया ज सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि कांग्रेस के किसी भी नेता को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था। ऐसे में केवल नेहरू को बंटवारे के लिए जिम्मेदार बताना सच कैसे हो सकता है?

मोहम्मद अली जिन्ना जानते थे कि फौरी तौर पर वह प्रधानमंत्री बन तो सकते हैं, लेकिन वह उनके लिए अपने ही वादे से मुकरने जैसा होता। वह यह भी जानते थे कि यदि वह प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने के लिए तैयार हो भी जाते हैं, तो मुस्लिम लीग उनके इस कदम का समर्थन नहीं करेगी, क्योंकि अब तक जिन्ना लीग को अलग पाकिस्तान का स्वप्न इतना ज्यादा दिखा चुके थे, कि वह भारत में रहने के उनके निर्णय को स्वीकार नहीं करता।

जिन्ना से सहानुभूति रखने वाले यह भी बताते हैं कि उन्होंने मुसलमानों के लिए अधिक रियायत पाने के लिए बंटवारे का शिगूफा छेड़ा था, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य उनकी इस बात की कतई पुष्टि नहीं करते। जिन्ना या उनके किसी नजदीकी व्यक्ति के किसी भी भाषण, पत्र, डायरी या दस्तावेज में इस बात का कोई जिक्र नहीं मिलता कि पाकिस्तान के नाम पर देश के बंटवारे की उनकी मांग केवल शिगूफा था। इसके उलट इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि उनका उद्देश्य मुसलमानों के लिए एक अलग देश का निर्माण करना था।

कुछ विद्वान यह भी बताते हैं कि यदि नेहरू ने 1946 में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने एवं कमजोर केन्द्रीय सरकार गठित करने की मांग मान ली होती, तो बंटवारे को रोका जा सकता था। इस तर्क से दो सवाल उठते हैं। पहला तो यह कि तत्कालीन राष्ट्रीय और भू-राजनीतिक स्थितियों के मद्देनजर केंद्र में एक कमजोर सरकार व्यावहारिक था? दूसरा कि तत्कालीन परिस्थितियों में अधिक स्वात्तता प्रदान करने के बाद क्या देश की अखंडता के लिए खतरे की आशंका नहीं उभरती?

इन दोनों सवालों का उत्तर यही हो सकता है कि ऐसा करना न तो व्यावहारिक था और न वांछनीय। मालूम हो कि इन तमाम निर्णयों में कांग्रेस ही नहीं, गांधी जी भी पूरी तरह नेहरू के साथ थे। जहां तक मुस्लिम लीग की बात है, तो वह शुरू से ही मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की रुपरेखा बनाने में जुटा हुआ था। उसने 1940 में ही कांग्रेस के सामने एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें आजादी के बाद भारत के बंटवारे की योजना बतायी थी।

जहां तक कांग्रेस की बात है, तो यह सत्य है कि उसने मुसलमानों की चिन्ता दूर करने का कभी विशेष प्रयास नहीं किया। यह सर्वविदित है कि कांग्रेस के भीरत भी हिन्दुवादियों का एक सशक्त समूह था, जो मुसलमानों से नफरत करता था। कांग्रेस आंदोलन के मुहावरे और व्यवहार दोनों ही हिन्दू समर्थक परिलक्षित होते रहे। इसे जिन्ना समेत अनेक मुस्लिम नेताओं ने रेखांकित किया है, लेकिन आजादी की आड़ में इस विरोधाभास को समाप्त करने की कोई कोशिश नहीं की गयी।

सच तो यह है कि देश के बंटवारे के लिए मूल रूप से हिन्दुओं और मुसलमानों के अभिजात्य तबके में एक-दूसरे के लिए अविश्वास ही जिम्मेदार था, जिसे मुस्लिम लीग, हिन्दू सभा और अन्य कम्युनल संगठन लगातार बढ़ाते रहे थे। दोनों तबके का अभिजात्य वर्ग अपने-अपने लिए सुरक्षित सत्ता केंद्र की चाहत रखता था। 16 अगस्त, 1946 में जिन्ना द्वारा किए गए डाइरेक्ट एक्शन डे के आह्वान के बाद, जिसमें सिर्फ तीन दोनों के अंदर ही 5000 लोग मारे गए, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच समझौते की सारी गुजाइश जाती रही। अविश्वास और हिंसा से बचने का अब एक ही रास्ता रह गया था और वह था देश का बंटवारा।kumar

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। वह राष्‍ट्रीय सहारा, हमार टीवी, नई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।