राज्यसभा पहुंचकर कुछ करना भी है क्या?

कुणाल वर्मा

यह सवाल इसलिए है क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में कुछ ऐसी सुविधाएं मौजूद हैं जिन पर अक्सर बहस होती रहती है। एक ऐसी ही सुविधा का नाम ‘मनोनयन’ है। यह मनोनयन भारत के राष्‍ट्रपति करते हैं। राज्यसभा के लिए मनोनीत होने वालों में कला, विज्ञान, खेल, फिल्म, सामाजिक कार्य आदि क्षेत्रों से जुड़े व्यक्ति होते हैं। इन क्षेत्रों के बारह व्यक्तिों के मनोनयन का अधिकार राष्‍ट्रपति को होता है। भारतीय लोकतंत्र ने उन्हें यह अधिकार इसलिए दिया है क्योंकि राष्‍ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य राज्यसभा में पहुंच कर उन क्षेत्रों की बात कर सकें जिसका वो प्रतिनिधित्व करते हैं। पर मंथन जरूर करना चाहिए कि क्या ये सदस्य अपनी भूमिका का सही तरीके से निर्वहन कर पाते हैं। 

राष्‍ट्रपति रामनाथ कोबिंद ने शनिवार को राज्यसभा में चार हस्तियों को मनोनीत किया है। इनमें किसान नेता राम शकल, लेखक और स्तंभकार राकेश सिन्हा, मूर्तिकार रघुनाथ महापात्रा और क्लासिकल डांसर सोनल मानसिंह का नाम शामिल है। सबसे अहम यह है कि इस बार फिल्म या खेल जगत से फिलहाल किसी हस्ती को राज्यसभा नहीं भेजा गया है। यह एक अच्छी बात है कि ऐसी हस्तियों को मनोनीत किया गया है जो ग्लैमर्स जीवन से दूर हैं।

बहुत से लोग तो ऐसे होंगे, जिन्होंने राम शकल, राकेश सिन्हा और मूर्तिकार रघुनाथ का नाम ही पहली बार सुना होगा। सोनल मान सिंह को जरूर लोग जानते हैं, पर वे हमेशा ग्लैमर्स और सेलिब्रेटी स्टेटस से दूर ही रही हैं। ऐसे में यह एक अच्छी पहल मानी जा सकती है। अक्सर देखा गया है कि सेलिब्रेटी स्टेटस से घिरे मनोनीत सदस्यों ने न तो कभी अपने कद के अनुसार राज्यसभा में उपस्थिति दर्ज करवाई और न ही अपने क्षेत्र की बात कह सके, जिसके लिए उन्हें राज्यसभा भेजा गया था।

पिछले साल राज्यसभा सांसद अभिनेत्री रेखा और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को लेकर काफी विवाद हुआ था। इन दोनों के अलावा ओलंपियन एमसी मैरीकॉम और महिला कारोबारी अनुआगा पर भी सवाल उठे थे। ऐसे मनोनीत सदस्यों की राज्यसभा में उपस्थिति का मुद्दा काफी जोर-शोर से उठा था। यह पहली बार था कि राज्यसभा के सदस्यों ने ही इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। सदस्यों ने सवाल उठाया था कि अगर इनके पास वक्त नहीं है तो सांसद बनते ही क्यों हैं? या उन्हें सांसद बनाया ही क्यों जाता है?

खासकर रेखा और तेंदुलकर की ऊपरी सदन में उपस्थिति नाम मात्र की रही थी। सबसे अहम यह था कि इस मुद्दे पर सदन से बाहर काफी चर्चा होती रही थी। टीवी और अखबारों में इस मुद्दे पर बहस होती रही थी। पर यह पहली बार था कि सदन के अंदर इस पर सदस्यों ने अपनी राय रखी। यह एक महत्वपूर्ण संदेश था कि हम लोकतंत्र की इस सुविधाभोगी व्यवस्था पर गंभीर मंथन करें। सचिन को वर्ष 2012 में राज्यसभा सांसद मनोनीत किया गया था।

