केजरीवाल की महत्वकांक्षा की भेंट चढ़ गईं “आप” की संभावनाएं

हरिगोविंद विश्वकर्मा

बिहार विधानसभा चुनाव में जहां हर प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, वहीं अपने आपको राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली आम आदमी पार्टी की मैदान में उतरने की हिम्मत ही नहीं पड़ रही है। “आप” सुप्रीमो (अरविंद केजरीवाल के लिए परफेक्ट नाम) अरविंद केजरीवाल देश के क्षेत्रीय दलों की तर्ज पर अपने को दो साल से सेक्यूलर कहने वाले नीतीश कुमार का समर्थन कर रहे हैं।

जो नेता जनता के हित में काम करने का बड़े-बड़े दावे करता रहा हो, उसका जनता का सामना करने में हिचकिचाना यही दर्शाता है कि दल या नेता आश्वस्त नहीं हैं कि उसे जनता का सहयोग मिलेगा ही। यानी उसे यह एहसास हो गया कि पिछले नौ-दस महीने में ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे बिना विज्ञापन के जनता जान सके। जिस काम को बताने के लिए इश्तेहार देना पड़े, आमतौर पर उसे काम माना ही नहीं जाता है।

विधानसभा चुनाव में “आप” दूसरे सेक्यूलर दलों की तरह नीतीश कुमार का समर्थन कर रही है। अरविंद भूल गए कि सेक्यूलर पॉलिटिक्स के नाम पर बीजेपी और नरेंद्र मोदी को गरियाने का फॉर्मूला देश 2014 के आम चुनाव में रिजेक्ट कर चुका है। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ देश भर में उपजे आक्रोश के कारण जन्मी इस पार्टी ने चारा घोटाले में सज़ायाफ़्ता लालूप्रसाद यादव और भ्रष्टाचार के कारण रिजेक्टेड कांग्रेस से हाथ मिलाने वाले नीतीश कुमार को समर्थन देने की घोषणा करके पार्टी का बहुत बड़ा नुक़सान कर दिया है जो आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर दिखेगा।

अगर 2014 के आम चुनाव की बात करें तो “आप” ने देश में 432 उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन चार ही लोकसभा में पहुंचे। पंजाब और दिल्ली की 13 सीट में से 12 पर “आप” के प्रत्याशी पहले या दूसरे नंबर पर रहे। वैसे कुल 14 प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। 47 स्थानों पर “आप” के लोग तीसरे नंबर पर रहे। पार्टी पूरे देश में दो फ़ीसदी वोट बटोरने में सफल रही। महज डेढ़ साल पुरानी पार्टी के लिए यह बुरा प्रदर्शन कतई नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि बीजेपी को अपने पहले चुनाव में केवल दो सीटें मिली थीं। लेकिन केजरीवाल मीडिया के झांसे में आ गए और दिल्ली में सभी सात सीटों पर “आप” की हार से मान बैठे कि उनकी पार्टी वाक़ई देश में हार गई।

कल्पना कीजिए, जनवरी 2014 का वक़्त जब एक से एक धुरंधर लोग आम आदमी पार्टी की तारीफ़ और समर्थन करने लगे थे। मेधा पाटकर जैसी अराजनीतिक शख्सियत भी “आप” के टिकट पर चुनाव मैदान में कूद गई थीं। उस समय ऐसा लगा भी था कि भारतीय राजनीति में एक अलग पार्टी का प्रादुर्भाव हुआ है, जिसकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है। लेकिन इस साल गर्मियों में अरविंद के गाली देते स्टिंग ने सब कुछ ध्वस्त कर दिया। आदर्शवाद और संस्कार की डींग हांकने वाले आदमी के मुंह से अपने से ज़्यादा उम्र वाले वरिष्ठ साथियों के लिए गाली सुनकर हर किसी सबका सिर शर्म से झुक गया। अरविंद कभी योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे सौम्य लोगों को गाली देंगे, यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

दरअसल, सिद्धांत यह कहता है कि गाली-गलौज़ करने वाला कोई आदमी जब शरीफ़ आदमी की भाषा बोलने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वह अभिनय कर रहा है, क्योंकि कोई शरीफ़ आदमी कितने ही ग़ुस्से में क्यों न हो, कम से कम वह किसी से गाली-गलौज़ नहीं कर सकता या किसी से मारपीट नहीं कर सकता। जो गाली-गलौज़ करता है, वह सब कुछ हो सकता है, शरीफ़ आदमी नहीं हो सकता. हां, वह शरीफ़ आदमी होने की उम्दा ऐक्टिंग ज़रूर कर सकता है। अरविंद भी लगता है अभिनय ही कर रहे थे, जो वास्तव में स्वभावतः गाली-गलौज़ करने वाले व्यक्ति हैं।

