…तो क्या सचमुच इन कारणों से होता है रेप?

श्‍वेता जया पांडेय

: क्‍या समाज भी है रेप होने का जिम्‍मेदार : आजकल न्यूज़ बुलेटिन की शुरुआत ही रेप की ख़बर से करनी पड़ रही है और आधे घंटे के बुलेटिन में कम-से-कम तीन-चार खबरें रेप और गैंगरेप की होती हैं…लगता है देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा रेपिस्टों का हो गया है…आज भी पिछले आठ बुलेटिन में रेप और गैंगरेप की नौ खबरें पढ़ चुकी हूं…इनमें से पांच खबरें ताज़ा घटनाएं हैं…और बाकी खबरें हाल में हुई घटनाओं की फॉलोअप

बिहार की राजधानी पटना से सामने आया वीडियो और कैमूर और नालंदा की रेप और छेड़छाड़ के वीडियो… छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के भतीजे पर लड़की से रेप का आरोप… छतरपुर और सूरजपुर में नाबालिगों के साथ रेप की ख़बरें… हैलाकांडी और गोरखपुर से रेप की दो ब्रेकिंग न्यूज़… इंदौर, मंदसौर, सागर, सतना इन तमाम जगहों पर इसी महीने रेप और गैंगरेप के हुए मामले।

रायसेन में 9 साल की मासूम के साथ रेप के आरोपी को डेढ़ महीने की सुनवाई के बाद फांसी की सज़ा… इनके अलावा भी कई ऐसे मामले हैं, जो ख़बरों की सुर्खियां बने हुए हैं… लेकिन लग नहीं रहा कि फांसी देने या सभी आरोपियों के पकड़े जाने के बाद भी इस तरह की घटनाओं में कोई कमी आने वाली है… सवाल ये है कि फिर क्या किया जाए… कैसे इन घिनौनी घटनाओं को रोका जाए?

रेप की घटनाओं को कैसे रोकें : कोई कहता है फास्ट ट्रैक में सुनवाई होनी चाहिए…तो कोई कहता है आरोपी को फांसी दे देनी चाहिए…बेशक रेप/गैंगरेप के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होनी चाहिए… बलात्कार के लिए कड़े कानून बनने चाहिए… लेकिन इन सब के बीच आज जो सबसे ज़रूरी चीज़ ध्यान देने वाली है वो ये कि इस रेप का मुख्य कारण क्या है? इस मानसिकता के पीछे की वजह क्या है? क्योंकि जब तक हम रोग की वजह का पता नहीं लगा लेते और बीमारी की तह तक नहीं पहुंच जाते तब तक बीमारी का ठीक होना मुमकिन नहीं होता…बीमारी लाइलाज ही रहती है!

सिर्फ क़ानून नहीं रोक सकता रेप : कानून का डर अपराध को तो कम करता है, लेकिन मानसिकता को नहीं बदल सकता…और कानून के हाथ कितने लंबे होते हैं? क्या इतने लंबे कि घर की चहारदीवारी के अंदर होनेवाले क्राइम को रोक सके? या अपनों की बुरी नीयत से किसी मासूम या महिला को बचा सके? हां, इससे दूसरे स्तर के क्राइम को कम ज़रूर किया जा सकता है…लेकिन आंकड़े तो यही कहते हैं कि सबसे ज्यादा रेप और दुष्कर्म के मामलों में आरोपी परिवार के सदस्य, पड़ोसी या रिश्तेदार ही होते हैं।

और बड़ी बात ये कि ज्यादातर मामलों में ये शोषण लंबे समय तक चलता रहता है…लेकिन ना कानून को इसकी भनक होती है ना समाज को…कई बार मामले को इज्जत की दुहाइ देकर दबा दिया जाता है…फिर इनमें प्रशासन को पुख्ता और कानून को कड़ा कर के भी कितना फ़ायदा हो सकता है? ऐसे में फिर वही बात सामने आती है कि रुट कॉज को ढूंढा जाये…और बीमारी की जड़ तक पहुंचा जाए…हालाकि इस मुद्दे पर अलग-अलग लोगों के अलग विचार हो सकते हैं…लेकिन अपने अनुभवों के आधार पर इसके पीछे मुझे जो तथ्य समझ में आते हैं उनपर आप सबको विचार करने के लिए ज़रूर कहूंगी।

