कबीर को कैसी श्रद्धांजलि, क्‍या हम इस लायक हैं?

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श्‍वेता जया पांडेय

: समाज को दिखाया आईना : अगर आप कबीर को एक महान शख्सियत बताते हैं और उनकी महान ज़िंदगी से सीख लेने की सलाह देते हैं तो सबसे पहले आपको ये सोचना होगा कि आप कबीर को कितना फॉलो करते हैं? और उनके बताए रास्ते पर कितना चलते हैं?

कबीरदास, हिंदी साहित्य के ऐसे कवि, जो पूरी ज़िंदगी समाज में फैले हुए आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। समाज को कर्म प्रधान बनाने की कोशिश करते रहे। समाज को जगाने की दिशा में काम करते रहे। धर्म, जाति, रंग-रूप, अमीरी-ग़रीबी से ऊपर उठकर जीने की वकालत करते रहे। मंदिर-मस्जिद के कायदे-कानून और ढकोसलों से लेकर नमाज और मूर्ति पूजा पर भी वार किया और इंसानियत को सबसे बड़ी पूजा और मानवता को सबसे बड़ा धर्म बताया।

”कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय।
ता उपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।”

”हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।।”

लेकिन हम आज क्या कर रहे हैं? कांग्रेस-बीजेपी के नाम पर लड़ाई हमारा शग़ल हो गया है। हिंदू-मुस्लिम के नाम पर मतभेद हमारी हॉबी हो गई है। और दलित-ब्राह्मण-राजपूत…फलाना-ढिमकाना के नाम पर भड़कना हमारी रोज़मर्रा की रूटीन। कबीर ने कहा था-

”जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।”

पर हम सुबह उठते ही हम एक-दूसरे को व्हाट्सऐप/मैसेंजर वगैरह पर इतने सारगर्भित मैसेजे भेजते हैं कि अगर उन्हें कभी पूरा पढ़ा जाये तो ऐसा लगता है कि भेजने वाले से बड़ा ज्ञानी कोई है ही नहीं। वो तो साक्षात देव/देवी का रूप है। ज्ञान का भंडार। बड़ा सामाजिक व्यक्ति। प्यार बांटने वाला। एकता का हिमायती। भाईचारा की मिसाल। देश की चिंता करने वाला। इंसानियत पर मर-मिटने वाला। पर एक-दो घंटे बाद उसी शख़्स का एक ऐसा मैसेज आता है, जो आपकी सोच को अर्श से फर्श पर लाकर पटक देता है।

मैसेज में लिखा होता है- “इस वीडियो को ध्यान से देखिये…कैसे ये शख़्स एक हिंदू भाई को पीट रहा है। या कैसे ये हमारी एक मुस्लिम बहन को छेड़ रहा है। इसके तो टुकड़े-टुकड़े कर के कुत्तों को डाल देना चाहिए। क्या आप लोगों का खून नहीं खौल रहा? इस वीडियो को ज़्यादा से ज़्यादा हिंदू/मुस्लिम भाइयों तक पहुंचाइये और बदला लीजिये। आपको प्रभु राम की सौगंध/आपको खुदा का वास्ता!”

ओ माइ गॉड…क्या है ये? लड़ाने-मारने-काटने की सलाह! जुनूनी अंदाज़ में, वो भी उस वीडियो के लिए जो आपके देश का ही नहीं है। या सालों पुराना कोई वीडियो है, किसी और मुद्दे से संबंधित। या एडिट किया हुआ है, और बिना उस वीडियो की हक़ीक़त की जांच किये हम हिंदू हैं तो सो कॉल्ड हिंदुओं को और मुस्लिम हैं तो सो कॉल्ड मुस्लिमों को धड़ल्ले से फॉरवर्ड करने लगते हैं। बस हमारी नैतिकता पूरी। अरे इसी हरकत के लिए हमें बीए/एमए कराया गया है। डॉक्टर/इंजीनियर बनाया गया है। पुलिस/पत्रकार/टीचर बनाया गया है…या तमाम दूसरी डिग्रियां हमें दिलवाई गई हैं? कबीर ने कहा था-

”काहे को कीजै पांडे छूत विचार।
छूत ही ते उपजा सब संसार।।”

”हमरे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध।
तुम कैसे बाह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।”

एक कहावत हमारे यहां गांवों में कही जाती है “पढ़ैबे त पढ़ाव, ना त शहर में बसाव।” कहने का भाव ये कि पढ़ने या शहर में रहने से हमारी बुद्धि खुलती है। हमें सही-गलत की परख होती है और हम खुद के लिए सही रास्ता चुनते हैं, लेकिन अगर आप पढ़े-लिखे भी हैं और शहरी वातावरण का भी लाभ मिला हुआ है तो फिर ये कूपमंडूकता क्यों? फिर हममें और कुएं के मेंढक में क्या फर्क है?

और आप कबीर की बात करते हैं। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- ‘मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ’, लेकिन उन्होंने समाज को वो आईना दिखाया, जिसमें हर शख्स की कलई नज़र आ गई। बेबाक। बेमिसाल। कबीर लिख नहीं सकते थे, लेकिन उनकी कलम ऐसी चली कि मिसाल बन गई। वो पढ़ भी नहीं सकते थे, लेकिन वो समाज को ऐसा पाठ पढ़ा गये जो किसी भी धर्मग्रंथ से ऊपर था।

कबीर का जीवन लोक कल्याण के लिए बीता। और हमारा खुद पर केंद्रित है। कबीर वास्तव में एक सच्चे मानवतावादी, समाज को आईना दिखाने वाले और विश्व-प्रेमी थे, लेकिन आज का समाज स्व-केंद्रित। सिर्फ राजनीतिज्ञ या धनकुबेर ही नहीं बल्कि हम सब। कबीर जागरण युग के अग्रदूत थे, लेकिन हम दकियानूसी रूढ़िवादी आज की सो कॉल्ड आधुनिक पीढ़ी, जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अधंकारमय हो रहा था, तब कबीर ने इसे नई रौशनी दी।  हम इसे फिर अंधेरे में धकेल दिया और हमारी पूरी कोशिश है कि हम इसे इतने गर्त में पहुंचा दें कि फिर उसे कोई दूसरा कबीर कभी वापस न ला सके।

भारत का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक ढांचा जब सोचनीय हो चुका था, तब कबीर ने इसे रास्ता दिया था। एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांधता से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी और दूसरी तरफ हिंदुओं के कर्मकांडों, विधानों और पाखंडों से सामाजिकता आह भर रही थी। जनता के भीतर भक्ति- भावना नहीं बल्कि पाखंड घर कर रहा था। तब कबीर ने कहा था-

पाहन पूजै हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार।
ते तो चाक भली, पीसी खाय संसार।।”

”माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।”

आज कबीर प्राकट्य उत्सव है और हम उनकी बात कर रहे हैं। उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, लेकिन क्या हमने ये सोचा कि क्या हम उन्हें श्रद्धांजलि देने के भी क़ाबिल हैं या नहीं? हिंदी साहित्य से पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान मुझे कबीर की रचनाओं को विस्तार से पढ़ने का मौका मिला और उनकी कुछ रचनाओं ने मुझे झकझोर दिया।

”बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।”

ये पंक्तियां जैसे मेरे खुद के लिये थीं, लेकिन क्या जीवन के हर मोड़ पर हम ऐसा सोचते हैं? अगर नहीं तो हम कैसे कह सकते हैं कि हम कबीर को मानते हैं? फिर क्यों चढाएं फूल, क्यों बिछाएं चादर? और क्यों करें कबीर को याद? और ख़ासकर तब, जबकि चाहे राजा हो या प्रजा सबने सिर्फ दूसरों पर प्रहार करने और दूसरों की ही कमी निकालने की सोच रखी हो तो फिर कौन कबीर? कैसी उनकी वाणी और कैसी श्रद्धांजलि!

लेखिका श्‍वेता जया पांडेय बहुमुखी प्रतिभा की धनी पत्रकार हैं. तमाम मुद्दों पर बेबाक कलम चलाती हैं. टीवी पत्रकारिता में डेढ़ दशक से सक्रिय हैं. हमार टीवी, टोटल टीवी समेत कई चैनलों में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. फिलहाल न्‍यूज नेशन के साथ जुड़ी हुई हैं.