एलजी दफ्तर पर धरना : कौन रहा फायदे में, किसे हुआ नुकसान

kejriwal

कुमार समीर

: आप के बहाने विपक्षी दल एकता दिखाने में रहे कामयाब : नई दिल्‍ली : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविद केजरीवाल का उपराज्यपाल अनिल बैजल के दफ्तर पर धरना अखिरकार नौवें दिन समाप्त हो गया। हालांकि इस दौरान खूब लुकाछिपी का खेल हुआ और काउंटर के लिए दिल्ली सचिवालय पर भाजपा के विधायक भी धरने पर बैठ गए, लेकिन इस सबके बावजूद केजरीवाल को इस बार नुकसान कम, फायदा ज्यादा हुआ है। क्योंकि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता एकजुट होकर सड़क पर विरोध प्रदर्शन करने में कामयाब हुए और पार्टी इसके जरिये अपनी ताकत और सड़कों पर भीड़ दिखाने में सफल रही।

इसमें दो राय नहीं कि सड़कों पर समर्थकों के जनसैलाब से पार्टी में जान आ गई। इसका लाभ भी मिला व चार माह से चल रहा सरकार और अफसरों का विवाद सुलझ गया, जिसके लिए धरना दिया गया था। यानी सफलता मिली और यह भी सच है कि केजरीवाल के समर्थन में खुलकर चार राज्यों के मुख्यमंत्री का आना केजरीवाल व उनकी पार्टी आप के लिए टर्निंग प्वाइंट रहा।

इन चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों का केजरीवाल को शुक्रगुजार होना चाहिए, क्योंकि इन सभी राज्यों कर्नाटक, पश्चिम बंगाल,केरल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने पीएम मोदी से नीति आयोग की बैठक के दौरान भी दिल्ली मामले में हस्तक्षेप करने की अपील तक कर डाली। इन चारों राज्यों के मुख्यमंत्री ने अपना समर्थन केजरीवाल को देते हुए साफ-साफ शब्दों में प्रधानमंत्री से कहा कि एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ दिल्ली में जो कुछ हो रहा है वो गलत है।

इतना ही नहीं टीएमसी, जेडीएस, जेडीयू, टीडीपी, शिवसेना, आरजेडी, बीएसपी, सपा, आरएलडी समेत 9 पार्टियों ने केजरीवाल की मांग का पुरजोर ढंग से समर्थन किया। इन सभी पार्टियों ने एक सुर में कहा कि दिल्ली सरकार के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इन दलों के नेताओं ने इसके लिए सीधे मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया। इन 9 पार्टियों से समर्थन से आप को अपनी मांगों पर और बल मिला वहीं केंद्र में सत्तासीन भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ा कि वह इस मामले में हस्तक्षेप कर तत्काल इसका निराकरण करने की पहल करे।

इसमें दो राय नहीं कि जिस तरह का प्रेशर गेम आम आदमी पार्टी की तरफ से खेला गया, उसका अंदाजा ना तो उपराज्यपाल को रहा होगा और ना ही केंद्र में सत्तासीन भाजपा को। सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इस मामले में भाजपा गच्चा खा गई और आम आदमी पार्टी फायदे में रह गई, क्योंकि विपक्ष की एकजुटता दिखाकर वह यह मैसेज देने में कामयाब हो गई कि अब वह अकेले नहीं है, विपक्षी पार्टियों का नैतिक समर्थन उसे हासिल है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि कांग्रेस का भी आप को समर्थन मिला हुआ था।

दिखावे के लिए केवल प्रदेश कांग्रेस पार्टी इकाई बिजली-पानी मसले को लेकर आप सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी, जबकि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व लगातार आप के नेताओं के संपर्क में था। सूत्र की मानें तो कांग्रेस व आप के बीच आगामी लोकसभा सीटों के लिए तालमेल की बात तक हो चुकी है और उचित समय पर इसकी घोषणा कर दी जाएगी। यानी अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के लिए दिल्ली की सात लोकसभा सीटों को बचाने के लिए नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव में आए वोट प्रतिशत के आंकड़ें पर गौर करें तो कांग्रेस व आम आदमी पार्टी को मिले कुल वोट प्रतिशत भाजपा को मिले वोट प्रतिशत से ज्यादा है और इससे साफ है कि भाजपा को दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों को बचाना मुश्किल होगा। यानी दिल्ली में अगर विपक्षी एका (महागठबंधन) के तहत चुनाव हुए तो इसका फायदा महागठबंधन को मिलना तय है, अगर तब तक कोई पड़ा उलटफेर ना हो जाए।

लेखक कुमार समीर वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. सहारा, नई दुनिया, फोकस टीवी समेत कई अन्‍य संस्‍थानों में भी वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं.