बरसात ने कामयाबी और शोहरत की बुलंदी पर लाकर खड़ा कर दिया

राज बहादुर सिंह

: राज कपूर की पुण्य तिथि दो जून पर श्रद्धांजलि का तुच्छ प्रयास : पृथ्वीराज कपूर के बेटे की लॉजिकल डेस्टिनी फिल्मी दुनिया न होती तो और क्या होती। राज कपूर का फिल्मी दुनिया में कूदना कोई चौंकाने वाला फैसला नहीं था। हां, उन्होंने चौंकाया जरूर। अपनी सफलता से। वह भी कदरन कम उम्र में। केवल 24 साल की उम्र में राज कपूर ने आरके प्रोडूक्शन्स की स्थापना कर दी जो हिंदी फिल्मी दुनिया मे लोगों को हैरत में डालता रहेगा, प्रेरणा देगा और न भूलने वाली फिल्मों को बार बार देखने का मौका भी।

राज कपूर ने नायक के तौर पर मधुबाला के अपोजिट 1947 में फ़िल्म नील कमल से शुरुआत की लेकिन सिर्फ एक्टिंग ही उनका मकसद नहीं था। अगले ही साल उन्होंने आरके प्रोडूक्शन्स की पहली फ़िल्म आग पेश की। पेशावर में जन्मे राज कपूर ने अगले साल जो पेश किया वह कई मायने में नायाब तोहफा था। जी हां। सही समझे आप। इस फ़िल्म के जरिए राज साहब ने हिंदी फिल्मों पर गोया तोहफों की बरसात कर दी।

बरसात ने एक झटके में न केवल राज कपूर को कामयाबी और शोहरत की बुलंदी पर ला खड़ा किया बल्कि इस फ़िल्म ने कुछ ऐसी सौगातें दीं जो अपने आप में किसी कोहिनूर से कम नहीं थीं। बरसात से फिल्मी दुनिया को मिले शंकर-जयकिशन। इसी फिल्म से वजूद में आए दो नायाब नगमानिगार-शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी। और एक हसीन और लाजवाब अदाकारा जिन्हें दुनिया ने निम्मी के नाम से जाना और खुशकिस्मती से वह अब भी हमारे बीच मौजूद हैं।

राज कपूर को हिंदी फिल्मों का सबसे बड़ा शो मैन माना जाता है और मैं नहीं कह सकता कि इस विशेषण का आधार क्या है या इसकी परिभाषा क्या है और क्या यह राज साहब के लिए सर्वोत्तम विशेषण है। बहरहाल राज कपूर तमाम खूबियों से लबरेज थे। उन्होंने अपनी एक टीम बना रखी थी और जहां तक हो सका वहां तक साथ निभाया भी। अगर आवारा के स्क्रीन राइटर ख्वाजा अहमद अब्बास थे तो राज साहब की मौत के बाद बनी और रिलीज हुई हिना में भी अब्बास साहब ने ही यह जिम्मेदारी निभाई। कैमरामैन राधू करमाकर को उन्होंने जिस देश मे गंगा बहती है जैसी फ़िल्म डायरेक्ट करने का मौका दिया।

राज साहब एक उम्दा और सच्चे पारखी थे प्रतिभा और काबलियत के। संगीत के तो वह खास ही जानकर थे और इसके तमाम किस्से मशहूर हैं। यहां उनकी पारखी नजरों का जायजा अलग ढंग से लेते हैं। मेरा नाम जोकर आते आते जयकिशन की मौत हो गयी और शंकर के साथ उनकी जोड़ी बिखर गई। अपनी अगली फिल्म बॉबी के लिए राज साहब ने बतौर संगीतकार जो विकल्प चुना वह था लसक्ष्मीकांत प्यारे लाल का जो शंकर जयकिशन की खाली की जगह को भरने के लिए बेस्ट चॉइस थे।

एलपी का दौर था तो राज साहब ने सत्यम शिवम सुंदरम और प्रेम रोग में भी उन्हें ही मौका दिया जो बिल्कुल दुरुस्त फैसला साबित हुआ। लेकिन पारखी नजरों ने आगे का दौर पढ़ लिया था और 1984 में अपनी आखिरी फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली के लिए उन्होंने एलपी को रवींद्र जैन से रिप्लेस कर दिया और ऐसा लगता है कि फ़िल्म के गीतों को रविन्द्र जैन की कम्पोजिंग का ही इंतजार था।

कहते रहेंगे तो बात कभी खत्म नहीं होगी। अफसोस की बात यह जरूर है कि उनकी जिंदगी दो जून 1988 को केवल 64 साल में खत्म हो गयी। तो क्या उनकी दास्तां तो कभी खत्म नहीं होगी और हम यही कहेंगे उनके बारे में-

हम ने आखिर क्या देख किया
क्या बात है क्यूं हैरान हैं हम।

राज बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के जाने माने पत्रकार हैं. हिंदी-अंग्रेजी पर समान पकड़ रखते हैं. दैनिक जागरण समेत कई बड़े संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सियासत, फिल्म और खेल पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले श्री सिंह फिलहाल पायनियर में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका लिखा फेसबुक से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.