कब होगी वापसी 29 जुलाई 1980 की?

राज बहादुर सिंह

: ओलंपिक हॉकी में अर्श से फर्श की दास्तां : यूं तो हर साल 29 जुलाई की तारीख आती है, लेकिन 29 जुलाई 1980 को मॉस्को में जो हुआ वह फिर कब होगा इसका इंतजार अब भी हो रहा है। हर चार साल में मौका आता है लेकिन हम मॉस्को की दास्तां को दोहराने के आस पास भी नहीं पहुंच पाते।

भारत ने 29 जुलाई 1980 को स्पेन को 4-3 से हराकर ओलंपिक हॉकी में गोल्ड मेडल जीता था और भारत की झोली में उसके बाद कभी गोल्ड नहीं आया। मुझे आज भी याद है रेडियो पर कॉमेंट्री सुन रहा था तभी भूकम्प के झटके भी महसूस हुए लेकिन भारत जीता और देश खुशी से झूम उठा था।

वैसे तकनीकी रूप से भारत ने गोल्ड जरूर जीता, लेकिन सही मायने में यह तसल्लीबख्श नहीं था। वजह यह थी कि अमेरिका की अगुवाई में दुनिया के एक बड़े हिस्से ने मॉस्को ओलंपिक का बॉयकॉट किया था, जिसके चलते ऑस्ट्रेलिया, हॉलैंड, जर्मनी (वेस्ट), इंग्लैंड, पाकिस्तान जैसी टीमें इसमें खेली ही नहीं थी।

बहरहाल जीत तो फिर जीत है। एक दौर वह भी था जब भारत ने 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लॉस एंजेल्स, 1936 बर्लिन, 1948 लंदन, 1952 हेलसिंकी और 1956 मेलबर्न मिलाकर लगातार छह ओलंपिक गोल्ड मेडल जीते। पाकिस्तान से 1960 में रोम में शिकस्त मिली, लेकिन 1964 में टोक्यो में पाकिस्तान को हराकर भारत ने फिर गोल्ड पर कब्जा किया।

बस ओलंपिक हॉकी में यहीं तक था भारत का सुनहरा सफर। इंडिया ने 1968 मेक्सिको और 1972 म्यूनिख ओलंपिक में अपने को दौड़ में बनाए रखते हुए कांस्य पदक जीता, लेकिन 1976 के मोंट्रियल ओलंपिक में भारत की शान में बट्टा लगा और उसे सातवें स्थान पर संतोष करना पड़ा। मॉस्को ने तकनीकी तौर पर गोल्ड तो दिया लेकिन बाद के सालों ने साबित किया कि मॉस्को का गोल्ड हालात की देन था सुपीरियर खेल की नहीं।

मॉस्को के बाद 1984 में लॉस एंजेल्स में भारत को पांचवां, 1988 सियोल में छठा, 1992 बार्सिलोना में सातवां, 1996 अटलांटा में आठवां स्थान मिला। इसके बाद 2000 सिडनी और 2004 एथेंस में सातवां स्थान मिला। शर्मनाक हालत तो 2008 बीजिंग ओलिंपिक में पैदा हुए जिसके लिए इंडिया क्वालीफाई ही नहीं कर सका।

इंडिया के लिए शर्मनाक प्रदर्शन का सिलसिला आगे भी जारी रहा और 2012 लंदन में उसे आखिरी (12 वां) पायदान पर रहना पड़ा। रियो डी जेनेरियो के आखिरी ओलंपिक में भी मायूसी ने दामन नहीं छोड़ा और भारत आठवें नंबर पर रहा।

जाहिर है कि ओलंपिक हॉकी में भारत ने एक दौर में जितना शानदार प्रदर्शन किया बीते चार पांच दशकों में उतना ही बदतरीन मुजाहिरा किया। हम अर्श से फर्श पर आ गए। ऐसा नहीं है कि इस दौरान भारत में प्रतिभाओं की कमी रही। एक से एक बढ़िया खिलाड़ी सामने आए। बीच-बीच में चमकदार हॉकी खेलते हुए उम्मीदें भी जगाए रखी। लेकिन जब भी ओलंपिक का मामला आया तो मायूसी हाथ लगी। बहरहाल उम्मीद का दामन तो छोड़ा नहीं जा सकता। और उम्मीद करते हैं कि 29 जुलाई 1980 की वापसी होगी। जरूर होगी।

rbsराज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासतफिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.