बना रहे बनारस : जिद्द के जंगल में गायब होती काशी की बूढ़ी गलियां

हरेंद्र शुक्‍ला

: शासन-प्रशासन ने इन गलियों को नहीं शहर की धडकनों को बेपटरी किया है : वाराणसी।  एक सनक है, एक जिद्द है कि हम विश्वनाथ कारिडोर बनायेंगे। शासकीय जिद्द कितनी निर्मम  है कि जनभावनाओं को ही रौंद रही है। और इससे भी दुखद पहलू यह है कि शासन-प्रशासन जनभावनाओं का सम्मान करना तो दूर की बात उसे महसूस करने तक को तैयार नहीं है। शासन-प्रशासन की नजर में गलियों का अर्थ सिर्फ निर्जीव राहें भर ही हैं। उन्हें यह नहीं मालूम की काशी के जन-जीवन में उजाड़ी जा रही उन गलियों का महत्व धमनियों और शिराओं की तरह है।

इन्हीं गलियों में बनारस का दिल धड़कता है। इन्हीं गलियों की बदौलत काशी का अर्थशास्त्र चलता है। शासन और प्रशासन इस बात से भी अनभिज्ञ है कि दुनियां भर के लोग काशी में बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ जी, गंगा, बनारसी मिजाज घाटों और गलियों को ही देखने आते हैं। उन्हें अगर चौड़ी सड़कें और माल देखने का मन करे तो उनके लिए उनके शहर ही काफी है। शासन-प्रशासन ने इन गलियों को नहीं अपनी जिद्द में काशी की धडकनों को बेपटरी किया है।

शासन-प्रशासन ने अपनी जिद्द के चलते बनारस की पहचान को मिटाने से परहेज नहीं कर रहा है। चाहे वह गया सरदार की दूध दही की दूकान हो या फिर चुनमुन की पान की अड़ी। इस विध्वंस से अब यह सब देखने को नहीं मिलेगी। काशी में श्रीकाशी विश्वनाथ का बनने वाला कारिडोर चाहे कितना भी प्रशस्त और चमकीला क्यों न हो बनारस वालों की नजरों में उसकी अहमियत एक मुर्दा रास्ते से ज्यादा कुछ भी नहीं।

पंडित बटुक शास्त्रीजी की व्यथा :  इस निर्मम विध्वंस से काशी के वरेण्य विद्वान एवं धर्म सम्राट स्वामी करपात्रीजी महाराज के शिष्य एवं वरेण्य विद्वान पं. बटुक शास्त्रीजी बेहद खिन्न हैं। वे इसे सिर्फ इमारती बदलाव नहीं बल्कि एक परंपरा पर निर्मम प्रहार मानते हैं। शास्त्रीजी की चिंता है कि महादेव को सुख देने वाली उस अन्तरगृही यात्रा का क्या होगा, जो इन गलियों और विश्वनाथ दरबार की सात प्रदक्षिणा के बगैर पूर्णता को नहीं प्राप्त होती।

शास्त्री जी कहते हैं कि हमारे शास्त्र बोलते हैं कि मंगला आरती के बाद जिन गलियों में स्वयं बाबा विश्वनाथ के भ्रमण और शिवलिंगों के पूजन का प्रसंग आया हो, उस आस्था और विश्वास की उस थाती का क्या होगा?  पं. बटुक शास्त्री बेलाग कहते हैं कि अपनी आंखों से काशी की दुर्दशा देखने से पहले मर जाना शायद मेरे जैसे लोगों के लिए ज्यादा श्रेयस्‍कर साबित होगा।

बनारस से वरिष्‍ठ पत्रकार हरेंद्र शुक्‍ला की रिपोर्ट.