महिलाओं और बच्चियों को लेकर मर्दों में मानसिक दुर्बलता है…औरत और मर्द को लेकर समाज की दोहरी सोच है…बेटे और बेटी की परवरिश में बड़ा और बेहूदा फ़र्क है…अब अगर कोई इस पर तर्क करे और ये कहे कि मेरे घर में तो ऐसा नहीं होता तो उन लोगों को यही कहना चाहूंगी कि आंकड़े उठाकर देखिये या समाज में निष्‍पक्ष एक सर्वे करवा लीजिये या अपने आप से एक बार सच बोलने की हिम्मत कर के देखिये…आपको जवाब मिल जाएगा…और औसत के आधार पर ही परिणाम तय किये जाते हैं…”कुछ लोगों के घर में क्या होता है” के आधार पर नहीं, या अपवादों के आधार पर नहीं।

स्त्रीपुरुष की शक्तियों में अंतर : कुदरत ने स्त्री और पुरुष की शारीरिक संरचना अलग बनाई, जिससे दुनिया संतुलित तरीके से चलती रहे…स्त्री सृजन की आधार बनाई गई…बच्चे को जन्म देने में सक्षम…इसलिए उसके शरीर को अंदरुनी ताकत मिली और पुरुष के शरीर को बाहरी ताकत…ताकि स्त्री नई जिंदगी पैदा करने में अपने शरीर की अंदरूनी शक्तियों का इस्तेमाल कर सके और पुरुष बाहरी दुनिया के कार्यों में सहभागिता दे सके…और इस तरह संसार आगे बढ़ता रहे…लेकिन पुरुष ने इसे नहीं समझा… उसने स्त्री को कमज़ोर समझ लिया और उसे भोग की वस्तु समझकर खुद की बाहरी ताकत का प्रदर्शन उसी स्त्री के ऊपर करने लगा।

उसने ये नहीं सोचा कि स्त्री अगर अपने शरीर की अंदरुनी शक्तियों का इस्तेमाल कर बच्चा पैदा करने की अपनी क्षमता का उपयोग ना करे यानी इससे इनकार कर दे तो क्या पुरुष अपनी ताकत से इस दुनिया को चला पाएगा? जवाब सबको पता है- ‘नहीं’…ज़ाहिर है दुनिया का अंत हो जाएगा, लेकिन परिवेश में इस अनैतिकता ने धीरे-धीरे घर कर लिया और ये कोई आज की बात नहीं है, बल्कि बरसों-बरस से यही सोच चलती आ रही है और वक्त के साथ घटने की अपेक्षा ये और बढ़ती ही जा रही है।

स्त्री को वस्तु समझता है पुरुष : स्त्री के शरीर को लेकर बने ओछे चुटकुलों से लेकर लड़कों में होने वाली छिछोरी गपशप तक इसका बड़ा उदाहरण हैं…साथ ही इंटरनेट पर फैलाई गईं महिलाओं की घटिया फोटो से लेकर वीडियो तक और टीवी पर आनेवाले ऐड से लेकर फिल्मों में परोसे जा रहे मसाले… हर जगह महिलाओं को वस्तु की तरह परोसा जाता है… इस पर समय-समय पर सवाल भी उठते हैं लेकिन नतीजा कुछ नहीं होता… वहीं समाज भी औरत को एक वस्तु बनाता है… तभी तो एक पिता उसका दान कर देता है… और एक पति उसका दान लेता है… और वस्तु की तो कोई खुद की सोचने समझने की क्षमता होती नहीं, फिर उसके साथ चाहे जो करो?

क्या कहते हैं सर्वे : मैंने इस मुद्दे पर अपने आस-पास के लोगों, परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों से बात की…कई सर्वे को पढ़ा…और इस आधार पर कुछ नतीजे निकाले… हमारा दिमाग पुरानी परम्पराओं और आदतों से भरा हुआ है…और इस वजह से मर्द खुद को महिलाओं से ऊपर और बेहतर समझता है…इसका असर हर क्षेत्र में पड़ता है…दिमाग में औरत के प्रति जो नज़रिया है, वो ही इस कदर हावी हो जाता है कि पुरुषों को रेपिस्ट तक बना डालता है…देश-विदेश के कुछ सर्वे कहते हैं कि अगर मौका मिल जाए तो समाज का हर तीसरा व्यक्ति रेपिस्ट निकलेगा।

कुछ सर्वे इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि मौका मिलने के बाद अगर पकड़े जाने और घर-परिवार का डर ना हो तो हर तीसरा मर्द औरत को काबू करने की कोशिश करेगा… भले ही वो औरत उसके आस-पास या जान-पहचान की ही क्यों ना हो… पोर्न देखना, महिलाओं को गंदी नज़रों से देखना, महिलाओं पर गंदी टिप्पणियां करना, सेक्स के मकसद से ही लड़कियों से दोस्ती करना, महिलाओं का मजाक बनाना और मौका मिलते ही महिलाओं को नीचा दिखाना ज्यादातर पुरुषों की मानसिकता देखी गई है।

और जब महिलाएं उन्हें ऐसी स्थिति में अकेली मिल जाती हैं जब उन्हें पकड़े जाने का ज्यादा डर नहीं होता तो यही मानसिकता हावी हो जाती है और वो उनके साथ हिंसक हो जाते हैं… उन्हें अपनी ताकत दिखाने लगते हैं और रेप जैसी घटनाएं सामने आती हैं… कई बार रेप बदला लेने का ज़रिया भी बन जाता है… बदला किसी एक औरत से नहीं बल्कि महिला जाति से!

सेक्सुअल डिज़ायर मर्द-औरत दोनों को होती है, लेकिन औरत जहां इसके लिए कभी भी मर्द पर ज़ोर-जबर्दस्ती जैसे कदम नहीं उठाती, वहीं पुरुष आसान शिकार की खोज में निकल पड़ता है… कभी पेड (पैसे देकर) तो कभी रेप के जरिये… फर्क ये होता है कि उस मर्द की समाज में स्थिति क्या है… यानी कुछ पुरुष जहां कॉल गर्ल्स के पास जाना ज़्यादा सुरक्षित तरीका समझते हैं तो कुछ आसान शिकार की तलाश करते हैं और मासूम बच्चियों तक को अपना शिकार बना लेते हैं।

रेप के लिए समाज भी ज़िम्मेदार : पुरुष काम उत्तेजना में आकर रेप करता है ये कहना बेहूदा तर्क देना होगा, और अगर वो ऐसा करता भी है तो ये कहना ज़्यादा उचित होगा कि वो इसे कंट्रोल करना ही नहीं चाहता… क्योंकि ऐसे लोग मनोरोगी बन चुके होते हैं, उन्हें महिलाओं या बच्चियों को नुकसान पहुंचाकर मज़ा आता है… श्रेष्ठता का एहसास होता है, उसी श्रेष्ठता का जो उन्हें बचपन से बताया गया होता है… वास्तव में ये हमारा समाज ही है जो सिखाता है कि पुरुष ताकतवर होता है, श्रेष्ठ होता है… कदम-कदम पर ये एहसास पुरुष और स्त्री दोनों को कराया जाता है कि कौन श्रेष्ठ है और किसे मर्यादाओं में रहना है?

श्रेष्ठ होने का ये मिथक एक लड़के को बचपन से ही होने लगता है… फिर चाहे वो निम्न वर्ग का हो, मध्यम वर्ग का या उच्च वर्ग का… हां वर्ग के आधार पर प्रतिशतता में फ़र्क़ ज़रूर हो सकता है… रेप का ताल्लुक यौन ज़रूरतों से नहीं है… इसका संबंध काबू करने की ताकत से है… और नियंत्रित करने की ये चाहत उन्हें हमारा समाज ही देता है… समाज और परिवार जो बुनियादी गलतियां करते हैं उसी का नतीजा है रेप।

पुरुष में ये भावना किसने भरी कि वो कुछ भी कर सकता है… वो सड़कों पर देर रात घूम सकता है, कहीं भी अकेले आ-जा सकता है, कैसे भी कपड़े पहनकर या बिना पहने रह सकता है…घर में या किचेन में काम करना उसकी ज़िम्मेदारी नहीं… वो इतना श्रेष्ठ है कि उसके लिए उसकी मां और पत्नी व्रत करेंगी…बदले में उसे कोई व्रत पूजा करने की कोई ज़रूरत नहीं…वो खुले सांड की तरह घूमेगा, लेकिन उसकी बहन को शाम होते ही घर लौटना होगा… वो अच्छे स्कूल में पढ़ेगा, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि उसकी बहन को भी उसी स्कूल में दाखिला दिलाया जाये… स्कूल/कॉलेज से आते ही वो सोफे पर फैल जाएगा लेकिन उसकी बहन घर के कामों में लग जाएगी… पिता के पानी मांगने पर बहन देगी, उसे ये सब करने की ज़रूरत नहीं क्योंकि वो तो श्रेष्ठ है।

शादी के बाद भी एक लड़के के लिए कुछ नहीं बदलेगा, ना सरनेम… ना कपड़े पहनने का ढंग… ना परिवार और ना ही शादी की कोई निशानी… पत्नी घूंघट में रहेगी/सिर पर पल्लू रखेगी… पत्नी उसके लिए सिंदूर-बिछिया-चूड़ी-पायल पहनेगी… लेकिन पुरुष को शादीशुदा होने पर भी ऐसी किसी निशानी को अपनाने की ज़रूरत नहीं क्योंकि वो तो श्रेष्ठ है… ज़ाहिर है कि ये सीख परिवार और समाज ने ही पुरुष को दी है…हर कदम पर फ़र्क़ है महिला और पुरुष में…फिर अगर पुरुष खुद को श्रेष्ठ और महिला का भाग्य विधाता समझने लगता है तो फिर हमें आज इतनी परेशानी क्यों हो रही है?