अपने जन्म के साल भर के भीतर ही दिल्ली में शानदार जीत हासिल करके सरकार बनानी वाली “आप” ने देश को कांग्रेस-बीजेपी से इतर वैकल्पिक राजनीति देने की जो प्रबल संभावनाएं पैदा की थी, वे सभी छह महीने के भीतर टांय-टांय फिस्स हो गईं। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ देश भर में उपजे आक्रोश के कारण जन्मी इस पार्टी के बारे में अगर कहें कि राष्ट्रीय पार्टी बनने की इस दल की तमाम उम्मीदें पार्टी सुप्रीमो केजरीवाल की बदतमीज़ी, महत्वकांक्षा, उच्चकांक्षा और अपरिपक्वता की भेंट चढ़ गईं, तो कोई ग़लत नहीं होगा।

दरअसल, देश को अलग तरह की राजनीति परोसने का दावा करने वाले अरविंद ने पावर इन्जॉय करने के लिए ऐसे क़दम उठाए और ऐसे लोगों को प्रमोट किया जिसके चलते साल भर पहले अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाला यह दल दिल्ली की क्षेत्रीय दल बनकर रह गया है। अगर दिल्ली के अगले एसेंबली इलेक्शन तक यह पार्टी समाजवादी पार्टी (उप्र), तृणमूल कांग्रेस (बंगाल), अन्नाद्रमुक (तमिलनाडु), तेलुगु देशम (सीमांध्र), टीआरएस (तेलंगाना), नैशनल कॉन्फ्रेंस (जम्मू-कश्मीर) और राष्ट्रीय जनता दल (बिहार) की तरह स्थाई रूप से दिल्ली का क्षेत्रीय दल बन जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

पहले लगा था कि केजरीवाल देश के युवाओं की उम्मीद हैं, लेकिन उनकी हरकतों ने तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब भविष्य में वह नीतीश कुमार को समर्थन देने के फ़ैसले को कितना भी जस्टिफ़ाई करें, शायद ही किसी के गले उतरे। नीतीश अगर जीते तो उसी सरकार की अगुवाई करेंगे जिसमें आरजेडी और कांग्रेस रहेंगे। यानी नीतीश का समर्थन करके अरविंद ने अप्रत्यक्ष रूप से लालू प्रसाद और कांग्रेस का समर्थन किया है।

दिल्ली में अभूतपूर्व सफलता ने “आप” के नेताओं शीर्ष नेताओं को कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियों के नेताओं की तरह अहंकारी बना दिया। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय अरविंद ने अपने नेताओं से कहा था, “कुछ भी हो, किसी भी क़ीमत पर अपने ऊपर अंहकार को हावी मत होने देना, क्योंकि अहंकार ने बीजेपी और कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया। लेकिन सबसे ज़्यादा अहंकार उनके अंदर ही भर गया। गाली वाला स्टिंग इसका सबसे बड़ा सबूत है।

कहने का मतलब “आप” भी अब वह सबकुछ करने लगी है, जो बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां आज़ादी के बाद से करती आ रही हैं। पहले लगता था कि मीडिया “आप” और अरविंद को लेकर पूर्वाग्रहित है लेकिन लोग मानने लगे हैं कि मीडिया ग़लत नहीं है। धीरे-धीरे साफ़ लगने लगा है कि अरविंद उसी तरह पदलोलुप और उच्चाकांक्षी हैं जिस तरह दूसरे दलों का हाईकमान।

पत्नी के साथ मारपीट जैसे शर्मनाक हरकत के आरोपी सोमनाथ भारतीय के बारे में जागने में केजरीवाल ने बड़ी देर कर दी। ठीक उसी तरह जैसे फ़र्ज़ी डिग्रीधारी जीतेंद्र सिंह तोमर के मामले में। अरविंद के इन दोनों क़रीबी नेताओं ने आम आदमी के मन में आम आदमी पार्टी की बची-खुची क्षवि को पूरी तरह नष्ट कर दी।

मुंबई के वरिष्‍ठ हरिगोविंद विश्‍वकर्मा का विश्‍लेषण. यूपी के जौनपुर से ताल्‍लुक रखने वाले श्री विश्‍वकर्मा मुंबई के दिग्‍गज पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. मायानगरी की माफियागिरी से लेकर बालीवुड में उनकी विशेष पकड़ है.