कोरोना का कहर : छोटे कर्जदारों पर भारी बैंकों की ईएमआई

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अरविंद कुमार चौधरी

: निजी संस्‍थानों के कर्मचारी एवं छोटे व्‍यापारी सर्वाधिक प्रभावित : प्रयागराज। इस समय पूरा विश्व जहाँ कोरोना (#corona) के कहर से पीड़ित है। हमारा देश भी इसके कहर से अछूता नहीं है। सरकार की सतर्कता के चलते इस कोरोना वायरस को भारत में तेजी से आगे बढ़ने से रोकने के साथ ही इसे समाप्त करने के समस्त उपाय किए जा रहे हैं। ऐसे में वह सभी सक्षम लोग कोरोना को रोकने में सहायता के लिए आगे आ रहे हैं, जिनसे समाज एवं सरकार को आपातकाल मे हमेशा उम्मीद रहती है।

वह चाहे भगवान के रूप हमारे चिकित्सक हों या फिर सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता हों या देश के प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने, या फिर हमारे देश के नेता, अभिनेता, सभी अपने सामर्थ्य के अनुसार देश के साथ खड़े हैं।  राज्य सरकारें भी अपना दायित्व पूर्ण निष्ठा के साथ निर्वाह कर रही हैं । ऐसे आपातकाल में संपूर्ण समाज को खाघ पदार्थ एवं  चिकित्सा सेवाओं की आवश्यकता होती है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।

इन सभी सेवाओं का प्रबंध केन्द्र सरकार, राज्य की सरकारें युद्ध स्तर पर कर रही हैं।  इन सभी के साथ साथ आज के आधुनिक दौर में मानव के समक्ष कोरोना के इस आपातकाल में  एक समस्या और खड़ी है, जो उसकी रातों की नींद उड़ा रही है। वह है बैंकों से लिए गए कर्ज की किस्तें, जो घर बनाने, बहन-बेटी की शादी करने, व्यापार को शुरू करने या किसी परिजन की बीमारी के इलाज के लिए लिया है।

बैंक वसूलते हैं जुर्माना : कर्ज की किस्तें (emi) कर्ज लेने वाले को तो तय समय पर  बैंकों को देनी होती हैं, अगर वह नहीं चुका पाता है तो बैंक इस पर भारी भरकम जुर्माना वसूलते हैं। जुर्माना कर्ज लेने वाले की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त हैं, क्‍योंकि इससे धनहानि के साथ उसकी रेटिंग भी खराब होती है। कोरोना जैसे आपात काल में सरकार को चाहिए कि वह बैंकों के साथ बात करे और इस समस्या का कोई उपाय निकाले।

आज जब पूरा देश घरों के अंदर है तो ऐसे में सामान्य सी बात है कि अधिकांश लोगों की आय या तो खत्म हो गई है या तो कम हो गई है। विकास के इस दौर में जब परिवार के सभी सदस्य कमाते हैं,  तब भी इंसान को बहुत सी जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंकों से कर्ज लेना पड़ता है। अब कोरोना के  इस आपातकाल काल में तो परिवार के सभी सदस्य घरों में रूके हैं, सिर्फ उनको छोड़कर, जो जरूरी सेवाओं से जुड़े हुए हैं।

ऐसे में निजी संस्थानों में कार्य करने वालों अथवा छोटे रोजगार करने वाले लोगों को से कोरोना के आपातकाल तक तो किस्तें चुकाने के लिए बैंकों से कोई राहत तो मिलनी ही चाहिए। ताकि कोरोना वायरस के कारण आर्थिक तंगी से गुजरने वाले उन लोगों को राहत मिले, जो कर्ज की किस्त चुकाने की चिंता में कोरोना को बौना समझ कर घर से बाहर निकल रहे हैं तथा अपनी जान को खतरे में डालने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। arvind kumar

लेखक अरविंद कुमार प्रयागराज के निवासी हैं. मार्केटिंग के पेशे से जुड़े हुए हैं तथा तमाम विषयों पर लिखते रहने के शौकीन हैं.