उस वक्त उन्होंने कहा था कि उनकी प्राथमिकता खेल रहेगी। उम्मीद की जा रही थी कि सचिन भारत में खेल पॉलिसी पर कुछ बेहतर करेंगे। पर यह अफसोसजनक था कि दस संसद सत्र के दौरान उनकी उपस्थिति मात्र तीन दिन ही रही। वह भी सिर्फ हाजिरी लगाने तक सीमित रही। उन्होंने राज्यसभा में न तो कोई प्रशन पूछा और न किसी बहस में हिस्सा लिया। ऐसा ही कुछ हाल अभिनेत्री रेखा का रहा। उन्होंने भी सदन में न कोई सवाल पूछा है और न ही किसी चर्चा में हिस्सा लिया।

विभिन्न क्षेत्रों के लब्धप्रतिष्ठित शख्सियतों को राज्यसभा में लाने के पीछे एक ठोस तर्क है। लोकतंत्र में यह व्यवस्था इसलिए दी गई थी, क्योंकि ऊपरी सदन में हर वर्ग, समुदाय और क्षेत्र की बात हो सके। सभी को अपने क्षेत्र की बातों को रखने का हक हो। एक मूर्तिकार को सबसे निचले तबके का माना जाता है। ऐसे में कोई सोच भी नहीं सकता है कि उनके वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला भी लोकतंत्र के सबसे ऊंचे पायदान पर होगा।

पर मंथन करिए कि मनोनीत होने वाले मूर्तिकार रघुनाथ महापात्रा अगर एकाध बार ही राज्यसभा की कार्यवाही में शामिल होने पहुंचे तो इस वर्ग के लोगों को गर्व होगा या फिर निराशा। ऐसे में मूर्तिकार महापात्रा हों या फिर अन्य क्षेत्रों से राज्यसभा पहुंचने वाले अन्य सदस्य, सभी का दायित्व बनता है कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। वे सदन की कार्यवाही में पहुंचे और अपने वर्ग और क्षेत्र की बात को पूरे देश के सामने दृढ़ता से कहें।

पर अफसोस इस बात का है कि मनोनीत सदस्यों की सदन की कार्यवाही के प्रति बेरूखी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर मंथन करने को मजबूर करता है। एक बार आप सांसद बन जाते हैं तो आजीवन मिलने वाली लग्जरी सुविधाओं के आप हकदार हो जाते हैं। धन के साथ-साथ आपको वो अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं जो आपको हमेशा एक विशिष्ठ व्यक्ति बने रहने का अहसास दिलाती है। ऐसे में इन सदस्यों को मंथन जरूर करना चाहिए कि वे अपनी भूमिका का निर्वहन कैसे करें। साथ ही लोकतंत्र में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को भी इनकी भूमिका सुनिश्चित करने की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है।

जरूरत है ऐसा कानून बनाने की जो सदस्यों के लिए सदन में कम से कम सौ दिन की सक्रिय उपस्थिति को अनिवार्य करे। ऐसा कानून बने जिसमें सदस्यों की सदस्यता भी रद करने का प्रावधान हो। यह जरूरी इसलिए भी है क्योंकि जनप्रतिनिधियों की सदन की कार्यवाही के प्रति उदासिनता को खत्म किया जा सके। जिस कार्य के लिए उन्हें सदन में भेजा जा रहा है उसका निर्वहन सौ प्रतिशत नहीं तो कम से कम साठ प्रतिशत जरूर करें। संसद लोकतंत्र की सबसे सर्वोच्य संस्था है। यहां कही गई बातें हमेशा प्रभाव डालती हैं। ऐसे में राष्‍ट्रपति का भी दायित्व बनता है कि वे ऐसे लोगों का मनोनयन करें जो सच में इस सर्वोच्य संस्था के प्रति समर्पित हों। वो सच में अपने-अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके कल्यान की बातें करें। उनकी आवाज बन सकें। 

लेखक कुणाल वर्मा वरिष्‍ठ एवं जानेमाने पत्रकार हैं. वे आई नेक्‍स्‍ट, दैनिक जागरण समेत तमाम बड़े संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पदों पर रह चुके हैं. फिलवक्‍त आज समाज के समूह संपादक के रूप में सेवारत हैं.