पटौदी साहब जेल में थे, उनसे मिलने शर्मिला, सैफ, सोहा कोई नहीं आया

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आलोक कुमार

: जो जितना ऊंचा वह उतना ही अकेला : नई दिल्‍ली : दुमका में कर्मचारी हड़ताल हुई। जेल भरो आंदोलन चला। मेरे एक परिजन जेल चले गए। हम सबकी घिग्घी बंध गई। पिताजी शहर से बाहर थे। उन्होंने किसी की मुसीबत में डंटकर खड़े रहना बता रखा है। उनकी रिहाई में दो दिनों की देर हो गई। कोहराम मच गया। हमारी जिंदगी जेल के चाहरदीवारी के बाहर जाकर ठहर गई। वो अंदर और हम बाहर। मिलने के हर तय वक्त पर दौड़ता-हांफता पहुंच जाता। कुशलक्षेम पूछता। ढांढस बंधाते।

उनके नेता कामत जी थे। कामेश्वर कामत से संपर्क बनाए रखता। जेलर से लेकर संतरी तक की चिरौरी करता। उनके लिए खाने का खास सामान ले जाता। ठंढ के दिन थे। वो सीखचों के पार कंबल ओढे हमसे मिलते। हम परिजन उस वक्त की बनाई नियति पर रोते रहे।

लेकिन परिजनों के दर्द का यह मार्मिक सीन पटौदी साहब के सिनेमा से पूरी तरह गायब था। दर्शक के नाते सहमा-सहमा देखता रहा। झज्झर का अंडरग्राउंड वाटर अच्छा नहीं था। रॉयल पटौदी को बाहर चापाकल पर स्नान कराया जाता। बाल्टी मग लेकर जाते। याद है, उनको अपने साथ लाया बिसलरी की बोतल भेंट कर दी थी।

जेल का एक ऐसा ही सीन अपने उस्ताद आलोक तोमर के साथ घटित हुआ। एक शाम अचानक सुप्रिया भाभी का फोन आया- “कहां हो। अभी आ जाओ।“ आवाज में घबराहट थी। बेहद कारुणिक। क्यों और कहां आऊं ? पूछना जरुरी नही समझा। स्टेयरिंग चितरंजन पार्क की ओर घुमा दी। रास्ते में भैया को फोन मिलाया। किसी पुलिस वाले ने उठाया। बताया कि वह डिफेंस कॉलोनी थाने में हैं।

स्वर्गीय आलोक तोमर पंगेबाज संपादक थे। शब्दों से अन्याय के मुकाबिल डंटे रहे। नकाबपोश का शिकार उनका शौक रहा। दिल्ली पुलिस कमिश्नर कृष्ण कुमार पॉल से ठान ली। अमित पॉल से जुड़ी कहानियां छापने लगे। अमिता पॉल की बात बताने लगे। गुर्राती पुलिस फांसने के ताक में लग गई। उनकी पत्रिका में किसी और की गलती से पैगंबर साहब का कार्टून छप गया। उन्होंने गलती करने वाले को पूरी तरह बचा लिया। सजा के लिए खुद को सामने कर दिया। वसूलन संपादक होने का उन्होंने तब जो धर्म निभाया, वह आज कोई सोच ही नहीं सकता।

तिहाड़ के जनसंपर्क अधिकारी सुनील गुप्ता हमारे परिचित थे। पुलिस ने गंभीर केस बना रखा था। वह ज्यादा मदद करने में लाचार बताने लगे। इंसानियत के नाते थोड़ा बहुत जो बन पड़ा उन्होने जरुर किया। मुश्किल में फंसे परिजन के लिए वही काफी था। पुलिस ने भैया को तिहाड़ में खूंखार आतंकवादियों के सेल में पहुंचा दिया था।

“फोन टेप हो रहे हैं। पुलिस मददगारों पर नजर रख रही है। आलोक तोमर अच्छे व्यक्ति नहीं हैं। उन्होंने जरुर कोई गलती की है।” पत्रकारों के बीच आदि अनादि अफवाहें उड़ने लगी। हमारी बिरादरी के ज्यादातर जांबाज भाग खड़े हुए। गदहे के सिर से सींग की तरह।

सुप्रिया राय मिसाल बनीं। पूरी हिम्मत,हौसले और जज्बे से डंटी रहीं। पत्रकारों से मदद की उम्मीद पालने के बजाय वकील संतोष चौरिया और विवेक तन्खा के केबिन के चक्कर लगाने लगीं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के घर के दर पर सैंडिल रगड़ती रहीं। मुश्किल के बादल छंटे। नतीजा निकला। दस जनपथ से फोन हुआ, तो पुलिस शिथिल पड़ी। बाद में आदरणीय प्रभाष जोशी और रामबहादुर राय अदालत में खड़े मिले, तो भैया के कई पुराने साथी लोकलाज की वजह से नजर आने लगे।

इन आपबीती के अलावा अदालत और जेल के कई किस्सों का गवाह रहा। तिहाड़ की हालत पर कई स्टोरी की। किरन बेदी के तिहाड़ को आश्रम बना दे्ने की जिद को देखता रहा। वहां फंसे व्यक्ति के कई रियल किस्से हैं। उन सबमें एकसमान बात मिली कि जिस बड़े शख्स ने वहां पहुंचने की तैयारी में इंतजाम नहीं किया वह बेबस और लाचार नजर आया। बडे तुर्रर्म खान के छक्के छूटते देखता रहा। अजीबोगरीब तरीके से उनके सगे संबंधी मुश्किल घड़ी में नजरें बचाते नजर आए। टाइगर पटौदी भी बिना किसी पूर्व तैयारी के पुलिस के शिकंजे में फंस गए।

