फुटबॉल महज एक खेल नहीं, भावनाओं की अभिव्‍यक्ति भी है

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कुमार नरेन्द्र सिंह

: लोकप्रियता और दीवानगी के लिहाज से दुनिया का कोई अन्य खेल फुटबॉल के आस-पास भी नहीं : इस वक्त पूरी दुनिया में फुटबॉल की दीवानगी छायी हुयी है, क्योंकि रुस में फीफा वर्ल्ड कप की स्पर्धाएं चल रही हैं। यह स्वाभाविक ही है। आखिर फुटबॉल दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल भी तो है। रुस के 13 शहरों के 16 स्टेडियम फुटबॉल खेलाड़ियों और दर्शकों के लिए किसी तीर्थस्थल से कम नहीं दिखायी दे रहे हैं। अपने-अपने पसंदीदा टीम और खिलाड़ियों का प्रदर्शन देखने के साथ-साथ उनकी हौसलाअफजाई के लिए दुनियाभर के फुटबॉल प्रेमी रूस में इकत्रित हैं।

दिलचस्प है कि रूस पहुंचने वालों में सबसे ज्यादा संख्या अमेरिकियों की है, जबकि दशकों से इन दोनों देशों के बीच कटु संबंध ही रहे हैं। लोकप्रियता और दीवानगी के लिहाज से दुनिया का कोई अन्य खेल फुटबॉल के आस-पास भी नहीं फटकता, लेकिन इसकी लोकप्रियता को केवल एक मनोरंजक खेल के स्तर पर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। फुटबॉल का यह महाकुम्भ जहां भी आयोजित होता है, अपनी लोकप्रियता के साथ-साथ इससे इतर भी कुछ लिए होता है, जो सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण होता है।

आनंद, रोमांच और कथानक : यह सही है कि फीफा वर्ल्ड कप के सारे मैच दर्शकों को आनंद और रोमांच से भर रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही वे कुछ आंतरिक नाटकीयता और कथानक भी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे देखना तमाम दर्शकों के लिए सहज नहीं है। इस तथ्य को मिस्र के उदाहरण के जरिए ज्यादा स्पष्टता से देखा जा सकता है। मिस्र और उरुग्वे के बीच स्पर्धा शुरू होने के पहले सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही थी कि इस मैच में मिस्र का स्टार खिलाड़ी मोहम्मद सालेह खेल पाएंगे या नहीं, क्योंकि उनके कंधे में चोट लगी थी।

मैच शुरू होने के पहले की खबरों पर यदि नजर डालें, तो साफ पता चल जाता है कि मोहम्मद सालेह को मैदान में उतरने वाले केवल एक खिलाड़ी के रूप में नहीं देखा जा रहा था, बल्कि उससे ऊपर देखा जा रहा था। सालेह मैच में उतरने के पहले ही मिस्र के राष्ट्रीय आईकॉन के रूप में देखे जाने लगे थे। अपनी इस नवनिर्मित छवि से वह मिस्र के सभी वर्गों को एक सूत्र में बांधने में सफल हो गए, यहां तक कि लोगों के परस्पर विपरीत राजनीतिक रुझानों को भी दबा दिया।

यह एक असाधारण उपलब्धि ही कही जाएगी, विशेषकर तब जब हम 2011 के बाद वहां पैदा हुयी अराजकता पर नजर डालते हैं। यह सच है कि मिस्र वह मैच उरुग्वे से हार गया, लेकिन इतना तय है कि सलाह के चलते मिस्रवासियों में एकता का जो एहसास पैदा हुआ, वह त्वरित खत्म नहीं होने वाला है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इतना बड़ा सार्थक काम मिस्र के तमाम राजनेता और सिविल सोसायटी के लोग मिलकर भी नहीं कर सकते थे।

राष्ट्रीय टकराव एवं सामाजिक परिवर्तन : बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉन ने लिखा था कि अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल राष्ट्रीय टकरावों की अभिव्यक्ति हो सकता है और अपने देश या राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी अपने कल्पित समूह की अभिव्यक्ति हो सकते हैं। उनका यह कथन आज भी सही लगता है। हम आसानी से देख और महसूस कर सकते हैं कि दो चिर प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच जब मैच होता है, तो वह खेल से ज्यादा उनकी राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति दिखायी देता है।

खिलड़ियों की बॉडी लैंग्वेज और उनका आक्रामक खेल देखकर ऐसा लगता है, जैसे वे फुटबॉल नहीं खेल रहे हों बल्कि युद्ध लड़ रहे हों। इतना ही नहीं, कई बार तो मैदान में मिली जीत एक तरह की भू-राजनीतिक जीत का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है। मैदान की हार-जीत कई बार दो देशों के बीच कटुता बढ़ाने में भी सक्षम हो जाती है। बहरहाल, वर्ल्ड कप किसी देश की आंतरिक विभेदों और विरोधाभासों को दबाने का काम भी बखूबी कर सकता है, क्योंकि यह सॉफ्ट राष्‍ट्रवाद का एक वाहन भी होता है।

जब कोई टीम जीत के साथ स्वदेश लौटती है, तो उसके स्वागत में सारा देश खुशी से झूमने लगता है और लोग एक-दूसरे को जीत की बधाई देते हैं। लोगों का यह जुनून किसी राष्ट्र को सकारात्मक सोच और ऊर्जा से भर देने की क्षमता रखता है। वर्ल्ड कप किसी देश में सामाजिक परिवर्तन को भी संभव बनाने की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए ईरानी महिलाओं द्वारा सेंट पीटरवर्ग में मोरक्को के खिलाफ उनके देश के मैच के दौरान झंडे लहराना बड़े काम का साबित हुआ।

यह महिलाएं ईरान के आजादी मैदान में औरतों के मैच देखने पर लगाए गए सरकारी प्रतिबंध के खिलाफ परचम लहरा रही थीं। वर्ल्ड कप शुरू होने के पहले महीने में अबजीज नामक महिला गायिका समूह ने ईरानी पुरुषों का समर्थन मांगते हुए यह गीत गाया – ‘तुम्हारी बगल में खाली सीट मेरी जगह है। अपनी बगल में मुझे बिठाना तुम्हारा अधिकार है और वहां बैठना मेरा अधिकार। मुझे अपना ही एक हिस्सा समझो। मैं तुम्हारे समान हूं।’

इसका नतीजा यह हुआ कि तेहरान के स्थानीय काउन्सिल ने महिलाओं को स्पेन के खिलाफ ईरान का मैच देखने के लिए आजादी मैदान में प्रवेश की इजाजत दे दी। ठीक है कि यह कहना जल्दीबाजी होगी कि इससे वहां कोई बड़ा सामाजिक बदलाव हो जाएगा, लेकिन विश्व फुटबॉल कप की क्षमता का एहसास तो हो ही जाता है।

कुरूपता का सुंदरता में बदलाव : हमें एक बात आवश्यक रूप से समझ लेनी चाहिए कि फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी करने वाले देश और वहां पहुंचने वाले दर्शकों की रुचि केवल खेल तक सीमित नहीं होती। मेजबान देश ऐसे आयोजनों के जरिए दुनिया के सामने एक पूरा पैकेज प्रस्‍तुत करता है, जिसमें खेल के साथ-साथ राजनीति, व्यापार और कूटनीति भी होती है। वर्ल्ड कप के दौरान मेजबान देश की छवि और भी निखर जाती है। उसकी घरेलू समस्याओं मसलन गरीबी, भ्रष्टाचार, जातीय टकराव आदि फुटबॉल की छाया में गुम हो जाते हैं।

मानवाधिकार का मामला नेपथ्य में चला जाता है और उसकी व्यापारिक संभावना में इजाफा हो जाता है। इतना ही नहीं, भ्रष्टाचार को अनदेखा करने का एक भाव भी पैदा हो जाता है यानी सबकुछ अच्छा-अच्छा दिखायी देने लगता है। इसके साथ मेजबान देश में पहुंचने वाले लोग अपने लिए व्यापारिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अवसर की तलाश भी करते हैं। अन्यथा नहीं कि इस बार रुस पहुंचने वालों में सबसे ज्यादा अमेरिकी हैं।

जाहिर है कि वे केवल मैच देखने नहीं गए हैं, बल्कि वास्तविक स्थिति का अवलोकन करने भी गए हैं। वर्ल्ड कप खेल के अलावा अरवों का धंधा है और इसीलिए वे देश भी इसका आयोजन करने की चाहत रखते हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल में कोई स्थान तक नहीं रखते। यही कारण है कि अमेरिका और कतर जैसे देश इसकी आगवानी करने को लालायित हैं। संक्षेप मे कहा जाए, तो यह अपने दामन में खेल के अलावा राजनीति, अर्थशास्त्र, सामाजिक मुद्दे, नस्‍ल और वर्ग, इतिहास, भ्रष्टाचार, भय और आनंद से भी संबंधित होता है।

कुमार नरेंद्र सिंह वरिष्‍ठ एवं देश के जानेमाने पत्रकार हैं। वह राष्‍ट्रीय सहारा, हमार टीवी, नई दुनिया समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर काम कर चुके हैं। फिलहाल वह पाक्षिक पत्रिका लोक स्‍वामी के संपादक के तौर पर काम कर रहे हैं।