अगर वही पुरुष आज महिला को आगे बढ़ता देख झुंझला रहा है, उसे मौका मिलते ही नीचा दिखाने और मसलने की कोशिश कर रहा है तो इतना हंगामा क्यों? जो सीख दी है उसी का तो ये परिणाम है… मर्दों को हर कदम पर श्रेष्ठ होने की दी जानेवाली सीख ही उन्हें लड़की के साथ ज़बरदस्ती करने के लिए उकसाती है… और फिर मर्दों को रेप करना अपनी ताक़त को दिखाने का ज़रिया नज़र आने लगता है!

हमारे देश में महिलाओं को देवी का दर्जा देने की बातें सामने आती हैं, लेकिन बड़ी सच्चाई यही है कि देवी तो दूर उन्हें सामान्य इंसान भी नहीं समझा जाता… क्योंकि इंसान समझा जाता तो कम से कम उसे घर में उतने अधिकार और हैसियत ज़रूर मिलते जितना घर के पुरुषों को मिलते हैं… और तब शायद आज ये सोचने की ज़रूरत नहीं होती कि क्यों होते हैं रेप?

बधाई के पात्र हैं ऐसे परिवार : भले ही औसत बहुत कम है, लेकिन ऐसे परिवार भी हैं जो अपने बच्चों को सही शिक्षा देते हैं… बेटे और बेटी की परवरिश में कोई फ़र्क नहीं करते… उन्हें बताते हैं कि उन दोनों की ही ज़िम्मेदारी सही रास्ते पर चलने और सबकी रेस्पेक्ट करने की है… जिन लोगों की पैरेंटिंग अच्छी होती है, वो इस तरह की चीज़ों को समझते हैं और स्त्री हों या पुरुष खुद पर काबू पाना भलीभांति जानते हैं।

ज़िम्मेदार माहौल : जो बच्चे सड़कों पर पले-बढ़े होते हैं या मजदूरी करते हैं या अच्छी परवरिश से महरूम रह जाते हैं वो ठीक ढंग से शिक्षित नहीं हो पाते… इनमें से ज़्यादातर बच्चे खुद बचपन में इस तरह की हिंसक घटनाओं की चपेट में आ चुके होते हैं या परिवार और आस-पास हिंसक और ज़ोर-जबर्दस्ती का माहौल देखा होता है… ज़ाहिर है इस माहौल का असर उनके ज़ेहन पर पड़ता है और कई बार उनके दिमाग में वो चीज़ें बनी रहती हैं, जिसे मौका मिलने पर वो भी हिंसक तरीके से अंजाम देते हैं।

भारतीय स्कूली शिक्षा भी काफी हद तक इसके लिए ज़िम्मेदार है, जहां बच्चों को शुरू से ही सेक्स एजुकेशन देने की व्यवस्था नहीं है… जिससे घर में मिल रहे माहौल का आधा-अधूरापन यहां भी जारी रहता है… और समस्या बरकरार रह जाती है… बहुत से लोगों का कहना है कि टीवी, फिल्मों और विज्ञापन में दिखाई जाने वाली अश्लीलता रेप के लिए ज़िम्मेदार हैं… तो कुछ ये दलील देते हैं कि लड़कियों के कम और बोल्ड कपड़े पहनने के चलते लड़के बहक जाते हैं।

यहां मैं ये तर्क बिल्कुल नहीं दूंगी कि फिर तीन साल की बच्चियों और सत्तर साल की बुजुर्ग के साथ क्यों रेप होते हैं… लेकिन इतना ज़रूर कहूंगी कि अगर घर में सही संस्कार मिले और स्कूल में सही शिक्षा दी जाये तो सवाल ही नहीं उठता कि कोई मर्द ज़िंदगी में कभी किसी औरत का रेप करने की सोचे भी… चाहे वो औरत उसे निर्वस्त्र ही क्यों ना मिल जाये… उसके संस्कार उसे इस बात के लिए प्रेरित करेंगे कि वो खुद उसे कपड़ों से ढंक देगा।anchor

लेखिका श्‍वेता जया पांडेय बहुमुखी प्रतिभा की धनी पत्रकार हैं. सामाजिक मुद्दों पर बेबाक कलम चलाती हैं. कविता-कहानियां लिखने का भी शौक है. पिछले बारह सालों से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में न्‍यूज प्रजेंटर और रिपोर्टर के तौर पर सक्रिय हैं. हमार टीवी, टोटल टीवी समेत कई चैनलों में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. फिलहाल न्‍यूज नेशन के साथ एंकर के रूप में जुड़ी हुई हैं.