याद 6 जून 2005 की है। टाइगर पटौदी लाचार पड़े थे। उनकी जिंदगी का कारुणिक पक्ष सामने था। बेहद बड़ा नाम। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे। शिकार का शौक पाला। शिकार के एक से बढ़कर एक किस्से उनके नाम है। पटौदी महल के स्वागत द्वार पर एक शिकार की बेमिसाल खाल टंगी देखी थी। उसे पुलिस टीम उतरवाकर मेरे सामने बरामदगी में दिखा ले गई।

पटौदी के नबाव थे। आज की दिल्ली के करीब सबसे आलीशान गुडगांव है। उससे लगा पटौदी गांव है। आजादी के बाद तक यह रियासत हुआ करता। रियासतों के भारतीय संघ में विलय के वक्त तक मंसूर अली खान पटौदी और भोपाल रियासत के आखिरी सुल्तान रहे। टाइगर मंसूर अली ही नहीं उनके पिता नबाव इफ्तिखार अली खान सिद्दिकी भी रसूखदार क्रिकेटर थे। इंगलैंड के लिए खेले औऱ भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान रहे।

खानदानी इफ्तिखार खान की पत्नी सादिया भोपाल के नवाब की अकेली संतान थी। इसलिए नवासी मसूंर अली की किस्मत में भोपाल रियासत भी आई। टाइगर पटौदी का 2011 में इंतकाल हो गया। खबर है कि अब भोपाल के 2700 करोड़ रुपए के जायदाद की मालकिन उनकी पत्नी शर्मिला टैगोर हैं।

टाइगर की खुबसूरत पत्नी शर्मिला टैगोर भोपाल और पटौदी दोनों रियासत की मालकिन हैं। शर्मिला टैगोर खुद राष्ट्रगान के रचियता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की नवासी हैं। शादी के बाद किताबों में उनका नाम आयशा खान है। उनकी तीनों संतान का सबाब है। काबिलियत की मिसाल हैं। बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित कपूर खानदान में नया रिश्ता बना है। करीना कपूर बहु हैं।

नवाब पटौदी का लंबा चौड़ा परिचय इसलिए कि इस सक्षम परिवार की किस्मत ने वक्त के साथ जब पलटा खाया, तो मुझ पत्रकार को गवाह बनाया। नवाब काल कोठरी में बंद हो गए। दो दिन और दो रात वो मेरे सामने थे। जी न्यूज में था। पुलिस से परफेक्ट सेटिंग कर ली। बंदी के बारे में पल-पल की खबर मिलने लगी। कई बार टाइगर से सीधे संवाद किया। पत्रकारिता में अक्सर ऐसा होता रहता है।

नवाब झज्झर पुलिस थाने की एक तंगहाल कोठरी में कैद थे। हमारी पहुंच उस कोठरी तक थी। उनपर जो बीत रही थी, उसे देखकर मेरी हालत खराब थी। मन दुखी था। उनकी आंखें परिजनों के इंतजार में थक गई। कोई मिलने नहीं आया। दो दिनों तक चश्मदीद बन हम पत्रकार इंतजार करते रहे कि पिता से मिलने सैफ अली खान आएंगे। लेकिन वह विशाल भारद्वाज की फिल्म “ओंकारा” की शूटिंग में व्यस्त रहे।

हम चर्चा करते रहे पिताजी के जमाने की सुपर स्टार शर्मिला टैगोर जरुर आएंगी। मगर पटौदी साहब की तरह हम भी निराश हुए। मेमसाब नहीं आईं। बेटी सोहा अली खान भी नहीं आई। सोहा के न आने की वजह थी। टाइगर ने जिस बंदूक से काले हिरन का शिकार किया, उसका लाइसेंस सोहा अली के नाम ही था।

एक उम्मीद फैशन डिजाइनर बेटी सबा अली से थी। वह गुडगांव में कारोबार करती हैं। झज्झर के करीब थीं। लेकिन वह भी पिता मंसूर अली खान पटौदी से मिलने नहीं आई। रोहतक के एसएसपी हनीफ कुरैशी के साथ चांद न बदला सूरज न बदला, देखो कितना बदल गया इंसान गाता रहा। बड़े खानदान के मानसिक रवैए पर तरस खाता रहा।

परेशान होकर शर्मिला टैगोर को फोन लगाया। उनसे आग्रह किया कि झज्झर आईए, हम पत्रकार मिलाने का इंतजाम करवा देंगे। लेकिन वह नहीं मानी। कैमरे के आगे के आने को तैयार नहीं हुई। दिल्ली में उनके वसंत विहार वाली कोठी में होने का पता लगा। वहां एक रिपोर्टर को धरने पर बैठा दिया पर वो एक बाईट के लिए तैयार नहीं हुई। आग्रह करने लगीं, हमें अकेला छोड़ दिया जाए।

नवाब से जब सामना हुआ, तो पूछ ही लिया, “आपकी फैमिली से मिलने कोई नहीं आ रहा। क्या आप खुद को अकेला नहीं महसूस कर रहे हैं?” अंग्रेजी में उनका जवाब था, “सब अपने काम में व्यस्त हैं। उनको यहां आने से मना कर रखा है। इस मुसीबत से छूटूं तो सबसे जाकर मिलूं।” उनकी हालत देख साफ नजर आया कि ऊंचाई पर इंसान वाकई अकेला हो जाता है। हाथ जोड़े प्रार्थना करता रहा कि ईश्वर ऐसी ऊंचाई से सदा बचाए। इंसानों से गुलजार दुनिया में बनाए रखे।

वरिष्ठ पत्रकार आलोक कुमार के एफबी वाल से साभार.